Home महिला लेखकAkansha Ojha हिन्दू धर्म की काली माँ का अपमान

हिन्दू धर्म की काली माँ का अपमान

Akansha Ojha

by Akansha Ojha
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एक तरफ हमारे पास लीना मणिमेकलई जैसे पतित हैं जो सिनेमाई स्वतंत्रता और एफओई के नाम पर हमारे देवता, शक्ति के सर्वोच्च मध्यस्थ और ऊर्जा के स्रोत देवी महाकाली, सिगरेट या खरपतवार धूम्रपान करने वाले हाथों में एक गर्व ध्वज के साथ चित्रित करते हैं। और दूसरी तरफ हमारे पास गटरमाउथ कुलीन राजनेता महुआ मोइत्रा है जो देवी महाकाल को केवल मांस खाने वाली और शराब स्वीकार करने वाली देवी के रूप में जोड़ती है और पहचानती है की पवित्रता और सत्यता को कोई नहीं जानता वामतंत्र मार्ग।

 

सर्वत्र व्याप्त घनघोर अंधकार से उत्पन्न हुयी यह शक्ति आदि या आद्या, सनातन तथा सर्वप्रथम शक्ति हुई।
इस संपूर्ण चराचर जगत अथवा तीनों लोकों की उत्पत्ति के कारक, देवी आद्या शक्ति काली ही बानी। अंधकार से जन्म धारण करने के पश्चात, इनके मन में इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जन्म देने की प्रेरणा जाग्रत हुई और देवी इस निमित्त उद्धत हुई।
इन्हीं आद्या शक्ति की प्रेरणा अनुसार ही ब्रह्मा जी ने संपूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण किया। ब्रह्माण्ड में ऊर्जा संचय हेतु सूर्य देव का निर्माण किया गया, जिनके ऊर्जा के कारण ही समस्त चराचर जगत विद्यमान, अस्तित्व में। हैं। त्रिगुणात्मक प्राकृतिक गुणों की सृष्टि की गई, जो सत्व, रज तथा तम नाम से जानी गई तथा समस्त जीवित तथा अजीवित तत्वों के क्रमशः उत्पन्न, पालन और संहार का कारक बानी।
सृष्टि के प्रारम्भ में भगवान शिव ने तंत्र की उत्पत्ति की जिनके साथ उनकी अर्धांगिनी पार्वती की तामसी शक्ति महाकाली रही जो समय-समय पर भयंकर रूप धारण करती हैं। परन्तु उनका भयंकर रूप केवल दुष्टों के लिए ही विनाशकारी हैं। वैसे यह देवी! सौम्य, सौम्य-उग्र तथा उग्र तीन स्वरूपों में हैं, जिनके स्वभाव के अनुसार “श्री कुल” और “काली कुल” विभाजित हैं।
महाकाली अपने भैरव महाकाल की छाती पर प्रत्यालीढ़ मुद्रा में खड़ी, घनघोर-रूपा महाशक्ति महाकाली के नाम से विख्यात हैं।
यह देवी अपने कार्य तथा गुण के अनुसार अनेकों अवतारों में प्रकट हुई। ऐसा नहीं हैं कि इनके सभी रूप भयानक हैं, सौम्य रूप में यह देवी कोमल स्वभाव वाली हैं। सौम्य-उग्र स्वरूप में देवी कोमल और उग्र (सामान्य) स्वभाव वाली हैं तथा उग्र रूप में देवी अत्यंत भयानक स्वभाव वाली हैं। इस प्रकार महादेवी के स्वरूप में दस महाविद्या, योगिनियाँ, डाकिनियाँ, पिसाचनियाँ, भैरवी आदि शक्ति के नाना अवतार हैं, जो गुण एवं स्वभाव से भिन्न-भिन्न हैं।
