Home रंजना सिंह पूर्वजों के ऊपर क्रूरतापूर्वक यहूदी निर्वासित जीवन

पूर्वजों के ऊपर क्रूरतापूर्वक यहूदी निर्वासित जीवन

by रंजना सिंह
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जो सभ्यताएं अपने पूर्वजों के ऊपर क्रूरतापूर्वक ढ़ाए गये जधन्य अत्याचारों व विभिषिकाओं को विस्मित कर देती है, वे विनाश को प्राप्त होती है।
जब यहूदी निर्वासित जीवन जी रहे थे, तो वहां की नदियों के तट पर बैठकर येरूसलम की ओर मुंह कर रोते विरह गीत गाते थे। उन्होंने सौगंध ली थी कि हम तबतक कोई आनंदोत्सव नहीं मनाएंगे, जबतक हमें हमारा येरुशलम दुबारा नहीं मिल जाता। इस निर्वासित जीवन के दौरान न कोई हर्ष, न गीत, न संगीत और केवल अपनी मातृभूमि की वेदना।
लगभग 2500 वर्ष पहले इजरायल में यहूदियों का आखिरी राज्य जूडिया समाप्त हो गया और यहूदी शरणार्थी बन कर दूसरे देशों में भटकने लगे। इस्लाम के फैलने के साथ जैरूसलम (यहूदी) और बैथेलहम (ईसाई) धार्मिक स्थल मुसलमानों के अधिकार में चले गए।
तुर्की सामाज्य (1098-1251) के समय मुसलमानों ने उनके धर्म-स्थलों को तोड़कर उन पर मस्जिदों का निर्माण किया। यहूदियों का धार्मिक स्थल शेष ’रोनी दीवार’ कुछ मीटर लम्बी एक दीवार है, जिसे यहूदी अति पवित्र मानते हैं। यहुदियों ने अपने ऊपर ढ़ाए गए अत्याचारों को सदैव स्मरण रक्खा और उनके अपने अवतारों का स्मरण व पूर्वजों के ऊपर ढाए गए जुल्मों की याद में वे दीवार पर सिर रख कर रोते हैं, जो उनकी अपने अवतारों व पूर्वजों को स्मरण करने व पूजा करने का तरीका है, जिसके स्मरण बल पर संगठित होकर पुनः खोया स्वराज्य प्राप्त किया।
यहूदियों के द्वारा बार-बार प्रार्थना करने पर भी मुसलमानों ने ‘रोनी दीवार’ को नहीं दिया और न उस पर से मस्जिद हटाई तो यहूदी उसी दीवार के अन्तिम कोने के कुछ मीटर बचें टुकड़ें पर पूजा करते रहे।
1948 में, यहूदियों का एक स्वतंत्र राष्ट्र इजराइल बना और इसी के साथ अरबों तथा यहूदियों में युद्ध शुरु हो गया। जैरुसलम शहर आधा यहूदियों और आधा अरबों के अधिकार में रहा। रोनी दीवार जैरुसलम के जिस हिस्से में थी, उस पर अरबों का अधिकार था। 1948 से 1967 तक यहूदी और इजरायल सरकार के द्वारा अरब मुसलमानों और समस्त मुस्लिम राष्ट्रों से यह अपील करते रहे कि उनकी भावनाओं का ध्यान करते हुए उन्हें ‘रोनी दीवार’ वापस कर दी जाए।
उत्तर में, वे यह कहते रहे कि वे इजराइल के सब यहूदियों को काट कर समुद्र में फेंक देगें। आखिरकार 1967 में युद्ध भड़क उठा और यहूदियों ने सारे जैरूसलम शहर पर कब्जा कर ‘रोनी दीवार’ पर बनी मस्जिद खोदकर फेंक दी। 1990 में ‘रोनी दीवार’ से थोड़ी दूर सड़क खुदाई करते समय एक अति प्राचीन पवित्र नाली निकली, जिसमें होकर ‘रोनी दीवार’ पर धार्मिक पूजा-पाठ को चढ़ाया जल बहकर बाहर बाग तक जाता था। इसका वर्णन यहूदी ग्रंथों में था, परन्तु रोनी दीवार पर मस्जिद बना लेने के बाद 800 वर्षों में इसका अस्तित्व ही कहीं लुप्त हो गया था। बाहर की ओर थोड़ा आगे जाने पर फिर उस पर मुसलमानों ने क़ब्रें बना डाली थीं तथा एक छोटी मस्जिद भी खड़ी कर दी थी। मुसलमानों से कहा गया कि वे वहां से क़ब्रें और मस्जिद हटा लें। उनके न सुनने पर यहूदियों ने क़ब्रों एवं मस्जिद को खोंदकर फेंक दिया। इसपर सितंबर-अक्टूबर 1990 में अरब और यहूदियों में भयंकर झगड़े हुए। सारे यहूदियों को काटकर समुद्र में फेंक देने का दावा करने वाले अरब, फिलिस्तीन आदि यहूदियों का अस्तित्व न मिटा सके।
अब वर्तमान में शनिवार, दिनांक 7 अक्टूबर 2023 को हमास आतंकवादी समूह ने यहूदियों के समूल विनाश हेतु इजरायल के दक्षिण में गाजा पट्टी की सीमा से लगे शहर किबुत्ज बीरी, सेडरोट और अश्कलोन पर आक्रमण किया गया है।
उल्लेखनीय है विश्व में सबसे अधिक नरसंहार झेलने वाली सनातन संस्कृति ने अपने पूर्वजों के ऊपर ढहाएं विभिषिकाओं को ही विस्मित कर दिया। कारण है इन्होंने मुगल आंक्रान्ताओं के द्वारा अपने पूर्वजों के उत्पीड़न, भीषण काट-काट व अफगानिस्तान, पाकिस्तान, पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बंग्लादेश) व कश्मीर से निकाले गए; उनको स्मरण कर सामूहिक रूप नियत स्थान पर कभी दो आंसू बहाए हो! इस वेदना को जिस ने महसूस किया, जिसका अस्थि कलश आज भी सिन्धु नदी में प्रवाहित होना शेष है।
क्या हमारे भीतर अपने पूर्वजों की मातृभूमि व देवी -देवताओं के लिए कोई वेदना है? क्या अपने पूर्वजों के द्वारा छोड़े गए शहर, पहाड़, नदी आदि की स्मृति को विरह वेदना के रूप में अपने हृदय में संजोया है? क्या अपने पूर्वजों की यातनाओं को स्मरण कर कोई विरह गीत गाया? विरह भाव बिना न ईश्वर भक्ति, न ही आत्मा की उच्च गति।

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