Home राजनीति बताइए गंगा का बेटा और प्यास से मरे?

बताइए गंगा का बेटा और प्यास से मरे?

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भीष्म पितामह तो फिर भी धर्म अधर्म की लड़ाई में हस्तिनापुर के साथ वचनबद्धता के फ़रेब में अधर्म के साथ खड़े थे। जुआ, द्रौपदी का चीर हरण, निहत्थे अभिमन्यु का मरना देखते रहे। तो यह तो होना ही था! फिर वह एक बार सोचता है कि ऐसा तो नहीं कि कहीं हस्तिनापुर की वचनबद्धता की आड़ में सत्ता और सुविधा के आगे वह घुटने टेक रहे थे? चलिए हस्तिनापुर के साथ आप की वचनबद्धता थी। पर शकुनी, दुर्योधन और धृतराष्ट्र की धूर्तई के आगे घुटने टेकने की वचनबद्धता तो नहीं थी? पर आप तो जैसे वचनबद्ध ही नहीं, प्रतिबद्ध और कटिबद्ध भी थे!
अद्भुत!
तो क्या जैसे आज के राजनीतिज्ञ आज की राजनीति, आज की व्यवस्था, मशीनरी सत्ता और बाज़ार के आगे नतमस्तक हैं, वैसे ही भीष्म पितामह भी तो नतमस्तक नहीं थे? गंगापुत्र भीष्म! और पानी के लए तड़प रहे थे। और प्रायश्चित कर रहे थे कि दुर्योधन के द्वारा प्रस्तुत स्वर्ण पात्र का जल पीने के बजाए अर्जुन के वाणों से धरती की छाती चीर कर ही प्यास की तृप्ति चाहते थे? इच्छा मृत्यु का वरदान उन की इच्छाओं का हनन तो नहीं कर रहा था? सोचते-सोचते उसे एक गीत याद आ गया है- पल-छिन चले गए/जाने कितनी इच्छाओं के दिन चले गए!
शिखंडी, अर्जुन का वाण, शर-शय्या और इच्छा मृत्यु का झूला। कितना यातनादायक रहा होगा भीष्म के लिए इस झूले में झूलना। व्यवस्था-सत्ता और बाज़ार के आगे घुटने टेकने की यातना ही तो नहीं थी यह? तो क्या था गंगापुत्र भीष्म? फिर उसे एक गीत याद आ गया है- बादल भी है, बिजली भी है, सागर भी है सामने/मेरी प्यास अभी तक वैसी जैसे दी थी राम ने!
फिर वह पूछता है कि क्या यह सिर्फ़ भीष्म प्रतिज्ञा ही थी? पर आचार्य द्रोण? सत्ता-सुविधा के आगे वह क्यों घुटने टेके हुए थे? सिर्फ़ बेटे अश्वत्थामा को दूध उपलब्ध न करा पाने की हेठी ही थी? तो एकलव्य का अंगूठा क्या था?
दासी पुत्र विदुर? उन्हों ने तो सत्ता-व्यवस्था और तब के बाज़ार के आगे घुटने नहीं टेके थे? पर वह पांडवों के साथ भी कहां खड़े थे? गदा, धनुष या तलवार ले कर? जहां-तहां सिर्फ़ प्रश्न ले कर खड़े थे। तो क्या आनंद विदुर होता जा रहा है?
एक और विदुर?
आनंद भी जहां-तहां प्रश्न ले कर खड़ा हो जा रहा है आज कल। इतना कि अब ख़ुद प्रश्न बनता जा रहा है! यह तो हद है! वह बुदबुदाता है। उसे विदुर नहीं बनना। विदुर की सुनता कौन है? महाभारत में भी किसी ने नहीं सुनी थी तो अब कोई क्यों सुनने लगा? वह सोचता है क्या विदुर के समय में भी साइकेट्रिक होते रहे होंगे? और कभी किसी धृतराष्ट्र या उस के वंशज ने विदुर को किसी साइकेट्रिक के पास जाने की सलाह दी होगी? या फिर क्या उस समय भी ट्रेड यूनियनें रही होेंगी? और किसी ने तंज़ में विदुर को भी ट्रेड यूनियन की राजनीति में जाने का विमर्श दिया होगा?
और सौ सवाल में अव्वल सवाल यह कि क्या तब भी कारपोरेट जगत रहा होगा जहां तब के विदुर नौकरी बजाते रहे होंगे?
क्या पता?