काली कुल की देवियाँ प्रायः घोर भयानक स्वरूप तथा उग्र स्वभाव वाली होती हैं तथा इनका सम्बन्ध काले या गहरे रंग से होता हैं, इसके विपरीत श्री कुल की देवियाँ सौम्य तथा कोमल स्वभाव की होती है।
काली कुल में महाकाली, तारा, बगलामुखी, धूमावती, छिन्नमस्ता महाविद्या आती हैं जिनका स्वभाव उग्र माना जाता हैं। जो दुष्टों के लिये ही भयानक रूप धारण करती हैं और श्री कुल में भुवनेश्वरी, त्रिपुरसुंदरी, कमला, त्रिपुर भैरवी और मातंगी हैं, जो अपने स्वभाव में सोम्य मानी जाती हैं।
माँ काली निरुपाधि-शुद्ध-शान्त चैतन्य-निलय में शवशिव के हृदय पर नियत ही नाचती हैं, मानो किसी भाव- मदिरा से विभोर हों । क्या वे केवल गुणमयी, गुणशोभात्मिका हैं ? नहीं, वैसी तो नहीं हैं। वे ही निखिल द्वैत का लेशपर्यन्त ‘मार्जन’ करके साक्षात् कैवल्य-दान करती हैं। वही काली कैवल्य-दायिनी हैं । सुतरां वे एकाधार में गुणात्मिका, गुणाश्रया और गुणातीता है। वे “ब्रह्माऽस्मि’ अर्थात् ‘मैं ब्रह्मरूप ही हूँ” इस अवबोध वा ज्ञानरूप खड्ग की छटा से मिथ्या अहमिका से विजृम्भित समस्त भवप्रत्यय का निरसन करती हैं।
वायु, पृथ्वी या मृदा, अग्नि तथा जल इन सारे तत्वों का निर्माण आकाश तत्व से ही हुआ हैं तथापि ये समस्त तत्व आकाश में ही विलीन हैं। इन पञ्च महा-भूतों या तत्वों का संतुलित मात्र में जीवित देह में रहना अत्यंत आवश्यक हैं, इन तत्वों या भूतों का असंतुलित होना ही विभिन्न रोगों को जन्म देता हैं तथा शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता को कम करता हैं। चिता भस्म! जो मानव मृत देह के दाह के पश्चात या महा-भूतों में विलय होने के पश्चात शेष रह जाता हैं, पञ्च महा-भूतों का सम्मिश्रण हैं, शिव जी तथा उनके अनुयायी इस भस्म का अपने शरीर पर लेप करते हैं।
पञ्च महा-भूतो के अनुसार ही, पञ्च इन्द्रियां भी समस्त प्राणिओं में अवस्थित हैं, इन इन्द्रियों द्वारा ही मनुष्य जीवन यापन करने में सक्षम हैं जो निम्न नामों से जाने जाते हैं।
१. चक्षु इन्द्रिय : जो भी हम अपनी आँखों से देखते हैं, देखने से सम्बंधित इन्द्रिय।
२. सत इन्द्रिय : कान या सुनने से सम्बंधित इन्द्रिय।
३. गंध इन्द्रिय : सूंघने की शक्ति या इन्द्रिय।
४. जिव इन्द्रिय : स्वाद चखने से सम्बंधित इन्द्रिय।
५. स्पर्श इन्द्रिय : स्पर्श से सम्बंधित इन्द्रिय।
इन पञ्च इन्द्रियों के अलावा भी ‘सोचने’ की एक और इंद्री मानी जाती हैं, जिसका सम्बन्ध किसी भी शारीरिक अंग से नहीं हैं।
