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कोटा में 25 बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं

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“मंत्री जी,इस साल कोटा में 25 बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं,आपका क्या कहना है इस बारे में?”
“क्या कहें भाई?क्या कहें बताइए?अब देखिए,हर साल ढाई से तीन लाख बच्चा लोग इधर आता है ना अपना कैरियर बनाने,अब उसमें से 20–25 मानसिक रूप से कमज़ोर हों तो क्या किया जाए?भाई,हमारे तो बाबूजी कहते थे,*आत्महत्या कायर लोग करते हैं*,और हम तो कहते हैं,कोटा में कायर बच्चों को आना ही नहीं चाहिए!
यहां बस वही जीतेगा,जो बहादुर होगा,जो मानसिक रूप से मजबूत होगा,केंद्र सरकार नौकरी दे नहीं रहा है ना ज्यादा,तो
कंपटीशन तो बढ़ेगा ही न?अब राज्य सरकार हर किसी बच्चे के दिमाग में नहीं घुस सकती ना?बाकी हम लोग ने कोचिंग मालिकों को बोला है,हर हफ्ता वाला परीक्षा लेना बंद करें कुछ दिन के लिए और मकान मालिक को बोला है,स्प्रिंग वाला पंखा लगाएं,और बालकनी में नेट लगाएं,अब इससे ज्यादा और क्या कह सकते हैं?”
“पर,मंत्री जी 25 बच्चे..8 महीने में..”
“अरे भाई क्या 25–25 लगा रखा है?बाकी ढाई तीन लाख कैसे जिंदा है?कैसे वो लोग आत्महत्या नहीं करा?वो भी तो प्रेशर झेल रहा होगा न,अगर प्रेशर है तो?वो लोग तो कोई शिकायत नहीं कर रहा,तो आप लोग क्यों कायर बच्चों को खबर बना रहे हो?बाकी ढाई–तीन लाख का मनोबल गिराना है या केंद्र सरकार से,राज्य सरकार की छवि खराब करने का आदेश मिला है?चलिए हटिए,चुनाव सर पर है और आप लोग फालतू की बात को मुद्दा बना रहे हैं,कोई और मुद्दा तलाशिए भाई”
प्रेशर कूकर भारत के किचन 1959 में आया और अब हर घर का हिस्सा बन गया,एक ऐसा साधन जो,हर चीज़ को जल्दी पकाने का दावा करता है,पर सच क्या है?क्या वाकई प्रेशर कूकर में दाल पकती है?
सही उत्तर है नहीं..
प्रेशर कूकर में दाल पकती नहीं..
फटती है..फटी हुई दाल को हम पका हुआ मान लेते हैं..
दाल तो पकती है हांडी पर मध्यम आंच पर..
उस दाल में स्वाद भी होता है और वो सेहतमंद भी होती है..
कोटा जिला देश के कई प्रेशर कूकर्स में से सबसे प्रचिलित प्रेशर कूकर है,जहां प्रतियोगी छात्र प्रेशर में फट जाते हैं..
कोटा उन्हें मानसिक रूप से फाड़ देता है..
और कुछ के कोमल निर्जीव शरीर पोस्ट मॉर्टम की रक्त रंजित मक्खियों से भिनभिनाती टेबल पर फाड़ दिए जाते हैं..
उनमें से कुछ डॉक्टर बनने के लिए भेजे गए थे,उन्हें क्या पता था,एक दिन वो खुद सब्जेक्ट बन टेबल पर डाइसेक्ट हो रहे होंगे और एक सरकारी डॉक्टर,
उनकी मृत्यु का कारण तलाश रहा होगा..
पर इस सब पर कौन ध्यान देता है?
ये तो फेलियर हैं,फेलियर पर क्यों ध्यान देना?
ध्यान तो जाता है,बड़े बड़े होर्डिंग्स पर..
होर्डिंग्स से पटे हुए शहर पर..
और उनमें दिखाए गए चेहरों,नामों,
उनमें ऑल इंडिया रैंक पर…
कोटा में किस उम्र के बच्चे अकेले हॉस्टल में रहने के लिए भेजे जाते हैं?उत्तर है 12 वर्ष से 16 वर्ष..
इन बच्चों को उनके माता पिता अपने सपनों को पूरा करने,खुद से अलग कर,एक हॉस्टल के सहारे छोड़ देते हैं..
