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हार मान कर उस ने हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस,

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हार मान कर उस ने हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस, मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सब को चिट्ठियां लिखनी शुरू कीं। पर वो कहते हैं, न कि, ‘‘कहीं से कोई सदा न आई।’’ बहुत बाद में छपी छपाई औपचारिक चिट्ठी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की आई कि आवश्यक कार्यवाई के लिए लिख दिया गया है। पर कभी कोई कार्यवाई नहीं हुई। मानवाधिकार आयोग से किसी बड़े बाबू टाइप के व्यक्ति की चिट्ठी आई कि वह इस की रेमेडी हाई कोर्ट में ही ढूंढे। संजय यह चिट्ठी पढ़ कर बिलबिलाया कि हाई कोर्ट में अगर रेमेडी होती तो वह मानवाधिकार आयोग को चिट्ठी ही क्यों लिखता ? उस ने एक चिट्ठी और मानवाधिकार आयोग को लिखी कि अदालत के आदेश के मुताबिक उसे वेतन मिलना चाहिए जो कि उसे नहीं मिल रहा। सो वेतन न मिलना भी मानवाधिकार का हनन है सो आयोग इस मामले में हस्तक्षेप कर उसे वेतन दिलवाए। पर इस चिट्ठी का जवाब भी संजय को नहीं मिला।
संजय ने मुख्यमंत्री के मार्फत भी दबाव डलवाने की सोची। वह मुख्यमंत्री से मिला भी। उन्हों ने आश्वासन भी दिया। कुछ दिनों तक उस ने इसी चक्कर में काटे। वह तो बाद में मुख्यमंत्री के एक सचिव ने संजय की आंखें खोलीं। उस ने बताया कि, ‘‘मुख्यमंत्री जी आप से जान पहचान के नाते साफ नहीं बता पाते। पर स्थिति अब वह नहीं है जो आप समझ रहे हैं। स्थिति उलट गई है। पहले उद्योगपति आते थे तो कहते थे कि मुख्यमंत्री जी से मिलना है। पर अब ? अब मुख्यमंत्री जी ही उद्योगपतियों का दरवाजा जब-तब खटखटाते रहते हैं कि हम मिलना चाहते हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री उस उद्योगपति से क्या कहेंगे ? क्या दबाव डालेंगे ? और वह क्या मानेगा ? आप खुद ही सोच सकते हैं !’’
फिर संजय ने डिप्टी लेबर कमिश्नर के यहां रिकवरी ख़ातिर दौड़ लगानी शुरू की। यहां भी तारीखे़ं लगने लगीं। पर डिप्टी लेबर कमिश्नर ने काफी तेजी दिखाई। क्यों कि एक बार लेबर सेकेट्री ने संजय के कहे पर उसे बुला कर लगभग आदेश ही दिया कि दो तीन लाख रुपए संजय को मिल जाएंगे तो इन का भला हो जाएगा जब कि उस उद्योगपति का इस से कुछ नहीं बिगड़ेगा। तब डिप्टी लेबर कमिश्नर ‘‘यस सर, सर’’ कहता हुआ गया था। और फिर बिलकुल राणा प्रतापाना अंदाज में कार्यवाई शुरू की। संजय को लगने लगा कि उस की हल्दीघाटी अब उसे मिलने ही वाली है। तब उस को जरा भी अंदाजा नहीं था कि जिस राणा प्रताप की बिना पर वह हल्दीघाटी के सपने जोड़ रहा है वह राणा प्रताप नहीं जयचंद है। वह डिप्टी लेबर कमिश्नर पचीस हजार रुपए में ही मैनेजमेंट से पट गया और संजय की रिकवरी अप्लीकेशन रिजेक्ट कर दी।
संजय को इस से बहुत आश्चर्य नहीं हुआ।
धोखा खाना और वह भी मुकदमेबाजी में उस ने सीख लिया था। चेतना ने उसे एक बार फिर कहीं कोई नौकरी कर लेने को कहा। वह कहने लगी, ‘‘अगर अख़बार में नौकरी नहीं मिलती तो कहीं और कोई दूसरी नौकरी कर लीजिए।’’ वह भावुक होती हुई उस के माथे के बाल सहलाती हुई बोली, ‘‘और जो नौकरी नहीं भी करिए तो कम से कम एक काम तो करिए ही….!’’
‘‘क्या ?’’ चेतना की बात बीच में ही काटते हुए संजय ने पूछा।
‘‘यह मुकदमेबाजी छोड़ दीजिए !’’
‘‘ठीक है दो चार तारीख़ें और देख लेते हैं। नहीं कुछ बना तो छोड़ देंगे। बिलकुल छोड़ देंगे।’’
‘‘आप को तो जैसे नशा लग गया है। बिलकुल जुआरियों की तरह। कि हारते जाते हैं और कहते जाते हैं, बस एक बाजी और। और वह बाजी कभी ख़त्म नहीं होती। भले घर बार बिक जाए !’’ कह कर चेतना और भावुक हो गई।
संजय ने चेतना की बात का प्रतिवाद नहीं किया और चुपचाप उस के बाल सहलाने लगा। फिर वह धीरे-धीरे चेतना को बांहों में भर कर उस पर झुकने लगा। उसे चूमने लगा। वह ‘‘नहीं-नहीं, आज नहीं’’ कहती रही और संजय उस के एक-एक कपड़े उतारता रहा। थोड़ी देर बाद दोनों हांफ कर निढाल हो गए। संजय चुपचाप लेटा पड़ा था कि अचानक चेतना उस की देह पर चढ़ आई। संजय ने अचकचाकर पूछा, ‘‘क्या बात है?’’
