Home अमित सिंघल “मुफ्त बेचना नहीं है, कमाना है आपको”।

“मुफ्त बेचना नहीं है, कमाना है आपको”।

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प्रधानमंत्री मोदी ने 30 जून को कहा कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) से ही आत्मनिर्भर भारत अभियान को सिद्धि मिलेगी, भारत सशक्त होगा। भारत की अर्थव्यवस्था में लगभग एक तिहाई हिस्सेदारी MSME सेक्टर की है। भारत आज अगर 100 रुपए कमाता है, तो उसमें 30 रुपए MSME सेक्टर की वजह से आते हैं।
MSME सेक्टर को सशक्त करने का मतलब है, पूरे समाज को सशक्त करना, सबको विकास के लाभ का भागीदार बनाना, सबको आगे बढ़ाना। इस सेक्टर से जुड़े करोड़ों साथी देश के ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। इसलिए सरकार का प्रयास है कि मेक इन इंडिया के लिए लोकल सप्लाई चेन बने, जो भारत की विदेशों पर निर्भरता कम कर सके। अब इसलिए MSMEs सेक्टर का विस्तार करने पर अभूतपूर्व बल दिया जा रहा है।
MSME सेक्टर को मजबूती देने के लिए पिछले आठ साल में सरकार ने बजट में 650 प्रतिशत से ज्यादा की बढोतरी की है। 11 करोड़ से भी अधिक लोग इससे direct-indirect जुड़े हुए हैं। इसलिए जब 100 साल का सबसे बड़ा संकट, कोरोना, आया तो केंद्र सरकार ने साढ़े 3 लाख करोड़ रुपए की मदद MSMEs के लिए सुनिश्चित की। परिणामस्वरूप, लगभग डेढ़ करोड़ रोज़गार खत्म होने से बचे गए; दुनिया के कई देशों की आबादी से भी ज्यादा बड़ा आंकड़ा है ये।
एक समय था जब पहले की सरकारों ने इस सेक्टर को एक तरह से बांध दिया था; छोटे उद्योगों को छोटा बनाकर रखा जाता था ! छोटे उद्योगों के लिए इतनी संकीर्ण परिभाषा तय की गई थी कि MSME पर हमेशा ये दबाव रहता था कि इससे ज्यादा व्यापार किया तो जो फायदे मिलते हैं, वो मिलना बंद हो जाएंगे। इसलिए स्कोप था तो भी बढ़ना नहीं चाहता था, अगर बढ़ता था तो कागज पर आने ही नहीं देता था।
इसका एक बड़ा दुष्प्रभाव रोजगार पर भी पड़ता था। जो कंपनी ज्यादा लोगों को रोजगार दे सकती थी, वो भी ज्यादा रोजगार नहीं देती थी ताकि वो सूक्ष्म और लघु उद्योग की सीमा से बाहर चली जाती थी! उसको टेंशन रहती थी कि इससे नंबर बढ़ना नहीं चाहिए। इस सोच और इन नीतियों की वजह से कितने ही उद्योगों का विकास और प्रगति रुक गई थी।
इस बाधा को दूर करने के लिए हमने MSMEs की परिभाषा को बदल डाला। सुनिश्चित किया कि अगर कोई उद्योग आगे बढ़ना चाहता है, विस्तार करना चाहता है, तो सरकार न केवल उसे सहयोग दे रही है, बल्कि नीतियों में जरूरी बदलाव भी कर रही है।
आज थोक या रिटेल व्यापारी हों, रिटेल वेंडर्स हों, सभी को MSME की नई परिभाषा के अंतर्गत priority sector lending (प्राथमिकता) वाला लोन मिल रहा हैं। Manufacturing और service sector के बीच के अंतर को भी दूर किया गया है।
आज GeM (https://gem.gov.in/) के माध्यम से सरकार को सामान और सेवाएं मुहैया कराने के लिए MSMEs को बहुत बड़ा प्लेटफॉर्म मिल चुका है। सरकार को कुछ भी खरीदना है तो पहले GeM जाना ही पड़ेगा। अगर वहां नहीं मिला, तो फिर सरकार कहीं ओर से खरीदेंगी। सरकार एक बहुत बड़ा खरीदार होती है; उसे ज्यादातर उन चीजों की जरूरत पड़ती है जिसको MSMEs उत्पादित करते हैं। आज करीब 50-60 लाख विक्रेता GeM से जुड़े हुए हैं, जो तीन-चार करोड़ हो सकते हैं।
पहले सरकारी खरीद में MSME’s के लिए बड़ा कठिन होता था कि टेंडर कहां से भरें। वो बेचारा किसी बिचौलिए को माल दे देता था। अब अगर आप एक थर्मस भी बेचना चाहते हैं, तो सरकार उसे भी GeM खरीद सकती है। मेरे ऑफिस में (प्रधानमंत्री कार्यालय) एक बार एक थर्मस की जरूरत थी, तो हम GeM पोर्टल पर गए तो तमिलनाडु के गांव की महिला ने कहा कि मैं दे सकती हूं। और पीएम ऑफिस में तमिलनाडु के गांव से थर्मस आया, उसको पेमेंट मिल गया, थर्मस से मुझे गरम चाय भी मिल गई, उसका भी काम हो गया। ये GeM पोर्टल की ये ताकत है।
एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है – 200 करोड़ रुपए तक की सरकारी खरीद में अब ग्लोबल टेंडर (अर्थात, विदेशी खरीद) नहीं करना। एक प्रकार से यह MSME’s लिए के लिए रिजर्वेशन हो गया है वो। आप ऐसा करके दिखाइए कि सरकार को निर्णय करने के लिए मजबूर होना पड़े कि आज तो आपने 200 करोड़ किया है, आगे से 500 करोड़ तक विदेशी खरीद पर प्रतिबंध लगा दीजिए, हम 500 करोड़ तक देने को तैयार हैं।
मैंने अपने दूतावासों को भी कहा है कि मैं आपका मूल्यांकन तीन बातों को जोड़ करके करूंगा। एक- ट्रेड, दूसरा टेक्नोलॉजी और तीसरा टूरिज्म। अगर आप उस देश में भारत के प्रतिनिधि हैं तो आपको ये बताना होगा हिन्दुस्तान से कितना सामान उस देश ने इम्पोर्ट किया- ये हिसाब-किताब रखूंगा। और MSME को मुफ्त बेचना नहीं है, कमाना है आपको।

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