कोटा में कोचिंग और स्कूल में कोई स्क्रीनिंग,कोई एंट्रेंस एग्जाम नहीं लिया जाता है,बस पैसा फेंको और एडमिशन लो,कोटा के किसी भी शिक्षण संस्थान को बच्चे की कैपेबिलिटी से मतलब नहीं है,ना उसकी सब्जेक्ट के प्रति पसंद–नापसंद से मतलब है,ना ये मतलब है कि वो बच्चा उस विषय में कितना अच्छा या बुरा है,उसको बस अकाउंट में ट्रांसफर हुई धनराशि से मतलब है,और धनराशि न आने पर,पैरेंट्स को कॉल और मैसेज भेजने से मतलब है,सारी धन राशि एडवांस ली जाती है।
जिसने भी महाराष्ट्र के मुंबई में स्थित अंधेरी या गोरेगांव स्टेशन पर शाम 6 से 8 बजे की भीड़ को लोकल ट्रेन में चढ़ते उतरते देखा है,वो कोटा में स्कूल और स्कूल से ज़्यादा कोचिंग संस्थान में बच्चों की भीड़ के बीच उस फीलिंग को रोज़ देख सकता है,या कहें ईद या किसी त्योहार पर किसी खान एक्टर की मूवी के लिए मूवी थिएटर में जुटती उसके छपरी फैंस की भीड़,बस वैसी ही भीड़ कोचिंग संस्थान के अंदर बाहर,एस्केलेटर्स पर रहती है वो भी रोज़।
कोटा की इकोनॉमी को किसी एमबीए डिग्री धारक को समझना हो,तो उसका उत्तर एक शब्द में है,”एस्पिरेंट”!
कोई इंजीनियर बनने आया है,कोई डॉक्टर बनने..
कोई भेजा गया है अपने माता पिता की उन इच्छाओं की पूर्ति के लिए,जो वो नहीं कर पाए,या अपने माता पिता की ईर्ष्या,लालसा को तृप्त करने के लिए।
“आपके बेटे सुशांत की क्या एज थी,
जब आपने उसे कोटा भेजा था?”
“12..”
“आपको नहीं लगा,कि सुशांत बहुत छोटा है,अपने माता पिता,अपनी फैमिली,अपने शहर,अपने राज्य बिहार से
1100 किलोमीटर दूर यहां अकेले रहने के लिए?”
“नहीं लगा,क्योंकि मेरे बॉस का लड़का शशांक भी उसी की उम्र में यहां भेजा गया था,तो मुझे लगा,जब मेरे बॉस का लड़का कोटा में जा कर,डॉक्टर की तैयारी कर सकता है तो मेरा क्यों नहीं”
“मतलब,आपने सुशांत को कोटा बस इसलिए भेजा क्योंकि आपके बॉस ने अपने लड़के शशांक को भेजा था वहां पढ़ने?”
“क्या गलत है इसमें?सपने देखना कहां से गलत है?”
*सपने देखना गलत नहीं वर्मा जी,सपने थोपना गलत है”
“मैंने कुछ नहीं थोपा सुशांत पर,कोई प्रेशर नहीं डाला,पता नहीं उसने ऐसा कदम क्यों उठाया”
“अच्छा,आपके बॉस का लड़का शशांक,उसका क्या हुआ?वो पढ़ रहा है अच्छे से अभी भी कोटा में?”
“उसने भी..सुशांत के एक दिन बाद..”
“दो 14 वर्ष के बच्चे,एक के बाद एक आत्महत्या कर लेते हैं,और आप कहते हैं,कोई प्रेशर नहीं था आप लोगों की ओर से?पता है उन दोनों बच्चों के लेटर में क्या बात कॉमन थी?
दोनों ने आप माता पिता को लिखा था,*सॉरी मम्मी,सॉरी पापा हम आपकी एक्सपेक्टेशन पूरी नहीं कर पाए*।
दोनों बच्चे एक दूसरे से अलग रहते थे,सुशांत विज्ञाननगर में रहता था,और शशांक महावीर नगर में,दोनों का आपस में कोई संपर्क नहीं था,पर फिर भी दोनों ने एक एक दिन के गैप पर आत्महत्या करी”
“मुझे नहीं पता कुछ,मुझसे ये सब मत पूछिए,मुझे अभी सुशांत की मां को संभालना है”
10,000 करोड़ की एजुकेशन इंडस्ट्री है कोटा,ऐसी इंडस्ट्री जिससे राजनेताओं के पार्टी फंड भी भरते हैं,और पुलिस अफसर की जेबें भी,और मीडिया का मूंह भी बंद हो जाता है,क्यों?क्योंकि इंडस्ट्री में प्रोडक्ट की कमी नहीं होनी चाहिए..