‘‘कुछ नहीं।’’ कहती हुई वह शरमाई और बोली, ‘‘अब मैं करूंगी।’’ वह हंसती हुई बोली, ‘‘बिलकुल आप की तरह !’’ और वह शुरू हो गई। ऐसे जैसे वह सचमुच ही पुरुष हो, स्त्री नहीं। संजय ने भी अपने को उस के हवाले कर दिया। बिलकुल किसी समर्पिता स्त्री की तरह कि लो भोगो। जितना और जैसे चाहो भोगो। और चेतना भी भोग रही थी उसे बिलकुल किसी ढीठ पुरुष की तरह। कभी छातियों का निप्पल उस के मुंह में डालती, कभी मुख मैथुन पर आ जाती और फिर वह उस पर किसी घुड़सवार की तरह सवार हो कर हांफने लगी। तब तक जब तक वह निढाल नहीं हो गई।
संजय को यह अनुभव भी अच्छा लगा।
जैसे चेतना ने संजय को अभी-अभी भोगा ठीक वैसे ही संजय हाई कोर्ट को भोगना चाहता है। जैसे उस ने चेतना के सामने अपने को समर्पिता स्त्री की तरह हवाले कर दिया, हाई कोर्ट भी अपने को संजय के हवाले कर दे। जिस विकलता और तन्मयता से चेतना ने संजय को भोगा, उसी विकलता और तन्मयता से संजय हाई कोर्ट को भोगे और जैसे चेतना ने देह का सुख पा कर नेह बटोरा वैसे ही संजय न्याय का सुख पा कर संतोष और संतुष्टि बटोर ले !
पर क्या ऐसा सपने में भी संभव है ?
सोचता है संजय चेतना की बगल में लेटे-लेटे जो पसीने में लथपथ पड़ी है निर्वस्त्र। तो क्या न्याय भी निर्वस्त्र हो कर मिलेगा ? ठीक उसी अर्थ में कि ‘‘न्याय हो और होता हुआ दिखाई भी दे !’’ संजय यह भी सोचता है। सोचता है कि उस की तारीख़ भी नजदीक आ गई है। और हाई कोर्ट में छुट्टियों का दिन भी।
वह हाई कोर्ट में बैठा है। तीन दिन से लगातार ‘‘अनलिस्टेड’’ में उस का केस लग रहा है पर कभी अपोजिट पार्टी का वकील गायब रहता है तो कभी केस टेक अप नहीं हो पाता। पर आज अपोजिट पार्टी का सीनियर वकील भी भारी-सा टीका लगाए बैठा है और अनिलिस्टेड केसेज भी चल रहे हैं। इलाहाबाद से आया यह जस्टिस शरण भी कड़क है। लगता है आज बात बन जाएगी। संजय सोचता है। पर संजय की वकील नहीं है। वह परेशान है। कि तभी उस का नंबर आ जाता है। वह ख़ुद खड़ा हो जाता है। न्याय मूर्ति पूछते हैं, ‘‘आप के वकील कहां हैं ?’’
‘‘अभी नहीं हैं। पर मैं अपनी बात खुद कहना चाहता हूं।’’ संजय बोला।
‘‘पहले वकालतनामा विदड्रा कीजिए, फिर अपनी बात कीजिए। या अपने वकील को बुलाइए !’’ संजय अभी कुछ और कहता कि उस की वकील दौड़ती हुई आ गईं। उसे हटाया और ‘‘सॉरी’’ कहती हुई बहस शुरू कर दी। अपोजिट पार्टी के सीनियर वकील के पसीने छूट गए। उस का बड़ा सा टीका पसीने में बहने लगा। जस्टिस शरण ने अवमानना करनेवालों के खि़लाफ नान बेलेबिल वारंट के आर्डर कर दिए थे। और वह सीनियर वकील गिड़गिड़ा रहा था कि, ‘‘वारंट की जरूरत नहीं है। वह ख़ुद ही उन्हें अदालत में पेश कर देगा।’’ पर न्यायमूर्ति फिर भी नहीं माने तो सीनियर वकील बेलेबिल वारंट की रिक्वेस्ट पर आ गया। वह जाने क्यों गिड़गिड़ाता जा रहा था। और समय काटता जा रहा था। फिर न्यायमूर्ति पसीजे और उन्हों ने नान बेलेबिल वारंट के आदेश रद्द कर बेलेबिल वारंट कर दिए। पर सीनियर वकील अभी भी गिड़गिड़ा रहा था कि कि सिर्फ तारीख़ दे दी जाए और….अभी कुछ और वह कहता कि वह सुदर्शनीया वकील साहिबा जो बुलबुल की तरह बोलती थीं, अपनी भारी-भारी छातियों और उस से भी भारी नितंबों को फड़काती हुई, हांफती हुई पर मादक मुसकान से सबको मारती हुई आ गईं। उन्हें देखते ही संजय के होश उड़ गए। वह समझ गया कि अब यह फिर कोई ड्रामा करेगी। उस ने किया भी और कहा कि, ‘‘आज के इस अनलिस्टेड केस की उसे सूचना नहीं थी, वह इस केस की फाइल भी नहीं लाई है इस लिए इस मामले की सुनवाई की कोई अगली तारीख़ दे दी जाए !’’