यह सभी इन्द्रियां! काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार मनुष्य स्वभाव से सम्बद्ध! दोष या अवगुणों को उत्पन्न करती हैं। सर्वदा ऐसा नहीं है कि! यह इन्द्रियां नाना प्रकार के दोषों को ही उत्पन्न करती हैं, व्यक्ति का स्वभाव इन्हीं इन्द्रियों के द्वारा ही निर्मित होता हैं। यह व्यक्ति के ऊपर निर्भर करता हैं की वह इन इन्द्रिओं का कैसे उपयोग या सञ्चालन करता हैं; सुकर्मों के लिये या कुकर्मों के लिये। समस्त जीवों में मनुष्य केवल मात्र एक ऐसा प्राणी हैं, जो विवेक शील हैं, अच्छा या बुरा सोचने में वह समर्थ तथा सक्षम हैं। व्यक्ति द्वारा इन्हीं पञ्च इन्द्रिय सञ्चालन के स्वरूप से ही उसके विवेक, बुद्धि का परिचय मिलता हैं; समस्त इन्द्रियों का सञ्चालन हृदय या मस्तिष्क द्वारा होता हैं। ज्ञान का प्रकाश ही एक ऐसा माध्यम हैं, जिससे व्यक्ति अपने अंदर के अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट करता हैं या जलाता हैं। ज्ञान रूपी प्रकाश से व्यक्ति अपने हृदय में स्थित समस्त अवगुणों को जला-कर भस्म कर देता हैं और जब यह विकार मनुष्य के हृदय से लुप्त होते हैं तो हृदय ब्रह्म युक्त हो जाता हैं। हृदय श्मशान का प्रतीक भी हैं, हृदय में स्थित समस्त विकार जल जाने पर चिद्-ब्रह्म जो आदि शक्ति महामाया का ही स्वरूप हैं, उनका निवास स्थान होता हैं एवं वह विद्वान हो जाता हैं।
अतः श्मशान वह स्थान हैं, जहाँ महा-भूत या इन्द्रियों से उत्पन्न अवगुणों का दाह होता हैं, नष्ट होते हैं।
राग द्वेष आदि अवगुणों का दाह करने पर ही हृदय पर आदि शक्ति महामाया, चिद-ब्रह्म स्वरूप में वास करती हैं, जिसे अष्ट पाशों से मुक्ति कहते हैं।
मानव खोपड़ी, खप्पर, हड्डियां, बौद्ध तथा हिन्दू शक्ति साधनाओं तथा तामसिक तांत्रिक पद्धतियों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। वीर-साधना नमक तंत्र में मृत देह से प्राप्त वस्तुओं, शव के तांत्रिक उपयोग तथा साधना पद्धति पर विशेष प्रकाश डाला गया हैं। इस प्रकार की तामसी साधनाएँ अत्यंत ही भयंकर और डरावनी होती हैं तथा एकांत में ही की जाती हैं; इस प्रकार की साधना करने वाले साधक कपाली, अघोरी इत्यादि नाम से जाने जाते हैं।
अघोर पंथ एक व्रत हैं, जो सर्वाधिक सरल हैं तथा वीर पद की प्राप्ति हेतु एक तामसी शक्तिओं की आराधना करने वाले साधक सामान्यतः श्मशान में ही रहते थे; अपने इष्ट देवताओं के अनुसार उन्हें भी इष्ट प्रिय स्थानों पर वास करना पड़ता हैं। तामसी शक्ति से सम्पन्न प्रायः सभी देवी-देवता, भूत, प्रेत, योगिनिया, पिसाचनियां इत्यादि श्मशान भूमि को ही अपना निवास स्थान बनती हैं तथा उनकी अरराना करने वाले साधक भी वही भय मुक्त या निर्भीक होकर रहते हैं; इस प्रकार के तत्त्वों के सामान्य रूप में उपयोग करने का केवल मात्र यह ही उद्देश्य होता हैं।
