Home चलचित्र मोदी जी को वोट कोई सौदा नही: ‘शोले’ का अपाहिज ठाकुर नही, ‘सेवन समुराई’ का गिसकु बनिये

मोदी जी को वोट कोई सौदा नही: ‘शोले’ का अपाहिज ठाकुर नही, ‘सेवन समुराई’ का गिसकु बनिये

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मैं पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूँ कि दिल्ली में शाहीनबाग के धरने और फिर बाद में हुए हिंसात्मक दंगो को लेकर कई राष्ट्रवादी, प्रधानमंत्री मोदी जी और गृहमंत्री अमित शाह पर उंगली उठा रहे है। उनका मानना है कि शाहीनबाग में लोगो को बैठने क्यों दिया गया और सीएए के विरोध में हो रहे उनके धरने को बलपूर्वक हटाया क्यों नही गया? दिल्ली में मुस्लिम समुदाय द्वारा किये गए दंगो के बाद तो गृहमंत्री अमित शाह, इन लोगो की आलोचना के विशेष रूप से शिकार हो रहे है। यहां वे राष्ट्रविरोधी के इस कथानक से अपने आप को अलग नही कर पाए है कि दिल्ली की पुलिस व्यवस्था केंद्र के हाथ है, जबकि धरातल का सत्य यह है कि यह पुलिस आम आदमी पार्टी की केजरीवाल सरकार द्वारा नियुक्त मजिस्ट्रेटों के अंदर काम करती है और न्यायालय पूरी तरह से कांग्रेस जनित इकोसिस्टम से अभी भी प्रभावित है। आलोचना करने वाले यहां यह भी भूल जाते है कि शाहीनबाग के धरने को लेकर सुप्रीमकोर्ट भी, सीधे आदेश देकर, पुलिस को बल प्रदान करने की जगह, धरने से सहानभूति रखने वालों को ही, उनसे वार्ता करने के लिये वार्ताकार बनाती है।  

मैं ऐसे राष्ट्रवादी आलोचकों को सलीम जावेद की लिखी ‘शोले’ फ़िल्म के अपाहिज ठाकुर से ज्यादा नही समझता हूँ। उनकी मानसिकता एक सौदेबाजी की है। जैसे, हाथों से लाचार ठाकुर ने जय वीरू दो उच्चक्कों को 10000 रुपये में डाकू गब्बर सिंह को पकड़ कर उसे हवाले करने का सौदा किया था, उसी तरह अपनी मानसिक दिव्यांगता में उन्हें लगता है कि उन्होंने चुनाव में वोट देकर मोदी और शाह को कट्टरपंथी इस्लाम से बचाने का सौदा किया है। जिस तरह ठाकुर, जय वीरू से गब्बर सिंह को जिंदा पकड़ कर लाने पर अटका था, वैसे ये लोग भी अटके हुये है। 

मेरा ऐसे मित्रो से निवेदन है कि वे ठाकुर की मानसिकता का परित्याग कर, अकीरा कुर्सावा की 1954 की क्लासिक फ़िल्म, ‘सेवन समुराई’ के गियासकु और उसके गांव वालों की मानसिकता का अनुकरण करे। वैसे तो सेवन समुराई की कहानी से प्रेरित होकर बाद में कई फिल्में बनी है लेकिन उसमे सबसे प्रसिद्ध हॉलीवुड की ‘माग्निफ़िशिंट सेवन’ और हाल में हांगकांग में बनी ‘सेवन सोर्ड’ है। भारत मे हिंदी फिल्मों ने इस कथानक को कई बार चुराया गया है, लेकिन अपनी बात समझाने के लिए मैं मूल श्रोत का ही उल्लेख करूंगा।

सेवन समुराई, जापान के सेनगोकु काल(1467-1615) में एक गांव की कहानी कहती है, जो डाकुओं से पीड़ित है। 