प्रोडक्ट हैं वो ढाई से 3 लाख बच्चे..
कुछ माता पिता में से एक अपने बच्चे के साथ कोटा में रहने आ जाते हैं,1 बीएचके फ्लैट में,जब माता पिता नहीं आ पाते तो दादा दादी या नाना नानी में से कोई एक आ जाता है,और ब्रोकर और मकान मालिक मालामाल होते रहते हैं..
जिन बच्चों का कोई नहीं होता यहां उनके हॉस्टल माता पिता को ये विश्वास दिलाते हैं कि ₹15000 में, वो उनके बच्चे के खाने पीने,रहने का पूरा ध्यान देंगे..बस वो महीने की पहली तारीख को,उनके अकाउंट में,
बिना मांगे वो राशि डलवाते रहें और निश्चिंत रहें।
कोचिंग संस्थान कहते हैं,आपके बच्चे को हम इंजीनियर/डॉक्टर बना कर ही वापस भेजेंगे,आप इसे तपस्या समझें एक तरह की और हम पर विश्वास कर भेज दें,आपका बच्चा हमारी जिम्मेदारी..पर होता क्या है?
बच्चे को उसकी परफॉर्मेंस के नाम पर,सेक्शन में डिवाइड कर दिया जाता है,जो अच्छा परफॉर्म करते हैं,उनको बेहतर सुविधाएं दी जाती हैं,अलग तरह से ट्रीट किया जाता है,और जो खराब परफॉर्म करते हैं,उन्हें रोज़ धमकाया और बेइज्जत किया जाता है,ये बोला जाता है कि *तुम अपने माता पिता का पैसा बरबाद करने यहां आए हो,तुम जीवन में कुछ नहीं बन पाओगे।*
कोटा के मंदिरों की दीवारें प्रार्थनाओं से पटी पड़ी हैं,वहां बस एक बात कॉमन है,*प्लीज़ भगवान जी, प्लीज़ एग्जाम क्लियर करवा दो,ताकि मैं अपने मम्मी पापा के सपने पूरा कर सकूं।*
बच्चों यहां प्रेशर के साथ साथ,बहुत जल्दी भटक भी जाते हैं पढ़ाई से,एक तो माता पिता के सामने न होने का डर खत्म होता है और दूसरा,पढ़ाई के प्रेशर से बचने के लिए दूसरों की देखादेखी बच्चे कम उम्र में रिलेशनशिप और ड्रग्स की ओर भी मुड़ते हैं,कई नाबालिग लड़कियों ने कोटा के अस्पतालों में अबॉर्शन करवाया है,कई नाबालिग लड़कों के पास से कंडोम और लड़कियों के पास से आईपिल बरामद हुई है,पर कोचिंग संस्थान और हॉस्टल ओनर्स को,
इससे कोई मतलब नहीं..
उन्हें बस पैसों से मतलब है..
इनमें से कई लड़कियों ने इन्हीं सब के चलते आत्महत्या करी है,अलग अलग माहौल से आए लड़के लड़कियों को उनकी बोली,उनके पहनावे,उनके खानपान के लिए भी बहुत कुछ कम उम्र में झेलना पड़ता है,और लगातार बेइज्जती महसूस करने से वो टूट जाते हैं,फिर या तो वो ड्रग्स की तरफ़ मुड़ते हैं या सीलिंग फैन की ओर..
सीलिंग फैन से लाशें उतरती हैं,कमरा साफ़ होता है,और हॉस्टल ओनर्स ब्रोकर को कमरा खाली है,
का मैसेज भेज देते हैं।
“भाई देखो,यहां इतने बच्चे पढ़ने आते हैं,माता पिता तो हमारे ऊपर छोड़ कर जाते हैं,पर हम क्या करें,अब हर किसी का ठेका तो ले नहीं रखा है हमने,और ये तो उम्र होती है बहकने की,ये तो उम्र होती है गलतियां करने की,हमने भी करी थी,पर देखो आज हमारे 7 हॉस्टल चल रहे हैं कोटा में,हमने भी सीखा न गलतियों से,ये भी सीख जाएंगे”
“पर उनके पास से ड्रग्स मिले हैं”
“अरे वो ड्रग्स नहीं भाई,वो तो प्रसाद है,आप लगता है नास्तिक हो,बच्चे प्रसाद नहीं लेंगे तो टेंशन से मर जाएंगे”
“नास्तिक नहीं हूं,और वो ड्रग्स है,ना कि प्रसाद,पर वो नाबालिग हैं,उनके मस्तिष्क पर उसका गलत असर होता है,और मर तो रहे हैं,और कैसे मरेंगे,उनके सोचने समझने की शक्ति समाप्त हो रही है इस ड्रग्स से!”
