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श्री गुलाब कोठारी जी के नाम खुला #पत्र_02

by Pranjay Kumar
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आदरणीय गुलाब कोठारी जी!
सादर नमस्कार।
आपकी पत्रिका में “हिन्दू कौन?” शीर्षक से आपका सम्पादकीय लेख पढ़कर सहसा विश्वास नहीं हुआ कि एक विद्वान् और भारतीय शास्त्रों के ज्ञाता के रूप में प्रसिद्ध हुआ कोई सम्पादक–पत्रकार ऐसा तथ्यहीन और अतार्किक लेख लिख सकता है। हिंदू और हिंदुत्व शब्द को लेकर जब कुछ राजनैतिक नेतागण वोटों के खातिर मनमानी और बेसिरपैर की व्याख्याएँ कर रहे हैं और कोटि–कोटि हिंदू जनता द्वारा उपहास का पात्र बन रहे हैं; आपने भी उसी तरह के सतही और अनर्गल विचार प्रस्तुत कर स्वयं को उपहास का पात्र बनाया है।
आप जैसे विचारशील व्यक्ति के द्वारा ऐसा विचारहीन प्रतिपादन देखकर मन बहुत क्षुब्ध हुआ। अतः यह सब लिखने को विवश हुआ हूँ। चूँकि आपकी ख्याति एक शास्त्रज्ञ और विद्वान् संपादक–पत्रकार की है, अतः आपसे विनम्र निवेदन भी है कि इस संबंध में पुनः कुछ और अध्ययन कीजिएगा। कृपा करके यह नई कहावत न बन जाने दें कि – *”बन्दर के हाथ उस्तरा लगने से ज्यादा ख़तरनाक है बंदर के हाथ कलम आना।”*
आश्चर्य की बात है कि इस विषय में अनेक मनीषी विद्वानों, भाषाविदों और संस्कृतिकर्मियों के जो निष्कर्ष निकाले हैं, उनको पढ़े–समझे बिना ही आपने अपने अधकचरे और अनर्गल विचार रख दिए। ऐसा करके आपने करोड़ों हिन्दुओं के मर्म पर आघात पहुँचाया है।
आश्चर्य तो इस बात का भी है कि एक ऐसे समय में जबकि वोटों के लालच में कतिपय राजनैतिक नेताओं द्वारा हिन्दुत्व एवं हिन्दू धर्म पर बचकानी और मूर्खतापूर्ण टिप्पणियाँ की जा रही हों, जब एक जिम्मेदार सम्पादक–पत्रकार को ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर विवादास्पद और भड़काऊ बातों से बचना चाहिए था; आपने तो उलटे उस आग में घी घालने का कार्य कर दिया।
परमात्मा आपको सद्बुद्धि प्रदान करे।
आँखें खोल देने के लिए यद्यपि बहुत सामग्री है, पर हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधा और आधुनिक साहित्यिक पत्रकारिता के जनक आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का लेख *हिन्दू शब्द की व्युत्पत्ति*, (जो सरस्वती के जून 1906 अंक में प्रकाशित है) यदि आप खोज कर पढ़ेंगे तो अवश्य ही आपका भ्रमनिवारण हो सकेगा। आधुनिक मनीषी–विचारकों ने इस विषय पर सौ–सवा सौ वर्ष पूर्व ही बहुत शोध–अध्ययन कर बोधप्रद लेख लिख दिए, ताकि कोई भ्रान्ति न रहे। हिन्दी से भी पूर्व बंगला भाषा में इस पर खूब लिखा गया है। भारत की प्रथम महिला संगठनकर्त्री विदुषी सरलादेवी रायचौधुरी का नाम तो आपने सुना ही होगा, इन्होंने भी यही प्रतिपादित किया है कि हिन्दू नाम सिन्धु से उत्पन्न नहीं होकर अत्यंत प्राचीन है।
मैं आचार्य द्विवेदी के उक्त लेख के कुछ अंश आपके ध्यानार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ, जो इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि हिंदू शब्द की व्युत्पत्ति इस्लाम या मुसलमानों से हजारों वर्ष पूर्व की है और यह एक सम्मानित एवं गौरवप्रद शब्द रहा है।
जहां तक हिंदू शब्द की परिभाषा का प्रश्न है, विश्व के सबसे बड़े, व्यापक और प्रभावी हिंदू संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गोलवलकर (गुरुजी) ने भी यह स्पष्टतः माना है कि हिंदू शब्द अत्यंत व्यापक होने के कारण अपरिभाष्य है। किंतु कुछ लक्षणों और प्रवृत्तियों के आधार पर इसे चिन्हित किया जा सकता है। हिंदुत्व की सर्वशुद्ध और निर्दोष‌ परिभाषा संभव नहीं होने पर भी कुछ ऐसे लक्षण अवश्य हैं, जो व्यक्ति के हिंदुत्व को प्रकट करते हैं। यहाँ इसका विवेचन विषयान्तर होगा।
आपका शुभेच्छु:
*इंदुशेखर तत्पुरुष (मोबा. 8387062611)*
*सम्पादक – साहित्य परिक्रमा, जयपुर।*
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*हिन्दू शब्द की व्युत्पत्ति*
(आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी)
” ………..फ़ारसी में हिन्दू शब्द यद्यपि रूढ़ हो गया है तथापि वह उस भाषा का नहीं है। लोगों का ख़याल है कि फ़ारसी का हिन्दू शब्द संस्कृत सिंधु शब्द का अपभ्रंश है। वह लोगों का केवल भ्रम है।………..