तंत्र शास्त्र के अंतर्गत सात प्रकार के साधना पद्धतियों या आचारों का वर्णन प्राप्त होता हैं, जो दो मुख्य धारणाओं में विभाजित हैं प्रथम पश्वाचार या पशु भाव तथा द्वितीय विराचार। इसके अतिरिक्त दिव्य-भाव त्रय के अंतर्गत सम्पूर्ण प्रकार के सिद्धि पश्चात जब साधक स्वयं शिव तथा शक्ति के समान हो जाता हैं।
पशु भाव के अंतर्गत चार प्रकार के साधन पद्धतियों को समाहित किया गया हैं जो निम्नलिखित हैं।
१. वेदाचार, २. वैष्णवाचार, ३. शैवाचार ४. दक्षिणाचार।
१. वेदाचार : तंत्र के अनुसार सर्व कोटि की उपासना पद्धति वेदाचार हैं, जिसके तहत वैदिक याग-यज्ञादि कर्म विहित हैं।
२. वैष्णवाचार : सत्व गुण से सम्बद्ध, सात्विक आहार तथा विहार, निरामिष भोजन, पवित्रता, व्रत, ब्रह्मचर्य, भजन-कीर्तन इत्यादि कर्म विहित हैं।
३. शैवाचार : शिव तथा शक्ति की उपासना, यम-नियम, ध्यान, समाधि कर्म विहित हैं।
४. दक्षिणाचार : उपर्युक्त तीनों पद्धतियों का एक साथ पालन करते हुए, मादक द्रव्यों का प्रयोग विहित हैं।
इन्हीं आचार-पद्धतियों को भाव त्रय १. पशु भाव २. वीर भाव ३. दिव्य भाव कहा जाता हैं।
एक अघोरी साधक, मनुष्य हड्डियों तथा खोपड़ी के आभूषण धारण तथा चिता भस्म लगाये हुए।
अघोरी साधक
अष्ट पाश : घृणा, शंका, भय, लज्जा, जुगुप्सा, कुल, शील तथा जाती
पशु भाव आदि भाव हैं, मनुष्य पशुओं में सर्वश्रेष्ठ तथा सोचने-समझने या बुद्धि युक्त हैं। जब तक मनुष्य के बुद्धि का पूर्ण रूप से विकास ना हो, वह पशु के ही श्रेणी में आता हैं। जिसकी जितनी बुद्धि होगी उसका ज्ञान भी उतना ही श्रेष्ठ होगा। पशु भाव से ही साधन प्रारंभ करने का विधान हैं, यह प्रारंभिक साधन का क्रम हैं, आत्म तथा सर्व समर्पण भाव उदय का प्रथम कारक पशु भाव क्रम से साधना करना हैं। यहाँ भाव निम्न कोटि का माना गया हैं, स्वयं त्रिपुर-सुंदरी, श्री देवी ने अपने मुखारविंद से भाव चूड़ामणि तंत्र में पशु भाव को सर्व-निन्दित तथा सर्व-निम्न श्रेणी का बताया हैं। अपनी साधना द्वारा प्राप्त ज्ञान द्वारा जब अज्ञान का अन्धकार समाप्त हो जाता हैं, पशु भाव स्वतः ही लुप्त हो जाता हैं। शास्त्रों के अनुसार पशुत्व लक्षण आठ प्रकार युक्त मानव स्वभाव लक्षणों या पाशों से हैं; १. घृणा, २. शंका, ३. भय, ४. लज्जा, ५. जुगुप्सा, ६. कुल, ७. शील तथा ८. जाती।
यह अष्ट मानव लक्षण सर्वदा ही मनुष्य के आध्यात्मिक उन्नति हेतु बाधक माने गए हैं तथा साधन पथ में तज्य हैं। पशु भाव साधन क्रम के अनुसार साधक इन्हीं लक्षणों या पाशों पर विजय पाने का प्रयास करता हैं।
१. घृणा : व्यक्ति-विशेष के शरीर, इन्द्रियां तथा मन को न भाने वाली तथा तिरस्कृत करने वाला लक्षण घृणा कहलाती हैं। संसार के समस्त तत्व या पञ्च तत्व से निर्मित प्रत्येक वस्तुओं में किसी भी प्रकार का विकार अनुभव करना ही घृणा हैं, जो अभिमान, अहंकार इत्यादि विकारों को जन्म देता हैं। मनुष्य के हृदय पर किसी वस्तु या तत्व के प्रति प्रेम तथा किसी के प्रति तिरस्कार हैं तथा प्रत्येक तत्व में परमात्मा के अस्तित्व से अनभिज्ञ हैं।
