Home अमित सिंघल वाह-वाही एवं जय-जयकार किसे अच्छा नहीं लगता है?

वाह-वाही एवं जय-जयकार किसे अच्छा नहीं लगता है?

Amit Singhal

by अमित सिंघल
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किसी भी समाज एवं अर्थव्यवस्था को जकड़न से निकालने के लिए, व्यवस्था को बदलने के लिए जो भी निर्णय लिया जाएगा, उससे एक बड़ी संख्या में नागरिकअसंतुष्ट रहेंगे और उसका विरोध करेंगे। चाहे सरकार कितना भी आंकलन कर के; प्रचार कर दे या एक्सप्लेन कर दे।
आखिरकार कृषि सुधार के बारे में सरकार ने एक वर्ष से अधिक समय तक प्रचार किया था; प्रधानमंत्री मोदी से स्वयं कई बार इन सुधारो से होने वाले लाभ के बारे में विस्तार से बताया था। लेकिन अगर कोई समूह जानबूझकर ना “समझना” चाहे तो उसे आप दो वर्ष में भी नहीं समझा सकते।
स्वयं से प्रश्न पूछना चाहिए कि किसी निर्णय के पीछे सरकार का अभिप्राय क्या है? क्या सरकार चुनाव जीतने के लिए, या फिर भ्रष्टाचार, या फिर किसी समूह को प्रसन्न करने के लिए निर्णय ले रही है? या फिर सरकार अगले 10 से 25 वर्ष के लिए राष्ट्र को तैयार कर रही है।
आखिरकार कौन सी सरकार या राजनीतिक दल फ्री की बिजली, पानी, फ्री बस यात्रा, टैक्स में छूट नहीं देना चाहेगा; बस-रेल भाड़ा बढ़ाना चाहेगा? राष्ट्र के हर युवा-युवती को सरकारी नौकरी नहीं देना चाहेगी? सस्ता पेट्रोल-डीजल नहीं बेचना चाहेगा? या फिर, जनता के हाथ में लॉलीपॉप नहीं थमाना चाहेगा?
फ्री बिजली, पानी, बस यात्रा इत्यादि से एक पार्टी एक राज्य एवं एक UT में सत्ता में है। कम्युनिस्ट एवं तृणमूल का बंगाल में शासन लगभग 50 वर्ष पूरे कर लेगा। आज बंगाल की क्या स्थिति है? पंजाब ने केवल कृषि पर लोकलुभावनी नीति जारी रखी। आज वहां कितने उद्योग बचे है?
ममता-नितीश इत्यादि ने रेल भाड़ा नहीं बढ़ाया था? रेलवे में निवेश की कमी से उनके समय में प्रति वर्ष कितने यात्रियों की रेल दुर्घटना में मृत्यु हो जाती थी? 2009-10 और 2014-15 के बीच 6 साल की अवधि में, भारतीय रेलवे में कुल 803 दुर्घटनाएँ हुईं, जिसमें 620 लोग मारे गए और 1855 लोग घायल हुए। अर्थात प्रति वर्ष कम से कम सौ लोगो की मृत्यु एवं 300 घायल। संपत्ति का नुकसान अलग हुआ। यात्री एवं माल ढुलाई में भारी देरी का कोई गणित नहीं।
अब क्या स्थिति है?
यही फार्मूला श्री लंका ने भी अपनाया था। वहां की सरकार ने लोकप्रियता के चक्कर में वर्ष 2019 में लोकल टैक्स (VAT) को एकाएक 15% से घटाकर 8 प्रतिशत कर दिया था; एवं कुछ टैक्स को पूरी तरह समाप्त कर दिया था। क्या परिणाम निकला?
ऐसी क्या सोच थी प्रधानमंत्री मोदी जी की, जब उन्होंने कृषि सुधार, अग्निपथ भर्ती योजना, GST, CAA, सर्जिकल स्ट्राइक, तीन तलाक़, 370 से मुक्ति जैसे निर्णय लिए?
आखिरकार केजरीवाल, ममता, सोनिया की तरह फ्री या सस्ते में सुविधा देते रहते; भले ही सस्ते पेट्रोल का भार आने वाली पीढ़ी पर डाल दिया जाता। या फिर, किशोरियां एवं माताएं सड़क, रेल पटरी किनारे शौच करती रहती। यात्रियों का मल-मूत्र रेल पटरी पर गिरता रहता।