संजय की वकील ने उस बुलबुल-सी बोलने वाली वकील की बात का बेतरह प्रतिवाद किया पर न्यायमूर्ति तो पिघल गए थे, बुलबुल-सी आवाज में बह गए थे और अपने सारे पिछले आदेश रद्द कर अगली तारीख़ दो महीने बाद की दे बैठे। संजय की वकील निराश हो कर बैठ गई। पर संजय भड़क उठा वह जा कर वकील की जगह खड़ा हो गया और न्यायमूर्ति से बहस पर आमादा हो गया। उस ने साफ-साफ कहा कि, या तो हाई कोर्ट का जो आदेश है वह अभी रद्द कर दिया जाए। वह आखि़र यह आदेश कब तक झुनझुने की तरह बजाता हुआ घूमता रहेगा और अपनी जवानी बरबाद करता रहेगा। दूसरे, अगर अदालत उस आदेश को मानती है तो उसे पूरी तरह माने। तीसरे, उस आदेश को अपोजिट पार्टी ने नहीं माना है। साफ है कि आदेश की अवमानना हुई है। क्लीयरकट कंटेंप्ट है। और जो फिर भी अदालत को लगता है कि अपोजिट पार्टी ने कंटेंप्ट नहीं किया है,’’ संजय ने इस बात को चीख़ कर कहा कि, ‘‘मैं इस भरी अदालत में इस अदालत की अवमानना करता हूं।’’ वह और जोर से चीख़ा, ‘‘मैं कंटेंप्ट करता हूं। मुझे जेल भेजा जाए। कम से कम वहां रोटी दाल तो मिलेगी।’’ संजय बोलता जा रहा था और न्यायमूर्ति उसे बराबर टोकते जा रहे थे कि, ‘‘बैठ जाइए !’’ वह बार-बार संजय की वकील से भी कह रहे थे कि वह संजय को कोर्ट से बाहर ले जाएं। कोर्ट में बैठे बाकी वकील संजय की इस हरकत से सकते में आ गए थे। संजय की वकील भी घबरा-घबरा कर बार-बार संजय को पीछे से खींचती और कहती, ‘‘सजंय जी प्लीज बाहर चलिए। चुपचाप बैठ जाइए।’’ पर संजय पर तो जैसे जुनून सवार था, वह लगातार चीख़ रहा था, ‘‘मैं इस कोर्ट का कंटेंप्ट कर रहा हूं, मुझे जेल भेजिए !’’ न्यायमूर्ति ने संजय को फिर से समझाया, ‘‘हर चीज की प्रोसिडिंग होती है।’’
‘‘हद है ! आप दस मिनट के अंदर अपना ही आदेश तीन बार बदलते हैं। इन ड्रामेबाज वकीलों के झांसे में आ जाते हैं और हमें प्रोसिडिंग समझाते हैं ?’’ संजय जैसे पागल हुआ जा रहा था और बार-बार चीख़ने से न्यायमूर्ति भी एक बार तैश में आ गए। संजय से वह भी चीख़ कर बोले, ‘‘मैं कह रहा हूं आप चुपचाप कोर्ट से बाहर जाइए नहीं आप को अभी कस्टडी में ले लिया जाएगा।’’
‘‘मैं तो कह ही रहा हूं कि मुझे जेल भेजिए। मैं कंटेंप्ट कर रहा हूं।’’ संजय फिर चिल्लाया। फिर न्यायमूर्ति का धैर्य जैसे जवाब दे गया। वह संजय के केस में अंततः ‘‘नाट बिफोर’’ का आदेश दे ‘‘कोर्ट इज एडजर्न’’ कह कर तमतमाते हुए उठ कर अपने चैंबर में चले गए।
‘‘नाट बिफोर का क्या मतलब ?’’ एक वकील से संजय ने पूछा।
‘‘मुझे नहीं मालूम।’’ वह वकील खीझ कर बोला। पर उस के बगल में खड़े एक दूसरे वकील ने बताया कि, ‘‘अब यह केस यह कभी नहीं सुनेंगे !’’
‘‘अच्छा !’’ संजय बड़बड़ाया और जरा जोर से, ‘‘ऐसे नपुंसक जजों के सामने मेरा केस न ही जाए तो अच्छा है !’’ कह कर वह कोर्ट से बाहर आ गया। ज्यादातर वकील उसे देख कर कन्नी काट गए। उस सीनियर का एक जूनियर संजय के पास आ कर बोला, ‘‘हमारे सीनियर वकील नहीं, चलती फिरती कोर्ट हैं। समझे !’’ संजय कुछ बोला नहीं और घर चला आया। खाना खा कर सो गया।
शाम हो गई थी जब वह सो कर उठा।
बाथरूम गया पेशाब करने। पेशाब करते समय उसे एक घटना याद आ गई। उस घटना की याद आते ही उसे हंसी आ गई।
कुत्तों से संजय को हरदम परहेज रहा। परहेज क्या वह हद से ज्यादा डरता है कुत्तों से। दिल्ली में जब वह था, उस के फ्लैट के बगल वाले फ्लैट में एक डॉक्टर थे। डॉक्टर के पास एक कुत्ता था। वह कुत्ता जब तब संजय के फ्लैट के सामने आ कर पेशाब-टट्टी कर दिया करता था। संजय ने कई बार डॉक्टर से इस की शिकायत की। पर डॉक्टर को इस की परवाह नहीं हुई।
एक दिन संजय ने ख़ूब पी। धुत्त हो कर घर लौटा। घर आते ही उसे जोर से पेशाब लगी। वह बाथरूम की और बढ़ा। पर अचानक कुछ सोच कर रुक गया। वापस दरवाजा खोल कर बाहर निकला और डॉक्टर के फ्लैट के सामने ख़ूब जी भर कर छर-छर मूत दिया। पेशाब डॉक्टर के घर के अंदर तक गया। उस ने सोचा डॉक्टर उस से शिकायत करेगा। पर डॉक्टर ने कभी शिकायत नहीं की। यह जरूर हुआ कि तब से डॉक्टर के कुत्ते ने संजय के फ्लैट के आगे पेशाब-टट्टी बंद कर दिया। संजय यह सोच कर फिर हंसा और सोचा कि आज वह हाई कोर्ट में मूतेगा।
पर कैसे ?