२. शंका : किसी व्यक्ति के प्रति संदेह की भावना शंका हैं। विषय-आसक्त, माया-मोह में पड़ा हुआ मनुष्य, अपने विकास के लिये नाना प्रकार के छल-प्रपंच में लिप्त रहता हैं, कपट व्यवहार करता हैं, झूठ बोलता हैं, देहाभिमानी हैं, परिणामस्वरूप वह दूसरे को भी ऐसा ही समझ कर उस पर संदेह करता हैं।
३. भय : मनुष्य को अपने शरीर, प्रिय-जन, संपत्ति, अभिलषित वस्तुओं से प्रेम रहता हैं तथा इसके नष्ट होने का सर्वदा भय रहता हैं। भौतिक वस्तुओं के नाश का उसे सर्वदा भय रहता हैं परन्तु आत्म के नाश का नहीं तथा आत्म तत्व को जानने की कोई आवश्यकता नहीं होती हैं। अन्य कई कारण हैं जो भय को उत्पन्न करती हैं; जैसे अपने सनमुख होने वाली कोई अप्रिय घटना इत्यादि
४. लज्जा : सामान्यतः मनुष्य के हृदय में मान-अपमान भावना का उदय होना लज्जा कहलाता हैं। मनुष्य का शरीर नश्वर हैं, फिर शरीर के मान-अपमान का कितना महत्व हो सकता हैं? तथा शरीर को जीवन देने वाली आत्म साक्षात् परमात्मा ही हैं तथा मान-अपमान से परे हैं।
५. जुगुप्सा : दूसरों की निंदा-चर्चा करना जुगुप्सा कहलाती हैं, मनुष्य दूसरों के गुण तथा दोषों को देखता हैं तथा अपने दोषों का मनन नहीं कर पाता।
६. कुल : उच्च कुल या वंश में जन्म कुल-भाव से हैं, जैसे उच्च कुल में पैदा हुआ अपने आप को उच्च मानता हैं तथा दूसरे के कुल को छोटा। यह भाव मनुष्य के अन्दर छोटा या बड़ा होने के प्रवृति को उदित करता हैं तथा उसके विचार भेद-भाव युक्त हो जाते हैं।
७. शील : शिष्टाचार का अभिप्राय शील हैं, अन्य लोगों के प्रति मानव का व्यवहार, सेवा, उठने-बैठने का तरीका
शिष्टाचार या शील कहलाती हैं। शीलता के बंधन को काट देने पर साधक विचार तथा कर्म में स्वतंत्र हो जाता हैं तथा उसे ये चिंता नहीं रहती हैं की कोई अन्य उसके बारे में क्या सोच रहा हैं।
८. जाती : मनुष्य का अपना जात्यभिमान, उसके हृदय में बड़े या छोटे भावना का प्रतिपादन करता हैं। जाती भेद को समदर्शी न मानने वाला पशु भाव से ग्रस्त हैं, चारों जातियां क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र सभी परम-पिता ब्रह्मा जी के संतान हैं।
शक्ति साधना मार्ग में प्रयुक्त होने वाले, पञ्च-मकार (मद्ध, मांस, मत्स्य, मुद्रा तथा मैथुन) के कारण।
