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समाज और पूंजीवाद

Nitin Tripathi

by Nitin Tripathi
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पूंजीवाद में हर वस्तु की एक क़ीमत है जिसे समाज निर्धारित करता है, वहीं समाजवाद में क़ीमत वह जो सरकार निर्धारित करे, अन्यथा सब कुछ फ़्री माना जाता है.
हाल ही में मैं चिटकुल में था. ऐसा भव्य प्रकृतिक स्थल स्विट्सर्लंड तक में नहीं है. अब यदि ऐसा कोई प्राकृतिक स्थल किसी पूँजीवादी व्यवस्था में हो तो इस सुंदरता की भी एक क़ीमत मान ली जाएगी. ग्राम पंचायत इस गाँव में कारों का प्रवेश बंद कर देगी, स्थानीय उद्यमी इलेक्ट्रिक बैटरी वाली गोल्फ़ कार्ट चलवा देंगे. गाँव घूमना है, पार्किंग में गाड़ी पार्क कर पचास रुपए पार्किंग के दो, गोल्फ़ कार्ट के सौ रुपए दो. शाम पाँच के बाद प्रवेश वर्जित. गाँव की तीन चार सबसे खूबसूरत जगहों पर व्यू point होगा, लिफ़्ट लगी होगी, तीन रेस्टोरेंट होंगे. हर रेस्टोरेंट बहुत शानदार साफ़ सुथरा होगा जहां तीन सौ रुपए की थाली होगी. रेस्टोरेंट से लिफ़्ट लगी होगी और ऊपर पहाड़ पर जाने के लिए – पाँच सौ रुपया किराया. उस व्यू point पर कट ओऊटस होंगे भारत का अंतिम गाँव. वहाँ अपने आप आपकी फ़ोटो खिच जाएगी बैक ग्राउंड के साथ. लौटते में फ़ोटो ले लीजिए. वहीं पर कुछ दुकाने होंगी जिनमे चिटकुल का साहित्य, फ़ोटो आदि उपलब्ध होगी. सौ रुपए में अपने मित्रों को भारत के अंतिम गाँव से फ़ोटो भेज दीजिए.
गाँव में एक क्षेत्र बना होगा जहां होटल खोले जा सकते हैं. होटल में रुकने वाले हर गेस्ट को सौ रुपया गाँव को टैक्स देना होगा. ग्राम प्रधान की ह्यूज सेलरी होगी, वह ग्राम पंचायत की bmw से चलेगा. हर होटल को अपने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट आदि लगाना होगा. इस पूरी प्रक्रिया में हर गाँव वाला लाखों रुपए कमाएगा साल के – आराम से. ग्राम पंचायत करोड़ों कमाएगी टैक्स से जिसका इश्तेमाल वह प्रकृति को और सुंदर बनाने के लिए करेगी क्योंकि उसे पता है वह इसे जितना ही सुंदर बना ले जाएँगे उतना ही महँगा बेंच ले जाएँगे. कचरा कोई टूरिस्ट स्वयं न फेकेंगा – उसे पता है यह कचरा साफ़ उसी के पैसे से होगा, टैक्स बढ़ जाएगा.
अब आते हैं भारत जैसी समाजवादी विचार धारा वाले देश में. सरकार ने प्रकृति की क़ीमत नहीं निर्धारित की. हम बताएँगे भारतीय संस्कृति में प्रकृति को माँ बोला गया है कोई क़ीमत नहीं हो सकती. यह सब फ़्री है. तो हर दस कदम पर ढाबे और ढाबे और ढाबे खोलते जाएँगे. पहले जहां एक ढाबे में मैगी सौ की थी अब चालीस की मैगी. सबकी कमाई कम. इन ढाबों से निकली गंदगी सीधे पहाड़ पर. पहले एक होटल बनेगा, फ़िर धीमे धीमे नदी तक पाट कर होटल बन जाएँगे. जंगल से लकड़ी काटी जाएगी. आख़िर प्रकृति फ़्री है, सबका हिस्सा है मुफ़्त की लूट में. यात्री क्यों पीछे रहें हर यात्री जाएगा और कचरे का अम्बार छोड़ कर आएगा. सड़क पर नदी में सब जगह लोग पेशाब करते, थूकते नज़र आएँगे. ग्राम पंचायत का भी इकमात्र फ़ोकस रहेगा कि प्रधान जी किसी तरह मुफ़्त वाली ज़मीन हड़प लें. इस पूरी प्रक्रिया में खुश कोई नहीं. चौबीस घंटे काम करना पड़ रहा है. कमाई तो कम. ग्राम पंचायत आदि की भी कमाई ब्लैक में. और ज़ाहिर सी बात है गाँव की सुंदरता का सर्वनाश कर दिया गया है क्योंकि प्रकृति मुफ़्त है, मुफ़्त की चीज़ सुधारने में कोई अपना दिमाग़ और समय क्यों लगाए.
यह कहना बहुत आसान होता है कि पूंजीवाद ने प्रकृति का सर्वनाश किया. हक़ीक़त यह है कि प्रकृति जहां कहीं जो कुछ बची हुई है, उसे पूंजीवाद ने ही बचाया है. अन्यथा मुफ़्त के समाजवाद ने तो प्रकृति का भी सर्वनाश कर रखा है.

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