हां, कैसे ? उस ने सोचा और पाया कि यह सब करने के लिए शराब में धुत्त होना जरूरी है। और शराब वह छोड़ चुका है।
तब ?
तो क्या आज वह इस पुनीत कार्य के लिए शराब पी ले ? उस ने सोचा। फिर तय किया कि वह शराब नहीं पिएगा। सोचा कि यह हाई कोर्ट का अन्याय क्या कम है उसे धुत्त करने के लिए ?
वह उठा।
उठ कर चार पांच लोटा पानी पिया। एक घंटे में वह जितना अधिक से अधिक पानी पी सकता था पी कर हाई-कोर्ट पहुंचा। पहुंच कर चौकीदार को पकड़ा। उसे सौ रुपए का नोट दिया और हाई कोर्ट की उस अदालत का दरवाजा खुलवा कर ऐन उस न्याय मूर्ति की कुर्सी के सामने छर-छर मूतने लगा। मूतना तो वह न्याय मूर्ति की कुर्सी पर चाहता था पर चौकीदार ने ऐसा नहीं करने दिया। अपनी नौकरी का वास्ता दिया। सो वह न्यायमूर्ति की कुर्सी के सामने मूतता रहा । वहां मूत कर वह बड़ा निश्चिंत भाव से बाहर निकला।
गरज यह कि एक नपुंसक व्यवस्था के खि़लाफ एक नपुंसक विरोध दर्ज हो गया था।
तो क्या संजय नुपंसक हो गया था ?
यह सोचते हुए उस ने यह भी सोचा कि नपुंसक व्यवस्था से लड़ते-लड़ते आदमी नपुंसक नहीं तो और क्या बनेगा ? उस ने स्कूटर स्टार्ट की और चल पड़ा। कहीं रेडियो बज रहा था कि टेप संजय जान नहीं पाया पर सुदर्शन फाकिर के लिखे को जगजीत सिंह गा रहे थे, ‘‘रहते थे हम हसीन ख़यालों की भींड़ में/उलझे हुए हैं आज सवालों की भीड़ में।’’
संजय ने स्कूटर और तेज कर दी !
दूसरे दिन संजय एक सेमिनार में बैठा हुआ है। एक न्यायमूर्ति इस सेमिनार का अध्यक्षीय भाषण कर रहे हैं। मुसलमान हैं और भारतीय संस्कृति की दुहाई बार-बार उच्चार रहे हैं, उसे और समृद्ध करने पर जोर भी मारे जा रहे हैं। सुन-सुन कर संजय अफना रहा है। उस के बगल में बैठी महिला पत्रकार मनीषा पूछती भी है, ‘‘क्या बात है संजय जी? कोई दिक्कत है क्या ?’’
‘‘नहीं, कोई बात नहीं।’’ संजय लापरवाही से बोलता है।
‘‘कुछ तो है !’’ मनीषा पिंड नहीं छोड़ती। सवाल फिर दुहराती है, ‘‘क्या बात है?’’
‘‘बात कुछ नहीं।’’ संजय जोड़ता है, ‘‘यह हत्यारों को जमानत देने वाला संस्कृति की बात कर रहा है, उसे और समृद्ध करने की बात कर रहा है तो बात हजम नहीं हो पा रही !’’
‘‘तो ?’’
‘‘तो क्या ?’’ संजय बिफरा, ‘‘हत्यारों को जमानत देने वालों को संस्कृति पर बोलने का अधिकार नहीं देना चाहिए !’’ वह बोला, ‘‘मुझे तो उबकाई आ रही है !’’ और यह कहता हुआ वह सेमिनार हाल से बाहर निकल आया। उस के पीछे-पीछे वह महिला पत्रकार मनीषा भी आ गई। आयोजकों ने बाहर घेर कर रोका भी कि, ‘‘कुछ खा पी कर जाइए !’’ पर संजय जैसे बदहवास गया था। बोला, ‘‘अरे नहीं उबकाई आ रही है !’’ यह सुनते ही आयोजकों ने घेरेबंदी तोड़ दी और संजय और मनीषा को बाहर निकल जाने दिया।
‘‘आप को जजों से इतनी एलर्जी क्यों है ?’’ बाहर निकल कर मनीषा ने संजय से पूछा।
‘‘जजों से एलर्जी नहीं है।’’ संजय बोला, ‘‘जजों के दोगले चरित्र और दोमुंहेपन से एलर्जी है !’’
‘‘ख़ैर चलिए मैं बहस के मूड में नहीं हूं।’’ वह बोली, ‘‘आप की उबकाई कुछ कम हुई ?’’
‘‘कम नहीं, ख़त्म हो गई।’’ संजय बोला, ‘‘तुम्हारा मूड ज्यादा बिगड़ गया हो तो ठीक कर लो ! क्षमा करना !’’
‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं।’’ अपना बैग और दुपट्टा ठीक करती हुई वह बोली, ‘‘मैं तो साथ सिर्फ इस लिए चली आई कि आप बाहर निकल कर किसी से झगड़ा न कर लें।’’ उस ने जोड़ा,’’ ‘‘और कि कहीं ख़ुदा न खास्ता अगर आप की तबीयत सचमुच ख़राब हो तो वह भी देख लूं।’’
‘‘ओह ! बड़ी फिक्र है मेरी ?’’ संजय चहका, ‘‘चलो इसी बात पर तुम्हें चिकेन चिली खिलाता हूं।’’
‘‘अरे नहीं, इस की कोई जरूरत नहीं !’’ मनीषा संकोच बरतती हुई बोली।
‘‘घबराओ नहीं !’’ वह बोला, ‘‘तुम्हारा संकोच वैसे जायज है कि इस बेरोजगारी में मैं चिली की बात कर रहा हूं तो कहीं खुद न पेमेंट करना पड़ जाए ?’’
‘‘नहीं, यह बात भी नहीं है।’’ वह बोली।
‘‘फिर ठीक है।’’ संजय बोला, ‘‘अब बिना इफ-बट किए चली चलो। मेरे पास ठीक ठाक पैसे हैं। अभी आज ही एक अच्छा पेमेंट मिला है।’’
बिना कुछ बोले वह चुपचाप संजय के स्कूटर पर बैठ गई।
रेस्टोरेंट में आ कर वह भी हाई कोर्ट के सवाल पर आ गई। पूछने लगी, ‘‘आखि़र दिक्कत क्या है ? तब जब कि आप के पास हाई कोर्ट का आर्डर है। !’’
संजय ने टुकड़े-टुकड़े कर के उस को सारी मुश्किलें, सारे किंतु-परंतु का संक्षिप्त ब्यौरा थमा दिया और बोला, ‘‘सारी मुश्किल कोर्ट प्रोसिडिंग्स के नाम पर वकीलों और जजों का दोगलापन है कुछ और नहीं।’’ वह थोड़ा और तफसील में जाता हुआ बोला, ‘‘ठीक वैसे ही जैसे कोई नपुंसक पुरुष अपना ऐब छुपाने के लिए अपनी बीवी को दोष देता फिरता है और पीटता रहता है कि, ‘‘बच्चा क्यों नहीं जनती ?’’
‘‘आप यह बात मीडिया के मार्फत क्यों नहीं उठाते ?’’ वह बोली।
‘‘कहा था कुछ सो काल्ड लॉ-रिपोर्टरों से। पर उन के साथ दो दिक्कतें आईं एक तो जजों की ख़िलाफत कैसे करें ? उन जजों की जिन की भड़ुआगिरी वह अपनी कुंडली में लिखवा कर लाए हैं। दूसरे, मेरा मामला एक अख़बार के मैनेजमेंट के ख़िलाफ है। और ये लॉ-रिपोर्टर सती सावित्राी छाप वेजेटेरियन हैं। उन के खि़लाफ कैसे लिखें ? लिख देंगे तो नरक को प्राप्त हो जाएंगे !’’
‘‘इन लॉ-रिपोर्टरों के अलावा आप ख़ुद भी तो लिख कर दे सकते हैं ?’’ मनीषा बोली।
‘‘दे सकता हूं। या कोई और भी लिख सकता है। लेकिन इन अख़बारों में बैठे सो काल्ड एडीटर भी तो हिजड़ों से बढ़ कर हैं ! क्या तो यह कोर्ट की ख़बर है। कानूनी मसला हैं लॉ-रिपोर्टर ही लिखेंगे। नहीं, मामला बिगड़ जाएगा !’’ संजय बिफरा।
‘‘तो आप इलेक्ट्रानिक मीडिया वालों से बात करिए !’’
‘‘बात की इन इलेक्ट्रानिक मीडिया वालों से भी। कल तक जो भाई साहब, भाई साहब कह कर पांव छूते थे, ख़बरों का इंट्रो और एंगिल हम से पूछते फिरते थे, आज वह भी खलीफा हो चले हैं, कैमरे के आगे कमर मटकाते ऐसे फिरते हैं कि तुम लड़कियां उन के आगे फेल ! कहते हैं कि दिल्ली से परमिशन लेनी पड़ेगी !’’
‘‘क्या हर ख़बर वह परमिशन ले कर ही करते हैं ?’’ वह बोली।
‘‘कुछ नहीं। सब साले हिजड़े हैं।’’ संजय बोला, ‘‘मैं ने तो यहां तक कहा कि मेरा मामला बिलकुल मत छुओ। जिक्र तक मत करो। पर इस हाई कोर्ट में कंटेंप्ट के जो हजारों केस साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं और उन की सुनवाई ही नहीं हो पा रही, उस पर एक फीचर करो। अच्छी ह्यूमन स्टोरी बनेगी। यही बात मैं ने अख़बार वालों से भी कही और इलेक्ट्रानिक मीडिया वालों से भी। पर सब के सब कन्नी काट गए !’’
‘‘यह तो हद है !’’ मनीषा बिफरी।
‘‘तो तुम मेरी बात से सहमत हो ?’’ संजय ने पूछा।
‘‘बिलकुल !’’ वह इतराती हुई बोली।
‘‘तो तुम ख़ुद यह स्टोरी क्यों नहीं करती ?’’ संजय बोला, ‘‘मैं तुम्हारी पूरी मदद कर दूंगा। सारे डिटेल्स दिला दूंगा। फीगर्स मिल जाएंगे, साल दर साल। कुछ वकीलों, जजों और अवमानना की आंच में जलते भुक्त भोगियों सहित अवमानना करने वालों से बात चीत भी करवा दूंगा। इन सब की फोटो वोटो ले कर लिखोगी तो एक इक्सक्लूसिव स्टोरी तुम्हारी तुम्हारे खाते में दर्ज होगी। ऐसी कि पढ़ कर लोगों के रोंगटे खड़े हो जाएं!’’