“कितने मरे इस साल 27?बस 27 ना?अब आप हिसाब लगाओ पत्रकार बाबू,आते कितने हैं यहां हर साल?
लगभग 3 लाख,अब अगर इतना ही खराब होता कोटा तो 3 लाख में मात्र 27 क्यों आत्महत्या करते?आप कोटा को फर्जी में बदनाम कर रहे हो,फेलियर थे,कायर थे,कमज़ोर थे,इसलिए फांसी लगा लिए,वो देखो होर्डिंग,वो नाम देखो,वो देखो बच्चे जो डॉक्टर बन गए,वो देखो जो इंजीनियर बन गए,उन पर कहानी लिखो,यहां इन 27 बच्चों पर लिखकर कुछ नहीं बदल पाओगे आप,यहां फिर अगले साल 3 क्या 4 लाख बच्चे भेजेंगे उनके माता पिता,क्योंकि किसी को अपने बॉस को दिखाना है,किसी को अपने रिश्तेदार को दिखाना है,कोई खुद डॉक्टर/इंजीनियर नहीं बन पाया तो किसी का पहला प्यार,कोई डॉक्टर/इंजीनियर ले गया,कोई खुद डॉक्टर/इंजीनियर है,तो उसे अपने बच्चे को डॉक्टर/इंजीनियर बना अपनी पारिवारिक परंपरा चलाना है।तो बाबू ये चलता रहेगा,क्योंकि एक भी इनमें से निकल जाता है,तो सोशल मीडिया से प्रिंट और तुम्हारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इन्हीं की कहानियों से भर जाता है,हर कोई अपने बच्चे की फोटो लगा लेता है,बधाई संदेश आते हैं और उन बधाई संदेश देने वाले में से कई और माता पिता जन्म लेते हैं जो फिर एक ख्वाइश को जन्म देते हैं,ख्वाइश बच्चे को कोटा भेज डॉक्टर/इंजीनियर बनाने की,और वो जितना भेजेंगे उतना कोटा में हम जैसे लोगों का बिजनेस बढ़ेगा,तो जाओ बाबू हमारा बिजनेस मत खराब करो,तुम्हारे लिखने से कुछ नहीं बदलेगा,
कोटा की कथाएं ऐसे ही चलती रहेंगी।”
कोटा की कथाएं कुछ लोगों के लिए शायद बस,
काल्पनिक कथाएं ही हैं..
और कुछ के लिए उनके बच्चों की अंतिम कथाएं..
जो आरंभ होने से पूर्व ही समाप्त हो गईं..
बस ऐसे ही..
ऐसी छोटी अनसुनी कथाएं जिनके बारे में,
कोई बात करने को तैयार नहीं..
क्योंकि कुछ के पास अब कुछ बचा ही नहीं बात करने को..
और कुछ को लगता है,उनके बच्चों के साथ ऐसा नहीं होगा..
और कुछ जो दोषी हैं वो अपना दोष मानने को तैयार नहीं..
आप जो भी हों..
इस कथा को पढ़ने के बाद,
एक बार शांत मन से खुद से पूछिए,
“क्या ये मात्र आत्महत्याएं हैं?
या इन बच्चों की नृशंस हत्याएं??”
“क्या कोटा भेजना इन्हें इतना ज़रूरी था?
क्या बिना कोटा भेजे ये वो नहीं बन सकते थे,
जो आप इन्हें बनाना चाहते थे?”
“और अगर नहीं भी बनते ये वो,तो क्या इनका ज़िंदा रहना और अपनी अलग कथा लिखना,
आपके लिए काफ़ी नहीं था???”
सोचिएगा..
उनके लिए जिन्हें बचाया जा सकता है..
जिनकी कथा को एक नया मोड़ दिया जा सकता है..
सोचिएगा..

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