ईसा के पाँच सौ वर्ष बाद मोहम्मद का जन्म हुआ। उनके जन्म के कोई साढ़े सात सौ वर्ष बाद मुसलमानों ने हिन्दोस्तान पर पदार्पण किया। यदि हिन्दू शब्द मुसलमानों का बनाया हुआ है तो उसकी उमर बारह सौ वर्ष से अधिक नहीं। परन्तु पाठकों को सुनकर आश्चर्य होगा कि हिन्दू शब्द ईसा के जन्म से भी कई हजार वर्ष पहले का है।…… फिर है कहाँ? वह है अग्निपूजक पारसियों के धर्मग्रन्थ जेन्दावस्ता में। जिन पारसियों को आजकल हिन्दू लोग धर्म संबंध में बुरी दृष्टि से देखते हैं उन्हीं के प्राचीनतम ऋषियों और विद्वान् पंडितों ने हिन्दू शब्द के आदिम रूप को अपने धर्मग्रंथ में स्थान दिया है। वह आदिम रूप “हन्द्” शब्द है।
यहूदियों की धर्म–पुस्तक ओल्ड टेस्टामेंट (बाइबल के पुराने भाग) में भी “हन्द्” शब्द पाया जाता है।
…….बंगला संवत् 1306 के जेष्ठ की ‘भारती’ नामक बंगला मासिक पत्रिका में भारतीय संपादक श्रीमती सरला देवी, बी.ए. लिखित एक प्रबंध छपा है उसका नाम है ‘हिंदू और निगर’। उसमें लिखा है,–
” हिंदू शब्द संस्कृत सिंधु शब्द से उत्पन्न नहीं है। ज़ेन्दावस्ता नामक पारसियों का पुराना धर्मग्रंथ वेदों के समय का है। उसमें हिंदू शब्द एक दफा आया है। हारोबेरेजेति (अल्बुर्ज) पहाड़ के पास पहले–पहल ऐर्यन–वयेजो (आर्य निवास) था। धीरे–धीरे अहर्मजदा ने (पारसियों के परमेश्वर ने) 16 शहर बसाये।उनमें से 15वें शहर का नाम हुआ ” हफ़्त हिंदव”। वेदों में इसी को “सप्तसिंधव” कहते हैं।…… “
इससे मालूम हुआ कि हिंदू शब्द यवनों की संपत्ति नहीं, उसे मुसलमानों ने नहीं बनाया। ज़ेन्दावस्ता नामक अति प्राचीन और पारसियों के अति पवित्र ग्रंथ में उसका प्रयोग सबसे पहले हुआ।
यहूदियों का धर्मशास्त्र ओल्ड टेस्टामेंट 39 भागों में बँटा हुआ है। अथवा यों कहिए कि उसमें जुदा-जुदा 39 पुस्तकें हैं। उनमें से 17वीं पुस्तक का नाम है बुक ऑफ यस्थर (The Book of Esther)। इसका हिब्रू नाम है ‘आजथुर’। इसके पहले अध्याय में है–
“Now it came to pass in the days of Ahasuerus, this is Ahasuerus which reigned from India even to Ethiopia over an hundred and seven and twenty provinces – Esther, Chapter 1, Verse.”