फ़िलहाल तो आज की तारीख़ में वह अपना नामकरण करे तो प्रश्न बहादुर सिंह, या प्रश्नाकुल पंत या प्रश्न प्रसाद जैसा कुछ रख ही सकता है। कैसे छुट्टी ले वह इस प्रश्न प्रहर के दुर्निवार-अपार प्रहार से? सोचना उस का ख़त्म नहीं होता। अब इस टीस का वह क्या करे? यह एक नई टीस है। जिस का उसे अभी-अभी पता चला है।
‘बहुत दिन हो गए तुम ने मालपुआ नहीं बनाया।’ वह पत्नी से कहता है। ऐसे गोया इस टीस को मालपुए की मिठास और भाप में घुला देना चाहता है। और कहता है, ‘हां, वह गरी की बर्फ़ी और गाजर का हलवा भी। जो तुम पहले बहुत बनाया करती थीं, जब बच्चे छोटे थे।’ कह कर वह लेटे-लेटे पत्नी के बालों में अंगुलियां फिराने लगता है। पत्नी पास सिमट आती है पर कुछ बोलती नहीं। वह जानता है कि जब ऐसी कोई बात टालनी होती है तो पत्नी चुप रह जाती है। बोलती नहीं। वह जानता है कि पत्नी को मीठा पसंद नहीं। बच्चे भी पत्नी के साथ अब नमकीन वाले हो गए हैं। बड़े हो गए हैं बच्चे। जब छोटे थे तब मीठा खा लेते थे। अब नहीं। मीठा अब सिर्फ़ उसी को पसंद है। और वह डाइबिटिक हो गया है। सो पत्नी अब मालपुआ नहीं बनाती। नहीं बनाती गरी की बर्फ़ी और गाजर का हलवा भी। खीर तक नहीं। पत्नी ब्लडप्रेशर की पेशेंट है। पर ख़ुद नमक नहीं छोड़ती। उस का मीठा छुड़वाती है।
आफ़िस में भी पहले सहयोगी बहुत रिस्पेक्ट करते थे। बिछ-बिछ जाते थे। यह जान कर कि आनंद की पालिटिकल इंलुएंस बहुत है। रुटीन काम भी वह करवा ही देता था सब का। पर जब सब की उम्मीदें बड़ी होती गईं, मैनेजमेंट भी लायजनिंग करवाने की कोशिश में लग गया। उस ने पहले तो संकेतों में फिर साफ़-साफ़ मना कर दिया कि वह लायज़निंग नहीं करेगा। हरगिज़ नहीं। सहयोगियों को साफ़ बता दिया कि इतना ही जो पालिटिकल इंलुएंस उस का होता तो वह ख़ुद राजनीति नहीं करता? राजनीति छोड़ नौकरी क्यों करता? नौकरी में टूट-फूट शुरू हो गई। जो लोग पलक पांवड़े बिछाए रहते थे, देखते ही मुंह फेरने लगते।
यह क्या है कारपोरेट में राजनीति या राजनीति में कारपोरेट?
वह एक परिचित के घर बैठा है। घर के लोग किसी फंक्शन में गए हैं। घर में एक बुज़ुर्गवार हैं। घर की रखवाली के लिए। अकेले। बुज़ुर्गवार पेंशन या़ता हैं। आनंद का हाथ पकड़ कहते हैं, ‘भइया गवर्मेंट में एक काम करवा देते!’
‘क्या?’
‘जो पेंशन महीने में एक बार मिलती है, महीने में चार बार की हो जाती। या दो बार की ही हो जाती।’
‘ऐसा कैसे हो सकता है?’ आनंद मुसकुराता है, ‘क्या किसी को दो बार या चार बार तनख़्वाह मिलती है जो पेंशन भी दो बार या चार बार मिले?’
‘नहीं भइया आप समझे नहीं।’ बुज़ुर्गवार आंखें चौड़ी करते हुए बोले, ‘पेंशन का एमाउंट मत बढ़ता। वही एमाउंट चार बार में, दो बार में मिलता। हर महीने।’
‘इस में क्या है? आप को पेंशन तो बैंक के थ्रू मिलती होगी। आप चार बार में नहीं छह बार में यही एमाउंट निकालिए। दस बार में निकालिए!’
‘आप समझे नहीं भइया!’