साधक को शिवत्व प्राप्त करने हेतु इन सभी पाशों या लक्षणों से मुक्ति होना अत्यंत आवश्यक हैं। जो इन अष्ट-पाशों में से किसी एक से भी ग्रस्त हैं, मनोविकार युक्त हैं, वह सर्वदा, सर्व-काल तथा सर्व-व्यवस्था में साधना करने में समर्थ नहीं हो सकता। चित निर्मल हुए बिना, समदर्शिता तथा त्याग की भावना का उदय होना अत्यंत कठिन हैं, चित को निर्मल निर्विकार करने हेतु पशु भाव का त्याग अत्यंत आवश्यक हैं। पशु भाव से साधना प्रारंभ कर अष्ट पाशों, मनोविकारों पर विजय पाकर ही साधक वीर-भाव में गमन का अधिकारी हैं। वस्तुतः पशु भाव युक्त साधना कर साधक इन अष्ट-पाशों या विकारों से मुक्त होने का प्रयास करता हैं।
वीर भाव : इस भाव तक आते-आते साधक! अष्ट-पाशों के कारण होने वाले दुष्परिणामों को साधक समझने लगता हैं, परन्तु उनका पूर्ण रूप से वह त्याग नहीं कर पाता हैं, परन्तु करना चाहता हैं। इसी प्रकार पशु भाव से अपने देह तथा मन की शुद्धि करने के प्रयासरत साधक, वीर-भाव से साधन कर पाता हैं। वीर-भाव का मुख्य आधार केवल यह हैं कि! साधक अपने आप में तथा अपने इष्ट देवता में कोई अंतर न समझें तथा साधना में रत रहा कर अपने इष्ट देव के समान ही गुण-स्वभाव वाला बने। वीर-भाव बहुत ही कठिन मार्ग हैं, बिना गुरु आज्ञा तथा मार्गदर्शन के यह साधन हानिकारक ही होती हैं, इस मार्ग को कुल, वाम, कौल, वीरा-चार नाम से भी जाना जाता हैं। साथ ही साधक का दृढ़ निश्चयी भी होना अत्यंत आवश्यक हैं, किसी भी कारण इस मार्ग का मध्य में त्याग करना उचित नहीं हैं, अन्यथा दुष्परिणाम अवश्य हैं। जिस साधक में किसी भी प्रकार से कोई शंका नहीं हैं, वह भय मुक्त हैं, निर्भीक हैं, निर्भय हो किसी भी समय कही पर भी चला जाये, लज्जा व कुतूहल से रहित हैं, वेद तथा शास्त्रों के अध्ययन में सर्वदा रत रहता हैं, वहवीर साधन करने का अधिकारी हैं। साधन के इस क्रम में मूल पञ्च-तत्व के प्रतीक पञ्च-तत्वों से साधना करने का विधान हैं, जिसे पञ्च-मकार नाम से जाना जाता हैं।
साधना के इस क्रम में साधन पञ्च-मकार विधि से की जाती हैं! यह पञ्च या पांच तत्व हैं १. मद्य, २. मांस ३. मतस्य ४. मुद्रा तथा ५. मैथुन, इन समस्त द्रव्यों को कुल-द्रव्य भी कहा जाता हैं। सामान्यतः इनमें से केवल मुद्रा (चवर्ण अन्न तथा हस्त मुद्रायें) को छोड़ कर सभी को निन्दित वस्तु माना जाता हैं, वैष्णव सम्प्रदाय तो इन समस्त वस्तुओं को महा-पाप का कारण मानता हैं, मद्य या सुरा पान पञ्च-महा पापों में से एक हैं। परन्तु आदि काल से ही वीर-साधना में इन सब वस्तुओं के प्रयोग किये जाने का विधान हैं। कुला-चार केवल साधन का एक मार्ग हैं तथा इस मार्ग में प्रयोग किये जाने वाले इन पञ्च-तत्वों को केवल अष्ट-पाशों का भेदन कर, साधक को स्वतंत्र-उन्मुक्त बनाने हेतु प्रयोग किया जाता हैं। साधक इन समस्त तत्वों का प्रयोग अपनी आत्म-तृप्ति हेतु नहीं कर सकता, इनका कदापि आदि नहीं हो सकता, साधक केवल अपने इष्ट देवता को समर्पित कर ग्रहण करने का अधिकारी हैं, यह केवल उपासना की सामग्री हैं, उपभोग की नहीं। अति-प्रिय होने पर भी, इन तत्वों से साधक किसी प्रकार की आसक्ति नहीं रख सकता हैं, यह ही साधक के साधना की चरम पराकाष्ठा हैं।
