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इजराइल एवं हमास का युद्ध

by अमित सिंघल
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इजराइल एवं हमास के युद्ध को जिस एंगल से भी देखना चाहे, इजराइल के लिए सभी विकल्प हानिकारक है। अगर अपने 1300 नागरिकों एवं पर्यटकों की नृशंस हत्या के बाद इजराइल कोई एक्शन नहीं लेता, तो हमास को अगले हमले के लिए प्रोत्साहित करते है।
अगर गाजा पट्टी पर अटैक करता है, तो हमास उसके लिए तैयार बैठा है। अगर इजराइली हमले में गाजा के आम नागरिको – जिसमे शिशु, बच्चे एवं महिलाए भी सम्मिलित है – की मृत्यु हो जाती है, तो उदारवादी समाज इजराइल के नेतृत्व पर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय में केस चला देगा।
आखिरकार एक राज्य (राष्ट्र) द्वारा शिशुओं, बच्चो एवं महिलाओ की हत्या कैसे की जा सकती है? जबकि ऐसी नृशंस हत्या एक आतंकी समूह कर सकता है। तभी वह आतंकी भी कहलाता है।
लेकिन इजराइल आतंकी राष्ट्र नहीं है। हमास को भी यह तथ्य पता है।
इजराइल ने वर्ष 2005 में गाजा पट्टी से अपनी सेना निकालकर इस क्षेत्र का कंट्रोल को फिलिस्तीनीयों को दे दिया था। लेकिन वर्ष 2007 के “चुनाव” में फिलिस्तीनीयों को हराकर हमास ने गाजा पट्टी पर कंट्रोल कर लिया था। उसी समय से हमास ने आज के युद्ध की तैयारी में सुरंगे बनाना शुरू कर दिया था। अब तक हमास ने गाजा पट्टी में कई सौ किलोमीटर लंबी सुरंगे बना दी है। इन सुरंगो का प्रवेश द्वार एवं निकासी बहुमंजली आवासीय भवनों में है।
इन्ही सुरंगो में हमास के आतंकी रहते है। सुरंग द्वारा ही वे अपने परिवार से मिलते है। स्कूल, हॉस्पिटल एवं अन्य आवासीय भवनो में अपना “ऑफिस” चलाते है।
इजराइल के समक्ष चुनौती यह है कि हमास के विनाश के लिए उसकी सेना को आवासीय क्षेत्रो एवं सुरंगो में घुसना होगा, उनमे युद्ध लड़ना होगा, वहां हमास के ठिकानो को नष्ट कर होगा।
और यह सबको पता है कि ऐसे सघन आवासीय क्षेत्रो में किसी भी कार्यवाई में आम नागरिक मारे ही जायेंगे। साथ ही, इजरायली सैनिक भी हुतात्मा होंगे।
तभी हमास प्रयास कर रहा है कि आम नागरिक गाजा पट्टी से पलायन ना करे। इजराइल के समक्ष नैतिक दुविधा यह है कि अगर वह हमास का समूल नाश ना करे, तो शीघ्र ही अगला आतंकी हमला हो सकता है।
किसी समय आतंकी क्षेत्र को भी यही घमंड था कि अगर उसने कारगिल की चोटियों पर कब्ज़ा कर लिया, तो भारत उसका क्या बिगाड़ लेगा। ऊंचाइयों से भारतीय सैनिको को मारना आसान था। अगर भारत सीमा पार करता है तो वह उसे युद्ध घोषित करके परमाणु बम की धमकी दे देगा। वैसे भी अटल जी को धोती पहनने वाला कहकर आतंकी क्षेत्र भारतीय नेतृत्व का उपहास उड़ाता था, उन्हें कमजोर एवं कमतर समझता था।
धोती पहनने वाले अटल जी की राजनीतिक सूझबूझ थी कि उन्होंने भारतीय सेना को सीमा पार करने से मना कर दिया। अगर हमारे सैनिक सीमा पार ही नहीं करेंगे, तो युद्ध कैसा?
लेकिन इससे भी बढ़कर हमारे सैनिको की वीरता थी कि उन्होंने उन चोटियों पर चढ़ने के लिए जानबूझकर उस मार्ग का प्रयोग किया जो अत्यधिक दुरूह था। इतना दुरूह कि आतंकवादी उस ओर पहरा ही नहीं दे रहे थे। उनका पूरा ध्यान उस मार्ग पर था जो आसान था। जब हमारे सैनिक उन चोटियों पर चढ़ गए तो आतंकी भौचक्के रह गए थे।
यही स्थिति हमास की है। वह फूल-पिचक रहा है कि जब इजरायली सैनिक उनकी सुरंगो में घुसेंगे, तो हमास के आतंकी हमले के लिए घात लगाए बैठे होंगे। साथ ही, शिशुओं-महिलाओ की हत्या का ब्लेम भी लगेगा।
अतः इस युद्ध लंबा खींचने की संभावना है जो इजराइल के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है। इजराइल के लिए अगले कुछ सप्ताह अत्यधिक दुरूह है।
इजराइल को भी यह तथ्य पता है।
मेरा विश्वास है कि सबसे अधिक नोबेल प्राइज जीतने वाला समाज (यहूदियों ने 20% से अधिक नोबेल पुरुस्कार प्राप्त किया है) निश्चित रूप से हमास की इस रणनीति का काट निकाल लेंगा।
आखिरकार प्रभु राम, कृष्ण एवं शिव के अनुनाइयो – जिसका नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे है – ने भी आतंकी क्षेत्र के हमलो की काट निकाल ली है।
वह काट है आपका वोट – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न के समर्थन में।
नहीं तो भारत का “हमास” भी आपके नोटा की आशा में घात लगाने की तैयारी कर रहा है।

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