Home लेखक और लेखअवनीश पी ऍन शर्मा पूर्वोत्तर के जनजातीय पारंपरिक रिचुअल्स

पूर्वोत्तर के जनजातीय पारंपरिक रिचुअल्स

by Awanish P. N. Sharma
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मैं यहाँ पूर्वोत्तर के जनजातीय पारंपरिक रिचुअल्स के बारे में अक्सर लिखती रहती हूँ |
सभी जनजातिवालों की पारंपरिक पूजा पद्धति में चाहे चीज़ें थोड़ी-बहुत अलग हों पर बलि सभी लोग देते हैं | कोई मुर्गे की,कोई बकरे की,कोई सांड की तो कोई भैंस की |
तभी कुछ लोग इसका विरोध करने लगते हैं |
बलि तो हिंदुओं की ही चीज़ है ना? माता कामाख्या देवी के मंदिर में भी तो बलि होती है | वही नहीं बल्कि पूर्वोत्तर की सभी शक्तिपीठों में बलि होती है |
पूर्वोत्तर की जनजातियों में ज़्यादातर अब क्रिस्टियन ही बन चुके हैं | जिनका धर्म गया वो अपनी संस्कृति भी खो चुके हैं | कपड़े वही पहनते हैं,भाषा भी अपनी पारंपरिक ही बोलते हैं | पर वो बाहरी चीज़ें हैं,हार्ड्वेर है | जो सॉफ्टवेर है,अपनी संस्कृति,अपने पारंपरिक मूल्य..
अब वो न रहे | उन्हें नहीं पता कि उनकी अपनी पूजा पद्धति क्या है,मृतक संस्कार कैसे होता है,शादी-ब्याह के पारंपरिक नियम क्या है…कुछ भी नहीं जानते वो |
कोई पूछेगा अच्छा,अपनी जनजाति के नियम,परंपराओं के बारे में बताओ,क्या बोलेंगे वो?ऐसे में वे जनजातियाँ कैसे बचेंगी,उनका धर्म कैसे बचेगा?
इसलिए पूजा पद्धति के नाम पर वे बलि देते हैं,पारंपरिक शराब चढ़ाते हैं,पूजा में मांसाहार करते हैं या और भी कुछ करते हों उन्हें करते रहने दीजिए | इतना रिजिड बनकर अपने मत को थोपने की कोशिश करना ठीक नहीं | इसका असर बुरा ही होगा |
चाहे जिस रूप में ही क्यों न हो वो बस हिंदू बने रहे इतना ही काफ़ी है | हमारा कर्तव्य है कि उन्हें उसी रूप में अपना माने और सराहना करें | इन छोटी-मोटी चीज़ों का बहाना बनाकर हम दिल खोलकर उनका स्वागत नहीं करेंगे तो मुख्य हिन्दू समाज से कटा हुआ महसूस करेंगे और जितने बचे हैं उन्हें भी खो देंगे |
Post By – Rajshree D 

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