यह वह काल है जब आज के भारत की तरह, जापान में पुरानी सामंती व्यवस्था चरमरा गई थी और हर तरफ अराजकता थी। गांव वाले अपनी इस समस्या से निपटने के लिए गांव के बुजुर्ग गियासकु से बात करते है और वह सलाह देता है कि गांव वालो के पास धन नही है इसलिए उन्हें एक भूखे रोनिन समुराई (सामंत विहीन, सामंती सैन्य अभिजात वर्ग का जापानी योद्धा) को खोजना चाहिए, जो उनके गांव में आकर डाकुओं से उनकी प्रतिरक्षा में सहायक हो सके।

गांव वाले इस खोज में निकलते है और उनकी दृष्टि एक वृद्ध हो रहे रोनिन समुराई ‘कम्बई’ पर पड़ती है, जो एक बंधक बनाए गए बच्चे को, डाकू से छुड़ाता है। गांव वाले उससे गांव चलने की विनती करते है, जिसे वह कुछ हिचकिचाहट के बाद स्वीकारता है। वह इस काम के लिए अन्य को भी आमंत्रित करता है और इस तरह सात समुराई वहां पहुंचते है। बाकी आगे की कहानी यही है अगली फसल की कटान से पहले, कैसे ये समुराई, गांव वालों को, गांव के सुदृढ़ीकरण और डाकुओं से लड़ने के लिए तैयार करते है और लड़ते है। डाकुओं का दल कई बार गांव पर आक्रमण करता है लेकिन अंत मे सभी डाकू मारे जाते है और कम्बई के चार समुराई साथी भी मारे जाते है। फ़िल्म के अंत मे एक तरफ गांव वाले अपनी जीत पर नाच गा कर उत्सव मना रहे 

होते है और कम्बई अपने साथियों की चिता जला रहा होता है। कम्बई, एक समन्तविहीन रोनिन समुराई कहता है कि ‘अंत मे हम, यह लड़ाई भी हार गए। यह जीत गांव वालों की है, हमारी नही।’ 

जहां ‘शोले’ के ठाकुर को, रामगढ़ गांव के अस्तित्व को बचाने के लिए नही बल्कि बदला लेने के लिए, जय वीरू की सहायता से गब्बर सिंह को मारना था, वह व्यक्तिगत था। वही पर ‘सेवन समुराई’ के गिसकु के गांव वालों को कम्बई की सहायता से डाकुओं से अपने गांव के अस्तित्व को बचाना था, यह सर्वजन हिताय था। 

मैं हमेशा से यही मानता रहा हूँ कि हम लोगो ने मोदी जी को वोट देकर खरीदा नही है बल्कि वोट देकर, अपनी और आने वाली पीढ़ी की प्रतिरक्षा के लिए ‘कम्बई’ को निमंत्रित किया है। वह हमको वर्तमान की विभीषका के कटुसत्य से परिचय करा कर, उदासीन मन को जाग्रत करा रहा है। हमे आने वाले कष्टों के प्रति मानसिक रूप से दृढ़ और आगे होने वाले आक्रमणों के लिए सजग व तैयार रहने का समय प्रदान कर रहा है। मोदी जी को कम्बई की तरह यह अच्छी तरह पता है कि कल, जब भी विजय होगी तब भारत तो उत्सव मनाएंगे लेकिन वह स्वयं कही नेपथ्य में चिताओं की दार्शनिकता में लोप्त हो चुके होंगे। 

इस लेख का सारांश यही है कि जब आपने मोदी जी को वोट दिया था, तब बहुसंख्यक लोगो को यह संज्ञान ही नही था की भारत समेत उनका अस्तित्व विलुप्तप्रायः के आखरी चरण में पहुंचा हुआ था। वो आगया है तो आपको यह स्वर्णिम अवसर प्राप्त होगया है कि आप आक्रमण की विभीषका और अपनी प्रतिरक्षा करने के लिए मन व तन से तैयार हो जाये। मोदी शाह, जय वीरू नही है जो गब्बर सिंह को आपके कदमो में डाल देंगे। वे कम्बई और उसके साथी है, जो आपको प्रतिरक्षा और लड़ने के लिए तैयार करने आये है। 

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