क्या आवश्यकता थी एयर इंडिया का निजीकरण करने का। आखिरकार सरकारी एयर इंडिया से मेरे जैसे लोग चलते थे जिनकी यात्रा को वे लोग सब्सिडाइज करते थे जो कदाचित कभी भी हवाई यात्रा नहीं करेंगे।
सेना में अग्निपथ जैसी भर्ती की क्या आवश्यकता है? सेना का आधुनिकीकरण करने की, सैनिको की औसत आयु को कम करने की क्या आवश्यकता है? क्या पता जब युद्ध हो तो उस समय कोई अन्य सत्ता में हो?
यह कहना तो बहुत आसान है कि प्रधानमंत्री जी दूरदर्शी है, देश के हित की सोचते है, सभी 130 करोड़ भारतीयों की भलाई के बारे में सोचते है। लेकिन क्या पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश के हित में निर्णय नहीं लेते थे? क्या मुख्यमंत्री केजरीवाल और बनर्जी दूरदर्शी नहीं है?
इसको एक अन्य दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करते है।
सोचिये कि एक व्यस्त सड़क पे एक साँड़ उत्पात मचा रहा है। उस सड़क के निवासी आप को कहते है कि अगर आप उस साँड़ को काबू में कर लेंगे तो आपको बीस हज़ार रुपये मिलेंगे। लेकिन अगर आप उस साँड़ को ना पकड़ पाए तो आपसे दस हज़ार रुपये ले लिए जायेंगे। तब आप क्या करेंगे? अब आप को बीस हज़ार का लालच तो है, लेकिन आप दस हज़ार बिना किसी बात के खोना भी नहीं चाहते। ऐसे सोचने वाले आप अकेले नहीं है। हम सभी मूलतः loss averse या नुकसान से हिचकते है। यही सोच अधिकतर नेताओ की होती है।
अब सोचिये कि आप स्वयं प्रधानमंत्री मोदी है। आपको पता है कि वह साँड़ – जिसका नाम पुरानी सोच एवं रणनीति पर आधारित सेना है जिसका सामना आज के चीन से है – आपके सामने खुल्लम-खुल्ला घूम रहा है। अगर आप उसको कंट्रोल में करने का प्रयास करते है, तो आपका इनाम सशक्त, आधुनिक, औसतन कम आयु की सेना है। अनुशासित युवा है। अगर उस प्रयास में आप ना सफल हो पाए और राष्ट्र को सुरक्षित ना कर पाए, तो चुनाव में हार। क्या आप उस साँड़ को एक बार – एक बार ही सही – काबू में करने का प्रयास करेगे? नहीं? आप जैसा है वैसा ही चलने देंगे; अपनी कार का काला शीशा ऊपर करेंगे, और राहुल की तरह विदेश में छुट्टी मनाएंगे।
यह बात अर्थशास्त्र में नोबेल प्राइज विजेता प्रोफेसर Daniel Kahneman ने अपनी पुस्तक “Thinking Fast And Slow” में लिखी है। वे लिखते है कि जिंदगी में बहुत से पड़ाव ऐसे आते है कि जिसमे नुकसान का खतरा होता है और लाभ के अवसर की सम्भावना भी होती है।
एक सच्चे लीडर की पहचान इसमें है कि वह उन लाभ के अवसर को पहचाने, और उन पर कार्य करे। ना कि चुनाव में हारने की संभावना के कारण निर्णय ही ना ले।
नहीं तो चुनाव जीतने के लिए ममता, उद्धव, पवार, केजरीवाल, सोनिया तो है ही जो आपको लॉलीपॉप पकड़ाने के लिए तैयार बैठे है।

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