‘आप ही समझाइए।’
‘निकालने की बात नहीं है। आने की बात है।’
‘ज़रा ठीक से समझाइए।’ आनंद खीझ कर बोला।
‘भइया अब आप से क्या छिपाना?’ बुज़ुर्गवार बोले, ‘घर की बात है। पेंशन की तारीख़ करीब आती है तो घर के सारे लोग मेरी ख़ातिरदारी शुरू कर देते हैं। क्या छोटे-क्या बड़े। पानी मांगता हूं तो कहते हैं पानी? अरे दूध पीजिए। पानी मांगता हूं तो दूध लाते हैं। खाने में सलाद, सब्ज़ी, दही, अचार, पापड़ भी परोसते हैं। ज़रा सी हिचकी भी आती है तो दवा लाते हैं। लेकिन जब पेंशन मिल जाती है तब नज़ारा बदल जाता है। घर का हर कोई दुश्मन हो जाता है। क्या छोटा, क्या बड़ा। पानी की जगह दूध देने वाले लोग पानी नाम सुनते ही डांटने लगते हैं। कहते हैं ज़्यादा पानी पीने से तबीयत ख़राब हो जाती है। बहुत पानी पीते हैं। मत पिया कीजिए इतना पानी। हिचकी की कौन कहे, खांसते-खांसते मर जाता हूं, दवा नहीं लाते। खाना भी रूखा-सूखा। हर महीने का यह हाल है। तो जब दो बार या चार बार पेंशन मिलेगी हर महीने तो हमारी समस्या का समाधान हो सकता है निकल जाए!’
‘पर ऐसा कैसे हो सकता है भला?’ बुज़ुर्गवार का हाथ हाथ में ले कर कहते हुए उन के दुख में भींग जाता है आनंद। कहता है, ‘अच्छा तो अब चलूं?’
‘ठीक है भइया पर यह बात हमारे यहां किसी को मत बताइएगा।’
‘क्या?’
‘यही जो मैं ने अभी कहा।’
‘नहीं-नहीं बिलकुल नहीं।’ कह कर आनंद उन के पैर छू कर उन्हें दिलासा देता है, ‘अरे नहीं, बिलकुल नहीं।’
बताइए इस भीष्म पितामह को महीने में चार बार पेंशन का पानी चाहिए।
एक डाक्टर के यहां अपनी बारी की प्रतीक्षा में वह बैठा है। डाक्टर होम्योपैथी के हैं सो वह सिमटम पर ध्यान ज़्यादा देेते हैं। एक ब्लड प्रेशर के मरीज़ से डाक्टर की जिरह चल रही है, ‘क्या टेंशन में ज़्यादा रहते हैं?’
‘हां, साहब टेंशन तो बहुत है ज़िंदगी में।’ पेशेंट मुंह बा कर बोला।
‘जैसे?’
‘द़तर का टेंशन। घर का टेंशन।’
‘द़तर में किस तरह का टेंशन है?’
‘नीचे के सब लोग रिश्वतख़ोर हो गए हैं। बात-बात पर फाइलें फंसाते हैं। पैसा नहीं मिलता है तो बेबात फंसाते हैं। मैं कहता हूं दाल में नमक बराबर लो। और सब नमक में दाल बराबर लेते हैं। यह ठीक तो नहीं है।’
‘आप का काम क्या है?’
‘बड़ा बाबू हूं।’ वह ठसके से बोला, ‘बिना मेरी चिड़िया के फ़ाइल आगे नहीं बढ़ती।’
‘चिड़िया मतलब?’
‘सिंपल दस्तख़त।’
‘ओह! इतनी सी बात!’
‘इतनी सी बात आप कह रहे हैं। अफ़सर बाबू मिल कर देश बेचे जा रहे हैं और आप इतनी सी बात बोल रहे हैं?’ वह तनाव में आता हुआ बोला, ‘मैं तो अब वी.आर.एस. लेने की सोच रहा हूं।’
‘अच्छा घर में किस बात का टेंशन है?’
‘घर में भी कम टेंशन नहीं?’ वह तफ़सील में आ गया, ‘एक लड़का नौकरी में आ गया है। दूसरा बिज़नेस कर रहा है। बिज़नेस ठीक नहीं चल रहा। तीसरा लड़का कुछ नहीं कर रहा। लड़की की शादी नहीं तय हो रही है।’
‘बस?’
‘बस क्या, घर में रोज़ झगड़ा हो जाता है मिसेज़ से।’
‘किस बात पर?’