‘‘ठीक है मैं आज ही अपने एडीटर से इस पर डिसकस करती हूं।’’ वह दृढ़ होती हुई बोली।
‘‘राजेश खन्ना वाला डायलाग बोलूं तो कहूं कि यहीं मार खा गया हिंदुस्तान !’’ संजय बोला, ‘‘खै़र, डिसकस कर लो। वैसे मुझे उम्मीद कम है कि तुम्हारा एडीटर इस स्टोरी के लिए मान जाएगा।’’ वह बोला, ‘‘फिर भी टेक एक चांस ! तुम लड़की हो ! हो सकता है लड़की होने का फायदा तुम्हें मिल जाए। और तुम्हारी बात से वह सहमत हो जाए !’’
‘‘बात लड़की होने की नहीं है।’’ वह बोली, ‘‘इस स्टोरी में दम भी है। !’’
‘‘बाकी लोगों को इस स्टोरी में दम नहीं दिखा, बल्कि सुन कर ही बेदम हो गए तो तुम्हारे एडीटर को कहां से दम दिखेगा ? वह भी तो पूंजीपतियों की चाटुकारिता में प्रवीण है। ख़ैर, फिर भी देखो क्या बनता है ?’’
‘‘यही तो मैं कह रही हूं।’’ वह निश्चिंत होती हुई बोली।
वह दोनों चाओमिन के साथ चिकेन चिली खा रहे थे तो जगजीत सिंह का गाया एक रिकर्ड बज रहा था, ‘‘पत्थर के खुदा, पत्थर के सनम, पत्थर के ही इंसा पाए हैं/तुम शहरे मुहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं।’’ एक बार वह इस गायकी में खो गया। चिकेन चिली खा कर वह दोनों जब उस एयर कंडीशन रेस्टोरेंट से निकले तो बाहर चिलचिलाती धूप मिली। बिलकुल तोड़ देने वाली धूप।
‘‘कहीं और चल कर बैठें ?’’ संजय ने मनीषा से पूछा।
‘‘कहां ?’’ वह धूप से बिलबिलाती हुई बोली।
‘‘कहीं किसी घने पेड़ के नीचे !’’ संजय बहकता और दहकता हुआ बोला, ‘‘उस घने पड़े की छांव में आइसक्रीम खाएं, कोई फिल्मी गाना सुनते हुए !’’
‘‘बड़े रोमैंटिक हो रहे हैं आप ! पर यह संभव है कहां ?’’ वह सकुचाती और किंचित इठलाती हुई बोली।
‘‘तुम हां कहो तो सब कुछ संभव है।’’ संजय उस की मादकता में डूबता हुआ बोला।
‘‘तो चलिए !’’ वह अल्हड़ होती हुई बोली।
संजय समझ गया कि यह हाई कोर्ट की कंटेंप्ट स्टोरी लिखे न लिखे उस की बांहों में सोएगी जरूर ! सो संजय की स्कूटर तेजी से कुकरैल पिकनिक स्पाट की ओर भागने लगी। कुकरैल पहुंच कर वह बोली, ‘‘यह कहां ले आप आए ?’’
‘‘घने पेड़ की छांव, आइसक्रीम और फिल्मी गाने का खुशनुमा संयोग इस कड़ी धूप में सिर्फ यहीं संभव है।’’ संजय ने जोड़ा ‘‘और पूरे एकांत के साथ।’’
‘‘ओह !’’ उस ने अपने बालों को झटका देते हुए कहा, ‘‘इरादा तो नेक है ?’’
‘‘बिलकुल !’’ संजय संजीदा होते हुए बोला, ‘‘बिलकुल नेक और पाक !’’
‘‘ऐसा !’’ वह बोली, ‘‘आप का खिलंदड़पन और मस्ती देख कर लगता नहीं कि आप इतने संघर्ष में हैं।’’ वह गंभीर हो गई। बोली, ‘‘कोई और हो तो टूट कर बिखर जाए। कपड़े फाड़ कर घूमे !’’
‘‘कपड़े नहीं, कुर्ता फाड़ कर घूमे और मजनूं की तरह !’’ वह बेफिक्री से बोला, ‘‘फिलहाल तो यह सब छोड़ो ! अभी तो आइसक्रीम और घने पेड़ की छांव में गाना सुनते हैं। वही गाना जो मुकेश ने गाया है, ‘संसार है एक नदिया….ना जाने कहां जाएं, हम बहते धारे हैं’ बोलो ठीक है !’’
‘‘हूं।’’ कहती हुई वह झूम कर चली। गाती हुई, ‘‘झूमती चली हवा….’’
आइसक्रीम ले कर वह एक पेड़ की छांव में बैठे बतियाने लगे। राजनीति, फिल्म, लोग और वगैरह-वगैरह बतियाते-बतियाते संजय बोला, ‘‘इस घने पेड़ की छांव कम पड़ रही है। है न ?’’
‘‘नहीं, ठीक तो है। पूरी घनी छांव है। और ठंडी भी।’’ वह बोली, ‘‘आप का सेलेक्शन ब्यूटीफुल है !’’
