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माता दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध

Ranjana Singh

by रंजना सिंह
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माता दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध की कथा तो लगभग सभी लोग जानते ही हैं, किन्तु क्या आपको ज्ञात है कि महिषासुर की एक बहन भी थी जिसका नाम महिषी था?
महिषासुर के वध के उपरांत इस महिषी ने क्रोध आक्रोश और प्रतिशोध में भरकर अपरिमित शक्ति पाने,दुर्गा तथा उसकी रचना,इस सँसार को नष्ट भ्रष्ट कर देने के लिए कठोर तप किया।
उसका तप इतना प्रबल था कि विवश होकर ब्रह्मा जी को वर देने हेतु उपस्थित होना ही पड़ा।उसने वरदान में यह शक्ति तथा अमरत्व माँगा।अमरत्व के लिए जब ब्रह्मा जी ने मना कर दिया तो उसने चतुराई दिखाते ऐसा वरदान माँगा जो अमरत्व के समान ही था।उसने माँगा कि यदि मृत्यु अटल है तो उसकी मृत्यु केवल तब हो,जब शिव और विष्णु के योग से सन्तान उतपन्न हो।एकमात्र वही उसका वध कर पाने में सक्षम हो…और उसे यह वरदान मिल गया।
इसके उपरान्त तो निश्चिन्त होकर वह निर्विघ्न विध्वंस मचाने तथा दुर्गा को नष्ट करने हेतु उन्हें ढूँढने में लग गयी।
संयोग से उस कालखण्ड में माता पार्वती को भ्रामरी रूप धारण करना पड़ा था और वे उस रूप से मुक्त नहीं हो पा रही थीं (एक विकट असुर ने कठोर तप करके अपनी मृत्यु छः पैरोंवाले जीव के हाथों ही पाने का वरदान सुनिश्चित करवाया था क्योंकि उसके जानते भर में छह पैरों से युक्त कोई शक्तिशाली जीव पृथ्वी पर अस्तित्व ही नहीं रखता था,जो उसके मृत्यु का कारण बन सके)।महिषी को जब यह ज्ञात हुआ तो उसने इसे अपने लिए स्वर्णिम अवसर माना।क्योंकि इसे वह सरलता से नष्ट कर सकती थी।
महिषी से माता भ्रामरी की रक्षा करने हेतु माता लक्ष्मी ने उन्हें षटपदी के गुण स्वभाव से मुक्त होने तक एक ऐसे अज्ञात स्थान पर रक्षित कर दिया जहाँ महिषी तो क्या स्वयं शिव या अन्यान्य भी कोई नहीं पहुँच पाएँ।
इधर पार्वती से विलग शिव ऐसे ही विरागी शिथिल और सँसार से निर्लिप्त हुए पड़े थे।
उधर महिषी के विध्वंस और उससे पराजित सभी देवता निरुपाय व्याकुल हो भागते भटकते फिर रहे थे।
तब सँसार के पालनहार श्री भगवान विष्णु ब्रह्मा जी को साथ लेकर शिव के पास पहुँचे और अत्यन्त विनयपूर्वक उनकी पूजा अर्चना की और उद्धार हेतु याचना की।
बहुत सोच समझकर चतुराई से महिषी ने वरदान माँगा था,क्योंकि उसे भलीभांति ज्ञात था कि दो पुरुषों के योग से सन्तान नितान्त ही अप्राकृतिक और असम्भव था।
दूसरे, शिव पार्वती(किसी भी रूप जन्म में) के अतिरिक्त और किसी से योग कर ही नहीं सकते थे।आखिर पुरुष और प्रकृति मिल ही तो सृष्टि रच सकते हैं।
तब विष्णु ने अपना पुरुषत्व सर्वथा त्याग कर स्त्रीत्व धारण किया और मोहिनी रूप विष्णु और शिव के योग से सन्तान “अय्यप्पा” उतपन्न हुए,जिन्होंने बारह वर्ष की अवस्था में महिषी का वध किया था।अयप्पा स्वामी को हरिहर भी कहा जाता है क्योंकि ये हर तथा हरि के योग से जन्मे थे।दक्षिण भारत में इनकी भक्ति पूजा बड़े ही आदर और श्रद्धा से की जाती है।
इस प्रकार विष्णु ने तीन बार मोहिनी रूप धारण किया था।प्रथम बार समुद्र मंथन,अमृत वितरण के समय, दूसरी बार भस्मासुर से शिव की रक्षा के लिए और तीसरी बार स्वामी अय्यप्पा के जन्म के लिए।लोक कल्याण, सुचारू सृष्टि संचालन के लिए करुणा त्याग और शौर्य के जितने उदाहरण सनातन के पूज्यों(देवों) ने छोड़ रखे हैं,यदि हम उनका स्मरण भर ही करते रहें तो आसुरी बुद्धि जो हमारे अन्तस् में ही विद्यमान है,कभी हमें प्रभावित और पराजित नहीं कर पायेंगे।वस्तुतः यह हमपर है कि हम किस शक्ति को अपने साथ रखते हैं।महिषासुर या महिषी जैसे तत्व प्रभावित करेंगे तो क्रूर से क्रूरतम,विध्वंसक भी हमीं हो सकते हैं और यदि सदशक्तियों के प्रभाव में हम होंगे तो केवल कल्याण ही कल्याण करेंगे।

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