‘मुझे हरी सब्ज़ी पसंद है। साग पसंद है। मिसेज़ को तेल मसाला पसंद है। बच्चों को भी मसालेदार पसंद है। इस पर झगड़ा बहुत है।’
‘ठीक है। आप अपनी सब्ज़ी अलग बनवाइए। तेल-घी मसाला और नमक बिलकुल छोड़ दीजिए। द़तर से लंबी छुट्टी ले लीजिए। ब्लड प्रेशर आप का चार सौ चला गया है। इस को रोकिए। नहीं मुश्किल में पड़ जाइएगा।’
‘जैसे?’
‘लकवा मार सकता है। आंख की रोशनी जा सकती है। कुछ भी हो सकता है।’ कहते हुए डाक्टर उस के परचे पर दवाइयां लिख देते हैं।
दूसरा मरीज़ शुगर का है। डाक्टर की मशहूरी सुन कर पटियाला से लखनऊ आया है। सिख है। सरदारनी को भी साथ लाया है। सरदारनी उस के शुगर से ज़्यादा शराब छुड़ाने पर आमादा है। सरदार डेली वाला है। डाक्टर भी समझा रहे हैं। पर वह कह रहा है, ‘नहीं साहब बिना पिए मेरा काम नहीं चलता। बिना इस के नींद नहीं आती।’ डाक्टर नींद की गोलियों की तजवीज़ करते हैं। पर वह अड़ा हुआ है कि, ‘बिज़नेस की टेंशन इतनी होती है कि बिना पिए उस की टेंशन दूर नहीं होती।’
‘तो बिना शराब रोके कोई दवा काम नहीं करेगी?’
‘कैसे नहीं करेगी?’ सरदार डाक्टर पर भड़क गया है, ‘पटियाला से लखनऊ फिर किस काम के लिए आया हूं।’ बिलकुल दम ठोंक कर कहता है, ‘दवा आप दो, काम करेगी मेरी गारंटी है।’
‘इस वक्त भी आप पिए हुए हैं।’ डाक्टर उसे तरेरते हुए मुसकुराते हैं।
‘हां, थोड़ी सी।’ वह हाथ उठा कर मात्रा बताता है।
‘इन को कल ले कर आइए। जब पिए हुए न हों।’ डाक्टर सरदारनी से कहते हैं। पर सरदार अड़ा है कि, ‘दवा आज ही से शुरू होगी। भले कल से बदल दो।’ वह जोड़ता है, ‘आखि़र इतना पैसा ख़र्च कर पटियाले से ख़ास इसी काम के लिए आया हूं। तो काम तो जी होना चाहिए ना!’ डाक्टर को चुप देख कर वह बड़बड़ाता है, ‘फ़ीस बाहर दे दी है, आप दवा दो!’
आनंद बिना दवा लिए क्लिनिक से बाहर आ गया।
सोचता है सिगरेट पिए।
पर सिगरेट नहीं है। आस पास कोई दुकान भी नहीं है। वह कई बार पाइप और सिगार पीने के बारे में भी सोच चुका है। सिगार तो मौक़े बेमौक़े पी लेता है। पर पाइप हर बार मुल्तवी हो जाता है। सोच-सोच कर रह जाता है। ख़रीद नहीं पाता। सिगार भी कभी-कभार ही। नियमित नहीं।
नियमित नहीं है काफ़ी हाउस में भी बैठना उस का। पर बैठता है जब-तब। पहले के दिनों में काफ़ी हाउस में बैठना एक नशा था। अब वहां बैठ कर नशा टूटता है। समाजवादी सोच को अब वहां सनक मान लिया गया है। समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई/हाथी से आई घोड़ा से आई/समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई।’ को अब वहां इसी शाब्दिक अर्थ में गूंथा जाता है। और लोग पूछते हैं, ‘का हो कब आई?’ इतना कि आनंद को ‘जब-जब सिर उठाया/चौखट से टकराया’ दुहराना पड़ता है। लगता है विद्यार्थी जीवन ख़त्म नहीं हुआ। विद्यार्थी जीवन याद आते ही उसे अपनी छात्र राजनीति के दिन याद आ जाते हैं। याद आते हैं पिता। पिता की बातें। वह अंगरेज़ी हटाओ आंदोलन के दिन थे। पिता कहते थे कि, ‘पहले अंगरेज़ी पढ़ लो, अंगरेज़ी जान लो फिर अंगरेज़ी हटाओ तो अच्छा लगेगा। नहीं ख़ुद हट जाओगे। कोई पूछेगा नहीं।’ लेकिन तब वह पिता से टकरा गया था। आंदोलन का जुनून था। कई बार वह पिता से टकराता था तो लगता था-व्यवस्था से टकरा रहा है। व्यवस्था से आज भी टकराता है। पर इंक़लाब ज़ि़दाबाद सुने अब ज़माना गुज़र गया है। जिंदाबाद-मुर्दाबाद के दिन जैसे हवा हो गए। ‘हर ज़ोर-जुलुम के टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है’ को जैसे सांप सूंघ गया है। आर्थिक मंदी के दौर में जगह-जगह से लोग निकाले जा रहे हैं, बेरोज़गार हो रहे हैं। पर अब यह सब सिर्फ़ अख़बारों की ख़बरें हैं। इन ख़बरों में हताशा की बाढ़ है। जोश और इंक़लाब का हरण हो गया है, हमारी रक्त कोशिकाएं रुग्ण हो गई हैं। नहीं खौलता ख़ून। बीस हज़ार-तीस हज़ार की नौकरी छूटती है तो दस हज़ार-पंद्रह हज़ार की नौकरी कर लेते हैं। लाख डेढ़ लाख की नौकरी छूटती है पचास हज़ार-साठ हज़ार की कर लेते हैं कंपनी बदल लेते हैं। शहर बदल लेते हैं। ज़मीर और ज़हन बदल लेते हैं। ‘एक खेत नहीं, एक बाग़ नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे’ गाना हम भूल गए हैं। भूल गए हैं यह पूछना भी कि एक ही आफ़िस में कुछ आदमी आठ लाख-दस लाख महीने की तनख़्वाह ले रहे हैं तो कुछ लोग दस हज़ार, बीस हज़ार, पचास हज़ार की तनख़्वाह ले रहे हैं। यह चौड़ी खाई क्यों खोद रहे हैं हुजू़र? यह कौन सा समाज गढ़ रहे हैं। क्यों नया दलित गढ़ रहे हैं? क्यों एक नए नक्सलवाद, एक नई जंग की बुनियाद बना रहे हैं? अच्छा बाज़ार है! चलिए माना। फिर ये बेलआउट पैकेज भी मांग रहे हैं।
यह क्या है?
मालपुआ खाना है तो बाज़ार की हेकड़ी है। भीख मांगनी है तो लोक कल्याणकारी राज्य की याद आती है? भई हद है!
काफ़ी हाउस में बैठा आनंद सिगरेट सुलगाता है और सोचता है कि इसी माचिस की तीली से बेल आउट देने और लेने वालों को भी किसी पेट्रोल पंप पर खड़ा कर के सुलगा दे। और बता दे कि जनता की गाढ़ी कमाई से भरा गया टैक्स, सर्विस टैक्स और दुनिया भर का ऊल जुलूल टैक्स का पैसा है। इस से बेलआउट के गड्ढे मत पाटो।
‘शिव से गौरी ना बियाहब हम जहरवा खइबौं ना!’ शारदा सिनहा का गाया भोजपुरी गाना कहीं बज रहा है। यह कौन सा कंट्रास्ट है?
वह रास्ते में है।
कोहरा घना है। और थोड़ी सर्दी भी। कोहरे को देख उसे सुखई चाचा की याद आ गई।
घने कोहरे में लिपटी वह रात सुखई चाचा के ज़र्द चेहरे को भी जैसे अपने घनेपन में लपेट लेना चाहती थी। लेकिन बार-बार डबडबा जाने वाली उन की निश्छल आंख छलछलाती तो जैसे वह कोहरे को ही अपने आप में लपेट लेती। उन के रुंधे कंठ से उन की आवाज़ भी स्पष्ट नहीं हो पा रही थी। तो भी उस घोर सर्दी में उन की यातना की आंच जलते हीटर की आंच से कहीं ज़्यादा थी।
यह यातना उन के मुसलमान होने की थी।
उन के नाती को पुलिस ने आतंकवादी घोषित कर दिया था। गांव की राजनीति और लोकल पुलिस का यह कमाल था। आतंकवाद की बारीकियों से बेख़बर आतंकवाद के आतंक की काली छाया में वह घुट रहे थे। आतंक से तो वह परिचित थे, पर आतंकवाद क्या बला है, इसे वह अब भुगत रहे थे, बल्कि उस में झुलस रहे थे।
झुलसते हुए ही वह तीन सौ किलोमीटर की दूरी नाप कर लखनऊ आनंद के पास आए थे अपने नाती को ले कर कि वह आतंकवाद की नंगी तलवार की फांस से उन के नाती को उबार देगा। यह सोच कर कि आनंद बड़का नेता है, जो चाहेगा, करवा देगा। वह यह उम्मीद जताते हुए थर-थर कांप रहे थे, उन की घबराई डबडबाई आंखें जब तब छलछला पड़ती थीं।