‘‘लेकिन यह छांव मेरे लिए कम पड़ रही है।’’ वह बुदबुदाया, ‘‘अगर तुम्हारी इजाजत मिल जाए तो इस छांव में थोड़ा इजाफा कर लूं ?’’
‘‘इजाजत की क्या जरूरत है ? आप इजाफा कर लीजिए।’’
‘‘इजाजत की जरूरत है।’’ संजय अपने पुराने मुहावरे पर वापस आते हुए खुसफुसाया, ‘‘अगर तुम बुरा न मानो तो इस घने पेड़ की छांव में तुम्हारी जुल्फों की छांव भी जोड़ लूं ? ओढ़ लूं तुम्हारी जुल्फों को।’’
‘‘क्या मतलब है आप का ?’’ वह थोड़ा संकोच, थोड़ा गुस्सा घोल कर बोली। पर धीरे से।
‘‘इसी लिए तो इजाजत मांगी।’’ वह भावुकता में भींग कर बोला, ‘‘प्लीज बुरा मत मानना। यह तो तुम्हारी खुशी पर है। तुम्हारी पसंद पर है।’’
‘‘आप की यह बेचारगी देखी नहीं जाती !’’ वह अपने बालों के रबर बैंड खोलती हुई, बालों को झटका देती हुई बोली। थोड़ा रुकी और कहने लगी, ‘‘आप इतनी जल्दी प्रपोज कर देंगे। मुझे अंदाजा नहीं था।’’
‘‘तो तुम क्या चाहती थी कि साल भर आइसक्रीम ही खाते और पेड़ के नीचे बैठते रहते ?’’ संजय उस के बालों में अपना चेहरा छुपाते हुए बोला, ‘‘वक्त खराब करने से क्या फायदा ?’’ उस ने जोड़ा, ‘‘बस मेंटल हारमनी चाहिए !’’
‘‘ये तो है !’’ वह संजय की सांसों में अपनी सांसें मिलाती हुई खुसफुसाई, ‘‘पर आज बस इतना ही !’’
‘‘इतना ही क्यों ?’’ संजय बोला, ‘‘तुम ज्यादा इफ-बट मत करना ! न ही पत्रकार बनना । लड़की ही बनी रहना बस ! और थोड़ा-सा मुझ पर भरोसा करना !’’ कह कर संजय उस की देह जहां तहां टटोलने लगा।
चुपके-चुपके।
थोड़ी देर बाद उसे लगा कि अब बात बिगड़ेगी नहीं तब वह वहां बने गेस्ट हाऊस के चौकीदार के पास गया। उसे सौ रुपए पकड़ाते हुए बोला, ‘‘मेम साहब की तबीयत जरा गड़बड़ हो गई है। कमरा खोल दो अभी थोड़ी देर आराम कर के चली जाएंगी।’’
‘‘ठीक हजूर !’’ कह कर उस ने कमरा खोल दिया। और, ‘‘कुछ चाहिए तो बताइएगा हजूर !’’ कह कर मूंछों में मुसकुराता हुआ वह चला गया। उस के जाते ही दरवाजा बंद कर के संजय उस पर बुरी तरह टूट पड़ा। इतना कि मनीषा परेशान हो कर बोली, ‘‘देखने में तो आप बहुत सभ्य और शरीफ लगते हैं। पर इस समय क्यों जानवर बने जा रहे हैं ?’’
‘‘क्या बेवकूफी की बात करती हो ?’’ वह बोला, ‘‘थोड़ी देर चुप रह सको तो मजा आएगा !’’ कह कर वह उस के कपड़े उतारने लगा।
‘‘यह क्या कर रहे हैं आप ?’’ कहती हुई वह उस का हाथ पकड़ कर रोकने लगी।
‘‘कुछ करूंगा नहीं। बस समीज ख़ुद ही तुम उतार लो। नहीं जल्दबाजी से फट-फटा गई तो मुश्किल होगी।’’
‘‘बस समीज ही उतारूंगी। कुछ और नहीं।’’ वह खुसफुसाई।
‘‘ठीक है। पर जल्दी उतारो !’’ संजय हड़बड़ाता हुआ बोला। समीज उतारने के बाद वह उस की ब्रा भी उतारने लगा तो वह फिर उस का हाथ पकड़ती हुई बोली, ‘‘आप ने सिर्फ समीज के लिए कहा था।’’
‘‘क्या डिस्टर्ब करती हो। ब्रा भी समीज के साथ रहती है। यह भी उतार दोगी तो क्या बिगड़ जाएगा ?’’ वह ब्रा की हुक खोलता हुआ बोला। वह उस की ब्रा बाहों से बाहर करता कि उस ने कूद कर बिछी चादर लपेट ली। तो भी उसने ब्रा बाहर कर दी और उस के उरोजों से खेलने, चूसने और रगड़ने लगा तो वह उत्तेजित होने लगी। बावजूद इस के ‘‘कुछ और नहीं, कुछ और नहीं’’ की रट बड़ी देर तक लगाए रही। अंततः संजय का धैर्य जवाब दे गया और उस ने लगभग जबरदस्ती उस की सलवार खोल दी। तब उस ने देखा कि ‘‘कुछ और नहीं, कुछ और नहीं’’ की रट भले लगा रही थी पर वह इतना डिस्चार्ज हो चुकी थी कि उस की पैंटी और सलवार बुरी तरह भीग चुकी थी। फिर तो संजय जैसे पागल हो गया। और उस के ‘‘नहीं-नहीं’ कहते रहने के बावजूद वह उस के ऊपर आ कर लेट गया। बोला, ‘‘अपना काम हो गया और मुझ से नहीं-नहीं कर रही हो।’’ कह कर उस की दोनों टांगें उठाईं और शुरू हो गया। थोड़ी देर बाद दोनों पसीने से लथपथ निढाल पड़े थे। तभी वह उस से चिपटती हुई बोली, ‘‘कुछ हो गया तो ?’’ उस का इशारा प्रिगनेंसी की तरफ था। पर संजय कुछ नहीं बोला। उस ने फिर अपनी बात दुहराई, ‘‘कुछ हो गया तो ?’’
