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भारतीय फेसबुक, मीडिया व सोशल मीडिया में एक से बढ़कर एक

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
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भारतीय फेसबुक, मीडिया व सोशल मीडिया में एक से बढ़कर एक अंतर्राष्ट्रीय मामलों व दुनिया की दशा दिशा के विशेषज्ञ हैं। कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा जोड़ कर, अपने अहंकार या पूर्वाग्रह या दोनों को तुष्ट करने के लिए जो मर्जी वह विश्लेषण करते रहते हैं। इन विशेषज्ञों का बस चले तो दुनिया को व्यापक स्तर पर परमाणु युद्ध में आज झोंक दें। दुनिया में इतना गंभीर मसला चल रहा है और ये लोग इसे गली मोहल्ले के सड़कछाप लौँडों की तरह देख रहे है कि अपने-अपने गुटों के साथ मार-कुटाई शुरू कर दी जाए।
इन लोगों को तो इस बात से परेशानी है कि नाटो सीधे रूस से युद्ध क्यों नहीं कर रहा है, यूक्रेन की सीमा के अंदर जाकर रूस के खिलाफ युद्ध क्यों नहीं छेड़ देते हैं, क्यों नहीं रूस में मिसाइलें छोड़ देते हैं, फिर रूस छोड़े फिर चीन भी जुड़े और दुनिया के और देश भी सीधे एक दूसरे के साथ युद्ध शुरू कर दें।
चूंकि नाटो व योरप ऐसी स्थिति नहीं पैदा कर रहे हैं तो वे यूक्रेन को धोखा दे रहे हैं, सीढ़ी लगाकर गिरा दिया है। रूस से डर गए, रूस ने फाड़ दिया। अमेरिका बूढ़ा हो गया, चुक गया। मने सभी विशेषज्ञ बने घूम रहे हैं। ऐसा ही पता नहीं क्या-क्या उलजुलूल परोसते रहते हैं। लगता ही नहीं कि इन लोगों को मुद्दे की गंभीरता की धेला भर भी कोई समझ है।
इन लोगों को लगता है कि अमेरिका व योरप या रूस टीवी चैनलों के वीडियो या फोटो जर्नलिस्टों से नीतियां बनवाते हैं या परामर्श लेते हैं। इन लोगों को बिलकुल भी अंदाजा नहीं कि विशेषज्ञता किस चिड़िया का नाम है, इन देशों में विशेषज्ञ कैसे होते हैं, इन देशों का सूचना तंत्र व जासूसी के स्तर के बारे में कतई अंदाजा नहीं।
इन लोगों को अमेरिका व योरप के देशों के अंदर डेमोक्रेसी का क्या स्तर है, का बिलकुल अंदाजा नहीं, समाज व लोग कैसे सोचते हैं, इसका भी कतई अंदाजा नहीं। जैसे पुतिन पुराने तौर-तरीको व मानसिकता में जी रहे हैं, उसी तरह ये लोग भी पुराने तौर-तरीकों व थियरीज के आधार पर ही विश्लेषण कर रहे हैं। इनको लगता है कि पूरी दुनिया आज भी वहीं खड़ी है जहां दशकों पहले खड़ी थी। इनको पता ही नहीं कि जिन लोगों ने पुराने तौर-तरीके दिए थे, पुरानी रणनीतियां व थियरीज दीं थीं, वे किन नए तौर-तरीकों, रणनीतियों व थियरीज की ओर बढ़ चुके हैं।
इनमें से शायद ही कोई ऐसा बंदा हो जिसे चल रही स्थितियों की गहराई का अंदाजा हो, लेकिन बहसबाजी ऐसे करेंगे मानो दुनिया इनसे ही सलाहें लेकर काम करती हो। यह सब वाहियातबाजी करने की मानसिकता उसी चरित्र से आती है, जिसमें कहा जाता है कि दुनिया के देशों के राजनेता जिल्लेइलाही से पूछ कर नाश्ता, टट्टी पेशाब करते हैं।
अरे भई दुनिया बहुत बड़े खतरे में जी रही है। जरा सी गलती भी दुनिया को कहीं से कहीं धकेली जा सकती है। जो बंदा 70 साल जी चुका है, जो मानसिक रूप से बीमार है, जो यह कहता है कि यदि वह नहीं तो धरती भी न रहे तो क्या फर्क पड़ता है। उससे डील करते समय धैर्य की जरूरत होती है।
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हमारे एक मित्र कह रहे हैं कि रूस की बैंकिंग में बैन लगा दिया गया है, यदि रूस में भी भारत की तरह वीसा व मास्टर कार्ड की बजाय रूपे जैसा कार्ड होता तो रूस की बैंकिंग पर बैन नहीं लगता। अब इनकी इस बात को इनकी नासमझी मानूं या जानकारी का बिलकुल ना होना या मासूमियत, समझ नहीं आ रहा। लेकिन एक बात तो तय है, वह यह कि जिसकी जो मर्जी हो, कुछ भी जो भी कल्पना हो, कोई भी तर्क भिड़ाकर कुछ भी पेश कर दो।
एक से बढ़कर एक लंपट व टपोरी लोग, जिनमें दो दो कौड़ी की किताबें व पत्र-पत्रिकाएं रटकर कोचिंग चलाने वाले लोग भी हैं। फूहड़ता के साथ जो मन में आता है वह ज्ञान दे रहे हैं और लोग ले भी रहे हैं। समझ ही नहीं आता है कि कितना रायता फैला हुआ है, कितनी खोखलाहट है, कितनी मूर्खता है, कितना ओछापन है, कितना सतहीपन है। सबकुछ भीड़ व लंपटई से तय होने लगा है।
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चलते-चलते ::
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रूस यूक्रेन में हारेगा, बुरी तरह हारेगा, रूस की जो भी जीत होगी वह अस्थाई होगी, अंतिम जीत यूक्रेन की होनी है। यूक्रेन वह जलता हुआ कोयला है कि रूस का मुंह जलना ही है, रूस इस जलते हुए कोयले को उगले या निगले। पुतिन तो अब इस बात के लिए प्रयासरत हैं कि वे अपने देश के लोगों के सामने यह साबित कर सकें कि पुतिन जीते और यूक्रेन हारा।
यूक्रेन तो केवल जान-माल की क्षति झेल रहा है, जान तो वापस नहीं लौट सकती, रही बात संपत्तियों की तो दुनिया मिलकर पहले से बेहतर यूक्रेन बना देंगे। लेकिन रूस इस युद्ध के कारण ऐसा बहुत कुछ हार चुका है, हार रहा है जो बहुत गंभीर है दीर्घकालिक है। युद्ध खतम होने के बाद भी लंबे समय तक बहुत कुछ खोता भी रहेगा।
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विवेक उमराव

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