सुखई चाचा जो आनंद के जीवन के अनगिनत सुखों के साझीदार थे, अपने इस बुढ़ापे के दुख में आनंद को साझीदार बनाने पर आमादा ही नहीं आकुल-व्याकुल, हैरान-परेशान भयाक्रांत उस के पैरों में समा जाना चाहते थे।
उस ने उन्हें हाथ जोड़ कर रोका कि, ‘नहीं सुखई चाचा, ऐसा नहीं करें। आप मुझ से बहुत बड़े हैं।’
‘नहीं तिवारी बाबा! ओहदा में, जाति में, रसूख़ में तो रऊरा बड़ा बानी।’
‘अरे नहीं-नहीं बड़े तो आप ही हैं।’ कह कर मैं ने उन्हें उठा कर बैठा लिया। और कहा कि, ‘अभी आप खा पी कर आराम से सोइए। रात बहुत हो गई है। सुबह इत्मीनान से बात करेंगे। और इसे बचाने का इंतज़ाम भी। ड्राइंग रूम में ही उन के और उन के नाती के सोने की व्यवस्था करने के लिए पत्नी से कहा तो वह ज़रा बिदकी। पर जल्दी ही वह व्यवस्था करने में लग गई। वह कंबल खोजने लगी तो मैं ने कहा कि, ‘कंबल नहीं मेहमानों वाली रज़ाई दे दो ठंड बहुत है। और हीटर भी जला रहने देना।’
सुखई चाचा जो उस की पैदाइश से ही उसके साथ थे। बाजा बजाते हुए। दादी बताती थीं कि जब मैं आधी रात को पैदा हुआ तो शुभ साइत का नगाड़ा जब बजा तो मियां का बाजा भी बजा। मियां माने सुखई। तब जाड़े की रात थी लेकिन ख़बर मिलते ही सुखई चाचा अपना बिगुल बजाने अपने बेटे के साथ आ गए। सुखई बिगुल यानी ट्रम्पेट्स बजा रहे थे और उन का बेटा तासा। भाई उन का झाल बजाता रहा। अम्मा बताती थीं कि जब मेरा निकासन हुआ तब भी मियां ने बाजा बजाया। मेरा मुंडन हुआ तब भी मियां ने बाजा बजा कर दरवाजे़ की शोभा बढ़ाई। और मैं ने अपने यज्ञोपवीत तथा बाद में विवाह में भी मियां यानी सुखई चाचा को ट्रम्पेट्स बजाते देखा। ट्रम्पेट्स पर उन दिनों फ़िल्मी गानों की बहार आ गई थी पर सुखई चाचा के ट्रम्पेट्स पर कजरी और पुरबी गानों की बहार फिर भी बहकती झूमती छाई रहती। मेरे पैदा होने, निकासन, मुंडन, यज्ञोपवीत, विवाह आदि सभी मौक़े पर सुखई चाचा दरवाजे़ की शोभा बढ़ाते रहे बिगुल यानी ट्रम्पेट्स बजा कर। मुझे याद है कि जब मेरी दादी का देहांत हुआ और उन का पार्थिव शरीर शहर के अस्पताल से ट्रक से गांव ले जाया गया तो सुखई चाचा की बैंड पार्टी दादी की अंतिम विदाई में भी हाज़िर थी। दादी ने लंबी उम्र जी कर विदा ली थी तो ग़मी के बावजूद ख़ुशी का भी मौक़ा था सो उन्हें बाजे गाजे के साथ विदाई दी गई गांव से। घर की औरतें और लोग रो ही रहे थे, सुखई चाचा ने जाने कौन सी धुन या जाने कौन सा राग छेड़ा अपने ट्रम्पेट्स पर कि जो लोग नहीं रो रहे थे, वह लोग भी रोने लगे। सब की आंखें बह चलीं।
सुखई चाचा बैंड बाजे का सट्टा करते थे, पर हमारे घर से वह सट्टा नहीं लिखवाते जजमानी लेते। पहले वह लुंगी या धोती पहने ही ट्रम्पेट्स बजाते थे पर बाद के दिनों में उन की बैंड बाजा कंपनी में बैंड बाजा वाली लाल रंग की ड्रेस भी आ गई। पर वह ख़ुद ड्रेस नहीं पहनते थे। धोती या लुंगी खुंटियाए वह अलग ही दिखते थे। बाद में उन का बेटा बिस्मिल्ला भी तासा छोड़ कर ट्रम्पेट्स बजाने लगा पर सुखई चाचा जैसी तासीर वह अपने बजाने में नहीं ला पाया।