अर्थात् अहासुरस् राजा ने इंडिया से इथोपिया तक राज किया। अब इस बात का विचार करना है कि ‘इंडिया’ (हिंदुस्तान) शब्द किस अर्थ का वाचक है। याद रखिए यहूदियों का ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ ग्रंथ ईसा के पाँच हजार वर्ष पहले का है। वह हिब्रू भाषा में है। उसी के अंग्रेजी अनुवाद में “इंडिया” शब्द आया है।अच्छा, तो यह “इंडिया” शब्द किस हिब्रू शब्द का अनुवाद है? यह पूर्वोल्लिखित “हन् द्” शब्द का भाषांतर है। हिब्रू में “हन् द्” शब्द का अर्थ है विक्रम, गौरव, वैभव, प्रजा, शक्ति, प्रभाग इत्यादि। यह बात ओल्ड टेस्टामेंट में “उसे साबित की जा सकती है। परंतु उन सब प्रमाणों को देने से लेख अधिक बढ़ जाएगा। इससे हम उन्हें नहीं देते।…….
अतएव, –”हन्द्” से ईथोपिया तक राज्य किया”– इस वाक्य का अर्थ हुआ, “हन्द् (शक्ति विशिष्ट राज्य) से लेकर इथोपिया तक राज्य किया।” जिनको इस बात का विश्वास न हो वह डॉक्टर हेग का बनाया हुआ अंग्रेजी–हिब्रू व्याकरण देखने की कृपा करें।
थराक्लूश नामक एक ग्रीक ग्रंथकार ने लिखा है, “भारतवर्ष का विक्रम और गौरव देखकर ही यहूदी लोग इस देश को “हन्द्” कह कर पुकारते थे।” अब देखना है कि यहूदी लोगों ने इस “हन्द्” शब्द को पाया कहां से? पाया उन्होंने पारसियों के ज़ेन्दावस्ता से। प्रमाण–
1. यहूदियों के देश में बहुत काल तक पारसियों ने राज्य किया। उनके राज्य काल में यहूदी अदालतों में ज़ेन्द भाषा ही बोलते थे। वे लोग ज़ेन्दावस्ता पढ़ते थे। इससे –पारसियों के हिंदव शब्द से– यहूदी जरूर परिचित रहे होंगे। इसमें कोई संदेह नहीं।
2. यहूदियों ने ज़ेन्दावस्ता के अनेक देश, पर्वत और नदियों आदि के नाम लिए हैं।
हिब्रू भाषा कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है। वह ज़ेन्द भाषा से उत्पन्न है। अतएव यह बात अखंडनीय सत्य है कि ज़ेन्द भाषा के हिंदव शब्द ने ही हिब्रू भाषा में “हन्द्” रूप धारण किया। उसकी पुष्टि में अनेक प्रमाण दिए जा सकते हैं। पाठक, आपने महाजनों की मुँड़िया लिपि देखी है। न देखी होगी तो उसकी विशिष्टता से आप जरूर ही वाकिफ होंगे। उसमें आकार, इकार, उकार आदि की मात्राएं नहीं होती। इसमें बाबा, बीबी, बूबू, बोबो सब एक ही तरह लिखे जाते हैं। अपेक्षित शब्द पढ़ने वाले अपनी बुद्धि से पढ़ लेते हैं। इसी कारण से कभी–कभी मामा की मामी, किश्ती की कुश्ती, घड़ा का घोड़ा और ‘अजमेर गए’ का ‘आज मर गए’ हो जाता है। हिब्रू भाषा भी ऐसी ही है। उसमें भी अकार, उकार आदि नहीं है। यह दाहिने हाथ की तरफ से लिखी जाती है। उसकी पुत्री अरबी और प्रपौत्री फारसी भाषा है। इन दोनों भाषाओं में ज़ेर, ज़बर, और पेश आदि चिह्नों के प्रयोग वैयाकरणों ने अकार, इकार और उकार का उच्चारण किसी प्रकार निश्चित कर लिया है। पर हिब्रू में यह बात अब तक नहीं हुई है।
जो कुछ यहां तक लिखा गया उससे यह सिद्धांत निकला कि–
*1. हिंदू शब्द पहले ज़ेन्दावस्ता में प्रयुक्त हुआ।*
*2. पारसी लोग इस शब्द के सृष्टिकर्ता हैं।*
*3. यहूदियों ने इसे अपनी भाषा में लेकर हन्द् कर दिया।*
ईथियोपिया राज्य का हिब्रू नाम है कुश (Cush)। बाइबल (ओल्ड टेस्टामेंट) की पहली पुस्तक, जेनोसिस, के दूसरे अध्याय की तेरहवीं आयत में उसके किनारे टीका में लिखा है कि ईथियोपिया को यहूदी लोग ‘कुश’ कहते थे। मूल हिब्रू में ईथियोपिया नहीं है, उसके जगह कुश ही है। इसी कुश शब्द ने भाषा में कोश (Cosh) रूप धारण किया।……….