‘‘कुछ नहीं होता एक दो बार में। हां, हिंदी फिल्मों में एक बार में जरूर हो जाता है।’’ संजय उसे टालते हुए बोला।
‘‘फिर भी !’’ वह खुसफुसाई।
‘‘कुछ नहीं। निश्चिंत रहो। और थोड़ा चुप रह कर देह के नेह को मन में भींच कर महसूस करो।’’ कह कर संजय आंखें बंद कर उस के बाल और नितंब सहलाने लगा। थोड़ी देर बाद वह उस के उरोजों के चाटने चूसने लगा। जल्दी ही दोनों उत्तेजित हो कर फिर से हांफने लगे।
शाम हो गई थी। पर दोनों को जाने की जल्दी नहीं थी। उधर सूरज ढल कर लाल हो गया था और इधर मनीषा की देह महक रही थी। संजय उस की देह के नेह में नत था! यह एक सवाल अपने आप से पूछता हुआ कि क्या देह भी अपने आप में एक युद्ध नहीं है?
फिर ख़ुद ही जवाब देता है कि, ‘‘है तो !’’
देह अभी भले युद्ध हो संजय के लिए पर बाकी युद्ध उस ने छोड़ दिए हैं। कभी ‘याचना नहीं, अब रण होगा !’ गरज कर हुंकारने वाला संजय अब अपमान के दलदल में फंसा रण भूल कर याचना सीखने की कोशिश कर रहा है पर सीख नहीं पा रहा है। तो उस के लिए यह भी एक युद्ध है ! एक युद्ध रीना भी लड़ रही है। राजनीतिक युद्ध। हालां कि रीना की शादी उस के पिता ने एक आई॰ ए॰ एस॰ अफसर से करवा दी। अब वह आई॰ ए॰ एस॰ की बीवी है और दो बच्चों की मां। पर घर में अब उस का मन नहीं लगता। राजनीतिक गलियारों में ज्यादा लगता है। उस का टारगेट अपने पिता की तरह मिनिस्टर बनने का है। यह पार्टी कि वह पार्टी या तमाम और बातें उस के लिए टैबू नहीं हैं। और जिस तरह से वह राजनीतिक फेरे मार रही है उस से लगता यही है कि वह अपना टारगेट पा लेगी। हां, शादी के बाद भी कभी कभार वह संजय से मिल लेती है पर पहले की तरह अपनी ही सुविधा और अपनी ही मर्जी से ! प्रकाश और मनोहर भी बीच युद्ध में हैं। वह दोनों पत्रकारिता छोड़ छोटे-मोटे बिजनेस शुरू कर संघर्ष कर रहे हैं। क्यों कि वह अख़बार बिक कर दूसरे स्वामित्व में चला गया। पर कोई चूं नहीं बोल पाया। और नया मालिक इतना होशियार निकला कि वह मुर्गी मार कर सोने के अंडे के फेर में पड़ गया। नतीजतन दो तिहाई से अधिक कर्मचारी सड़क पर आ कर अब उस के खि़लाफ जंग लड़ रहे हैं। कानूनी जंग ! कभी कभार कोई संजय से मिलता है तो बताता है कि, ‘‘तुम सच कहते थे कि तुम ‘ट्रायल केस’ हो। तुम्हारे मसले पर ही सब लोग जूझ गए होते तो यह बेराजगारी तीन सौ लोगों के सिर पर नहीं टूटती !’’
रही बात ट्रेड यूनियन नेता दूबे की तो अब वह दो ट्रक, एक टैक्सी और एक आलीशान मकान का मालिक है। यह ट्रेड यूनियन के ‘ट्रेड’ में बदलते जाने की कथा है कुछ और नहीं। हां, अख़बार कर्मचारियों का वह फिर भी नेता है ! ठीक वैसे ही जैसे मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ की प्रासंगिकता पर मधुकर एक कविता सुनाता था; ‘बैंकर खन्ना अब भी नेता है/देशी पहनता/विदेशी पीता है।’
संजय जब कभी कर्मचारियों के धरने, आंदोलन में जाता है और वहां दूबे को देखता है तो कर्मचारियों से एक बात जरूर कहता है कि, ‘‘खिचड़ी बनाओ और उस में नमक जरूर डालो ! फिर दूबे जी को खिलाओ भी जरूर।’ वह जोड़ता है, ‘कुछ तो नमक का ख़याल रखेंगे ही दूबे जी !’ कह कर वह पूछता है, ‘क्यों दूबे जी ?’
दूबे भीतर-भीतर नाराज तो होता ही है पर जाहिर नहीं करता। ऊपर-ऊपर मुसकुराता रहता है। यह युद्ध नहीं, युद्ध को दबोच लेने वाली गंध है। कहीं ज्यादा घातक और तोड़ने वाली।
[ अपने-अपने युद्ध से । पूरा उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे कमेंट बाक्स में दिए गए लिंक को क्लिक कर सकते हैं । ]

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