सुखई चाचा का नाम तो था सुख मुहम्मद लेकिन गांव में लोग उन को सुखई कहते थे। गांव की औरतें जो संस्कारवश या लाजवश पुरुषों का नाम नहीं लेती थीं, उन्हें मियां कहती थीं। और हम उन्हें सुखई चाचा कहते थे।
ब्राह्मणों की बहुतायत वाले गांव में चूड़िहारों के भी सात आठ घर थे। उन्हीं में से एक घर सुखई चाचा का भी था। सुखई चाचा का नाम भले सुख मुहम्मद था पर सुख उन के नसीब में शायद ही कभी रहा हो। हां, उन के चेहरे पर एक फिस्स हंसी जैसे हमेशा चस्पा रहती थी। चाहे वह हल जोत रहे हों, चाहे सिलाई मशीन चला रहे हों, चूड़ी पहना रहे हों या बाजा बजा रहे हों। सुखई चाचा जैसे हर काम में माहिर थे। या ऐसे कहूं कि वह हर किसी काम के लिए बने थे। उन के पास मुर्गि़यां भी थीं और बकरियां भी। लेकिन सब कुछ के बावजूद गुज़ारा उन का न सिर्फ़ मुश्किल बल्कि बेहद मुश्किल था।
हमारे घर में क्या गांव के किसी भी घर में शादी ब्याह होता, लगन लगते ही उस घर में सुखई चाचा का डेरा भी जम जाता। सगुन का जुआठा हरीश लगते ही उन की सिलाई मशीन भी जम जाती। घर भर के कपड़े, रिश्तेदारों के कपड़े सिलने वह शुरू कर देते। काज, तिरुपाई, बटन के लिए उन की बेगम, बेटियां, बहू बारी-बारी सभी लग जाते। तब के घर भी कोई दो चार दस सदस्यों वाले घर नहीं होते थे। सिंगिल फेमिली, ज्वाइंट फेमिली का कंसेप्ट भी तब गांव में नहीं था। बाबा की चचेरी बहनें तक घर का ही हिस्सा थीं। बूढ़ी फूफियां अपने नाती पोतों समेत अपनी ससुराल छोड़ शादी के दस रोज़ पहले ही बुला कर लाई जातीं और शादी के दस बारह रोज़ बाद ही वापस जातीं। एक-एक दो-दो कपड़े ही सही, सभी के लिए नए-नए सिले ज़रूर जाते। कोई कुछ कहे तो सुखई चाचा बस, ‘हां बाबा, हां तिवराइन’ कह कर काम समझ लेते और उस के मन मुताबिक़ काम कर देते।
अपने टीन-एज के दिनों में आनंद एक बार बेहद बीमार पड़ा। एक्यूट एनिमिया हो गया था। देह में ख़ून की बेहद कमी वाली इस बीमारी में डाक्टर ने पौष्टिक आहार में दूध और अंडा का भी ज़िक्र कर दिया। घर में मांस-अंडा का पूरी तरह निषेध था। मां को तुरंत सुखई चाचा याद आए। बुलाया उन्हें। उन के घर में दूध देती गाय भी थी और अंडा देती मुर्ग़ी भी। वह सहर्ष तैयार हो गए। और पूरी गोपनीयता के साथ दूध में कच्चा अंडा फेंट-फेंट पिलाते रहे। आनंद के स्वस्थ होने तक।
उसे याद है तब कार्तिक का महीना था। गेहूं की बुआई का समय था। सुखई चाचा के साथ खेत में वह जब-तब हेंगे पर बैठ जाता। रह-रह कर वह हल जोतने की भी ज़िद करता और वह इस के लिए सख़्ती से मना कर देते। एक बार वह हल लुढ़का कर पेशाब करने ज़रा दूर गए। आनंद ने मौक़ा पा कर हल चलाना शुरू कर दिया। ज़रा दूर चलते ही हल की मूठ टेढ़ी-मेढ़ी हुई और हल का फार बैल के पैर की खुर में जा लगा। बैल की खुर से ख़ून निकलने लगा। उस का चलना मुश्किल हो गया। बैल अचकचा कर बैठ गया। सुखई चाचा दौड़ते-हांफते आए। बोले, ‘इ का कै देहलीं बाबा!’ झटपट बैल के जुआठे से पहले हल निकाला फिर बैल के गले से जुआठा। और माथे पर हाथ रख कर बैठ गए। बोले, ‘कातिक महीना, बैल बइठ गइल। अब कइसे बोआई होई!’ वह रुके और बोले, ‘अब गोंसयां हम्मे छोड़िहैं नाईं। गारी से तोप दिहैं।’ हुआ भी वही बाबा ने उन्हें गालियों से पाट दिया। पूछा कि, ‘अब कइसे बुआई होगी?’
