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सर तन से जुदा वाला सौहार्द्र

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राजेंद्र यादव ने हंस में लिखा था कि हनुमान दुनिया के सब से पहले आतंकवादी थे । ठीक ? मैं उस के विस्तार में नहीं जाना चाहता । गांधी की हत्या गोडसे ने की थी । यह एक तथ्य है । इंदिरा गांधी की हत्या भी उन के सिख अंग रक्षकों ने की थी । अयोध्या भी एक तथ्य है । गुजरात भी हम नहीं भूल सकते । यह सारे अपराधी हैं । अपराधी कृत्य हैं यह सब ।

लेकिन इस का मतलब यह तो हरगिज़ नहीं है कि इन की बिना पर आज के अपराधियों और आतंकियों को बख्श दिया जाए ? उन की तरफदारी की जाए , उन का गुणगान किया जाए ? सिर्फ इस लिए कि वह मुसलमान हैं , वोट बैंक हैं ? देश में आग लगा देंगे , लगा ही रहे हैं । और जो इन की मजम्मत करे , निंदा करे , उसे आप भाजपाई न होते हुए भी भाजपाई कह कर छुट्टी पा लें , अपना कोढ़ छुपा लें ?


अफजल गुरु और याकूब मेमन की फांसी पर मुस्लिम मित्रों और सेक्यूलरिज्म की ठेकेदारी करने वाले मित्रों का गैर जिम्मेदराना और देशद्रोही रुख हमारे सामने है । तो क्या इस की शिनाख्त और मजम्मत की ज़रूरत नहीं रह गई है ? आंख-कान बंद कर लें ? इस लिए कि सौहार्द्र बनाए रखना है ? सौहार्द्र हर कीमत पर चाहिए ।

लेकिन माफ़ कीजिए इस कीमत पर तो हरगिज़ नहीं जिस में पाकिस्तानी आतंकवाद के पैरवी की बदबू आती हो । जिस में मनुष्यता विरोध की बारूदी गंध हो । हत्यारी हनक हो । नहीं , हरगिज़ नहीं । आप रखिए ऐसा सौहार्द्र अपने पास । आप को मुबारक ! मुझे तो नहीं ही चाहिए ऐसा सौहार्द्र ! सर तन से जुदा वाला सौहार्द्र !

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