देखा जाये तो आदि काल से ही शैव तथा विशेषकर शक्ति संप्रदाय से सम्बंधित पूजा-साधना तथा पितृ यज्ञ कर्मों में मद्य, मांस, मीन इत्यादि का प्रयोग किया जाता रहा हैं। ऋग्-वेद! देव तथा पितृ कार्यों हेतु हिंसा को पाप नहीं मानता। कुलार्णव तंत्र (कौल या कुल धर्म के विवरण सम्बन्धी तंत्र) के अनुसार, शास्त्रोक्त विधि से देवता तथा पितरों का पूजन कर मांस खानेवाला तथा मद्य पीने वाला
किसी भी प्रकार के दोष का भागी नहीं होता। बिना यज्ञ कर्मों के मांस-मदिरा सेवन दोष युक्त माना गया हैं तथा पाप की श्रेणी में आता हैं। मंत्रों द्वारा पवित्र किया गया या शास्त्रोक्त विधि से कुल द्रव्य या तत्व, गुरु तथा देवता को अर्पण कर पान करने वाला भव सागर के बंधन से मुक्त हो जाता हैं, तथा किसी भी प्रकार के दोष का भागी नहीं हैं। मतस्य-मांस, सुरा इत्यादि मादक द्रव्यों का कौल मार्ग में दीक्षा संस्कार के पश्चात, देव कार्य पूजन के अतिरिक्त सेवन दोष युक्त माना गया हैं।
मद्य, मांस, मतस्य, मुद्रा के सेवन का मुख्य कारण! सामान्यतः मद्य निन्दित वस्तुओं से माना जाता हैं, परन्तु मादक द्रव्यों में मद्य या सुरा सर्वोत्तम द्रव्य माना जाता हैं, इसके सेवन से मनुष्य नशे में लिप्त हो, आत्म विस्मृत की अवस्था को प्राप्त कर उन्मत हो जाता हैं। अन्य मादक द्रव्यों के समान मद्य मनुष्य में आलस्य नहीं लाता हैं, आलसी मनुष्य को क्रिया-शील करने में मद्य विशेष प्रभाव दिखता हैं। अष्ट-पाशों का जो सादाहरण या मानसिक बल से परित्याग कर विमुक्त होने में समर्थ नहीं हैं, वह सुरा पान रूपी ओषधि का प्रयोग कर, इन पाशों का त्याग करने या नियंत्रण करने में सफल होता हैं। मद्य पान ध्यान केन्द्रित करने में पूर्णतः सक्षम हैं तथा इसी करण वश शक्ति साधनाओं में प्रयुक्त होता हैं। साधक जिस किसी ओर चाहे, अपना ध्यान पूर्ण केन्द्रित कर सकता हैं, वास्तव में मद्य पान कर साधक आत्म-विस्मृत की अवस्था को प्राप्त करता हैं तथा सर्व प्रकार से चिंता रहित हो, ध्यान केन्द्रित कर पाता हैं। मद्य उत्कट उत्तेजक
पदार्थ हैं, तथा इसका प्रयोग मांस, मतस्य, चर्वण अन्न के साथ प्रयोग किया जाता हैं। मदिरा के साथ, मांस-मत्स्य इत्यादि का प्रयोग, मदिरा में व्याप्त विष को शांत करने हेतु किया जाता हैं साथ ही पौष्टिक भोजन के अलावा मदिरा का सेवन मनुष्य को मृत्यु की ओर ले जाता हैं। मदिरा के साथ या अन्य मादक द्रव्यों के साथ मांस इत्यादि का सेवन मनुष्य को बलवान एवं तेजस्वी बनता हैं।