गेहूं की बुआई उस साल पिछड़ गई थी। बाद में उधार के बैल से बुआई हुई। पर सुखई चाचा ने एक बार भी बाबा से नहीं कहा कि आनंद ने हल चला कर बैल के पैर में घाव दिया है, आनंद की बेवक़ूफ़ी से बैल का खुर कटा है। भूल कर भी नहीं, सारी तोहमत अपने ऊपर ले ली। आनंद चाह कर भी अपनी ग़लती बाबा से नहीं बता पाया। क्यों कि फिर उसे अपनी पिटाई का डर था। और सुखई चाचा भी यह बात जानते थे सो सारी गालियां अपने हिस्से ले लीं, आनंद को पिटने नहीं दिया। आनंद के बाबा प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर रहे थे। सो पिटाई बड़ी बेढब करते थे। उन की पिटाई के क़िस्से उन के रिटायर होने और निधन के बाद भी ख़त्म नहीं हुए थे गांव से-जवार से।
अकसर जब वह खेत में बाबा के साथ होता तो लोग आते-जाते बड़ी श्रद्धा से उन के चरण स्पर्श करते। लोगों के जाने के बाद जब वह बाबा से पूछता कि, ‘ये कौन थे?’
‘अरे चेला है।’ वह जोड़ते, ‘पढ़ाया था इस को।’ बाबा बताते और लगभग हर किसी के लिए।
‘पर यह आदमी पढ़ा लिखा तो लग नहीं रहा था।’
‘तो ससुरा जब पढ़ा ही नहीं तो पढ़ा लिखा लगेगा कइसे?’
‘पर अभी तो आप कह रहे थे कि पढ़ाया था, चेला है।’
‘हां, पढ़ाया तो था। पर ससुर पढ़ा कहां। दो चार छड़ी मारा, भाग खड़ा हुआ। फिर स्कूल ही नहीं आया।’ अधिकांश लोगों की पढ़ाई बाबा की मार से छूट गई थी। वह अपने समय में मरकहवा मास्टर नाम से मशहूर थे। गणित और उर्दू दो उन के विषय थे। ख़ास कर गणित में वह अपने विद्यार्थियों को बहुत मारते। हाथ-पांव तक तोड़ डालते। नतीजतन तब के विद्यार्थी भैंस चराना मंज़ूर कर लेते पर मरकहवा मास्टर से पढ़ाई नहीं। लेकिन जो विद्यार्थी उन की मार बरदाश्त कर ले जाते वह अव्वल निकल जाते। डिप्टी कलक्टर और कलक्टर बन जाते। ऐसा बाबा ख़ुद बताते। कलक्टर या डिप्टी कलक्टर तो नहीं पर कुछ अच्छी जगहों पर जमे लोगों को बाद के दिनों में ज़रूर उस ने पाया। जो इन मास्टर साहब की पिटाई पर आह भरते और उन के पढ़ाने के गुण की वाह करते कुछ थोड़े से लोगों को पाया। पर अधिकांश पढ़ाई छोड़ कर भागने वाले ही मिले।
सुखई चाचा भी उन्हीं न भागने वालों में से थे। अलिफ़ बे उन्हों ने बाबा से ही सीखा था। पर घर की मजबूरियों ने उन्हें और आगे पढ़ने नहीं दिया। और वह इस उर्दू तालीम को अपनी दर्ज़ीगिरी में आज़माते। और आनंद के घर के सारे काम भी वह पूरी निष्ठा, श्रद्धा या यों कहिए कि पूरे विद्यार्थी धर्म के साथ निभाते। वह बाबा को और उन के पूरे परिवार को अपने श्रम की गुरु दक्षिणा जब-तब प्रस्तुत करते रहते। और अभी भी सुखई चाचा उसी कृतज्ञ भाव से आनंद के पास अपने नाती को पुलिसिया क़हर से, आतंकवाद की आंच और गांव की गिरी राजनीति से बचाने की गुहार भरी आस में नाती को ले कर लखनऊ आए थे।

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