ग्रीक लोगों ने हन्द् देश की सीमा के अथवा हन्द् देश के सीमाज्ञापक पर्वत के अर्थ में इस पहाड़ का नाम ‘हन्द्कोश’ रखा। अपभ्रंश होते–होते वह हन्द्कोश से इंडिकस हो गया। यही “इंडिकस” अंग्रेजी राज्य में “इंडिया” हुआ।
अब देखिए, *ज़ेन्दावस्ता का हिन्दव हिब्रू भाषा में हुआ हन्द्।हिब्रू भाषा का हन्द् ग्रीक भाषा में हुआ हन्द्कोश–इंडिकस।ग्रीक भाषा का इंडिकस अंग्रेजी में हुआ है इंडिया।*
*इस प्रकार ज़ेन्दावस्ता का ‘हिन्दव’ शब्द पश्तू में ‘हन्द’ तक पहुंचा। सिक्ख धर्मप्रवर्तक गुरु नानक के सैनिक शिष्यों ने गुरुमुखी भाषा में उसे ‘हिन्दु’ कर दिया। नानक से पहले यह शब्द हिन्दव, सिन्धव, हन्द् और हन्द तक रहा। हिन्दु वंशावतंस सिक्खों ने अंत में उसे “हिन्दू” के रूप में परिवर्तित कर दिया।*
जो लोग कहते हैं कि हिन्दू शब्द सीमाबद्ध है वह बड़े ही भ्रान्त हैं।कहाँ फारस, कहाँ यहूदी देश, कहाँ ग्रीस, कहाँ अहासुरस का राज। सब कहीं वही प्राचीन हिंदू नाम!
इस विवेचना से सिद्ध हुआ कि हिंदू शब्द का अर्थ है, विक्रमशाली, प्रभावशाली आदि। सुप्रसिद्ध फ़रासीसी लेखक जाकोलियेत (Jaqulieth) ने अपने एक ग्रंथ में लिखा है, “असाधारण बल और असाधारण विद्यावत्ता के कारण पूर्वकाल में भारतवर्ष पृथ्वी की सारी जातियों का आदरपात्र था।” जिस हिंदू जाति की साधना, वीरता, विद्या, वैभव और स्वाधीनता आदि देखकर पारसी, यहूदी, ग्रीक और रोमन लोग मोहित हो गए और मुसलमान इतिहास–लेखकों ने जिस देश को स्वर्ग–भूमि कहकर उल्लेख किया, क्या उसी देश के रहने वाले काफ़िर, काले, गुलाम कदाकार और पारस्वापहारी कहे जा सकते हैं? यह बात क्या कभी विश्वासयोग्य मानी जा सकती है? हिंदू शब्द कदर्थ बोधक नहीं। हिंदू शब्द गौरव, गरिममा और वीरत्व का व्यंजक है।
तो कहिए क्या आप सब हिंदू नाम छोड़ना चाहते हैं? जो ज्ञान, विज्ञान और सर्वशास्त्रीय तत्वों का आदर्श है, जो प्राण–शीतलकारी ब्रह्मविद्या का आकार है,जो विक्रम और विभव की खानि है, वही पवित्र और प्रशस्त हिंदू–नाम हमारे मस्तिष्क की मणि है, हमारे देश का गौरव है, हमारी जाति के महत्व का व्यंजक है।×××××
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*(जून, 1906 की सरस्वती में प्रकाशित)*

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