पंच-मकार विधि से साधना करने का मुख्य उद्देश्य : पञ्च-मकार साधना केवल मात्र इष्ट देवता की पूजा हेतु विहित हैं न की स्व-तृप्ति या विषय-भोग के लिए, समस्त भौतिक सुखों से पंच-मकार विधि मुक्ति पाने हेतु केवल साधन मात्र हैं। सादाहरण मनुष्य विषय-भोगो में सर्वदा आसक्त रहता हैं और अधिक प्राप्त करने का प्रयास करता हैं तथा सर्वदा उनमें लिप्त रहता हैं, आदी हो जाता हैं। परन्तु वीराचारी आसक्त से सर्वदा दूर रहता हैं, किसी भी प्रकार से विषय-भोगो में आसक्ति, लिप्त रहने का उसे अधिकार नहीं हैं, सर्वदा ही उसे उन्मुक्त रहना पड़ता हैं, वह आदी नहीं हो सकता हैं। स्त्री संग करने पर साधक पर स्त्री का कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये, न मोह न प्रेम। इसी तरह मद्य, मांस तथा मतस्य के सेवन के पश्चात भी, शरीर पर इनका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये, मद्य पान करने पर साधक के शरीर में पूर्ण चेतना रहनी चाहिये।
वास्तव में देखा जाये तो, यह पंच-मकार मनुष्य के अष्ट पाशों के बंधन से मुक्त होने में सहायक हैं, सर्वश्रेष्ठ विषय भोगो को भोग करते हुए भी, विषय भोगो के प्रति अनासक्ति का भाव, इस मार्ग का चरम उद्देश्य हैं। जब तक मानव पाश-बद्ध, विषय-भोगो के प्रति आसक्त,
देहाभिमानी हैं, वह केवल जीव कहलाता हैं, पाश-मुक्त होने पर वह स्वयं शिव के समान हो जाता हैं। वीर-साधना या शक्ति साधना का मुख्य उद्देश्य शिव तथा समस्त जीवों में ऐक्य प्राप्त करना हैं। यहाँ मानव देह देवालय हैं तथा आत्म स्वरूप में शिव इसी देवालय में विराजमान हैं, अष्ट पाशों से मुक्त हुए बिना देह में व्याप्त सदा-शिव का अनुभव संभव नहीं हैं। शक्ति साधना के अंतर्गत पशु भाव, वीर-भाव जैसे साधन कर्मों का पालन कर मनुष्य सफल योगी बन पता हैं।
जब जीवन में प्रबल पुण्योदय होता है तभी साधक सभी आसक्तियों को त्याग ऐसी प्रबल शत्रुहन्ता, महिषासुर मर्दिनी, वाक् सिद्धि प्रदायक महाकाली साधना सम्पन्न करता है।
काशी में गंगा नदी उत्तर वाहिनी हैं, के मणि-कर्णिका घाट में शिव जी सर्वदा उपस्थित रहकर, वहाँ दाह होने वाले प्रत्येक शव के कान में तारक मंत्र बोलते हैं, जिससे उन्हें सहज ही मोक्ष प्राप्त होता हैं। श्मशानों के द्वारपाल शिव जी के अवतार नाना भैरव होते हैं, काशी के द्वारपाल काल भैरव हैं, काशी के दक्षिण ओर स्थित राजा हरिश्चंद्र घाट में शिव जी, मसान रूप में पूजे जाते हैं, जो सर्वाधिक भयंकर रूप वाले तथा श्मशान के स्वामी हैं। शिव जी कपाल तथा खप्पर धारण करते हैं, चिता-भस्म का अपने शरीर में लेप करते हैं, वास्तव में संहार तथा विघटन से सम्बंधित वस्तुओं के वे स्वामी हैं। प्रत्येक वस्तु जिसका त्याग किया जाता हैं तथा जिसका सम्बन्ध भविष्य में विघटन से हैं, उनके स्वामी शिव जी ही हैं।

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