Home मधुलिका यादव शची परशुराम जयंती सिर्फ एक राजनीतिक जयंती | प्रारब्ध

परशुराम जयंती सिर्फ एक राजनीतिक जयंती | प्रारब्ध

लेखिका - मधुलिका शची

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एक महोदय पत्रकार हैं चूँकि बुद्धिजीवी होने के लिए उल्टा बाँस बटेर होना पड़ता है तो उन्होंने अपना बटेर लिखा और कई राष्ट्रवादी भी वहाँ हाँ में हाँ मिला रहे थे भले ही उन्होंने पोस्ट का मन्तव्य न समझा हो या पूरा पढ़ा न हो तब भी हाँ में हाँ मिला रहे थे…..
उनके लेख की कई बातों का उत्तर प्रश्नोत्तरी में दे रही हूँ..
आपका वाक्य : परशुराम जयंती सिर्फ एक राजनीतिक जयंती है ..
उत्तर : जी बिल्कुल राजनीतिक जयंती है पर सिर्फ नहीं, यह चेतना जयंती भी है। कुछ समय पहले आप लोग राम जी को भी राजनीतिक स्टंट मानते थे और साबित करने पर तुले थे…..मगर आप फुस्स हुए औऱ हम संगठित हुये।
आपका वाक्य : परशुराम को स्थापित करने की कोशिश करने वाले परशुराम की मातृ हंता वाली छवि को डिफेंड नहीं कर पाते , यह उनका पीछा ही नहीं छोड़ पाता….
उत्तर : कहीं कहीं व्यंग्य में शिव जी को भी पुत्र हंता के रूप में कहते थे, ससुर हंता कहते थे मगर व्याख्या हुई और वास्तविक बात सामने आई।
परशुराम को जो मातृ हंता कहते हैं वह ठीक वैसा ही है जैसे रामजी द्वारा लक्ष्मण को मृत्यु दंड देना अर्थात उस समय यह कहना कि स्वजनों का त्याग कर देना भी मृत्यु दंड के समान है,
ठीक यही बात वहां भी रेणुका के साथ हुई वहाँ रेणुका माता का त्याग करने को जब बाकी पुत्रों को कहा गया तो सभी असमर्थता जताए लेकिन परशुराम ने पिता के कहने पर भाईयों सहित माता का त्याग कर दिया।
रेणुका पतिवियोग में जी नहीं सकती थी लेकिन परशुराम द्वारा वरदान मांगने के पश्चात जमदग्नि ऋषि द्वारा रेणुका को अपना लेना ही पुनर्जीवन है।
अब आधा मानने से नहीं चलेगा कि जादू से जीवित करना संभव नहीं लेकिन इस मुद्दे पर अपने हिसाब से संभव मान लेना है।
उस समय बालक परशुराम से उनके पिता जमदग्नि कहेंगे कि अपनी माता की हत्या कर दो, ऐसा वक्तव्य तो जमदग्नि पर प्रश्न चिन्ह लगाता है, बालक पर नहीं ।
अतः राम जी, शिव जी के मामले में ढेर सारी व्याख्याएं हुई है तब जाकर भ्रांति हटी है ऐसे ही प्रतीक्षा करिये समय आने पर परशुराम जी की भी खूब व्याख्या होगी और भ्रांति हटेगी…….
खैर, कुछ लोग सदैव भ्रांतिमान अलंकार में जीते हैं उनको समझाना संभव नही।
आपका वाक्य : ब्राह्मण क्षत्रिय सत्ता के लिए खूब लड़ते थे लेकिन जब बात शूद्रों की आती थी तो आपस में एक हो जाते थे,
उत्तर: आपका यह वाक्य पढ़कर मुझे पता चल गया कि आप रट्टू तोता वाले इतिहासकार हो औऱ चूंकि पत्रकार हो तो अर्ध सत्य परोसने और अर्ध ज्ञान के अतिरक्त आपके पास कुछ नहीं होता ।
आप एक भी ऐसा तथ्य पेश नहीं कर सकते ,एक भी ऐसी घटना का उल्लेख नहीं कर सकते जिसमें ऐसी बात कहीं हो,
वामपंथी इतिहास का यह पन्ना मैं भी पढ़ी हूँ जहां खुद इतिहासकार भी एक भी ऐसा तथ्य नहीं दे पाया है, बस जो मन में आया लिख दिया।
आपका वाक्य: ब्राम्हण और श्रमण का टकराव जिसमें ब्राह्मण बौद्धों पर अपना प्रभाव जमाने का प्रयत्न करते हैं…..
उत्तर ; आपको यह भी लिखना था कि कौन से ब्राह्मण बौद्धों पर अपना प्रभाव जमाने का प्रयत्न कर रहे थे..
क्या वो जो शैव, शाक्त, आजीवक, वैष्णव में खुद बटे हुए थे जो खुद एक दूसरे पर अपना प्रभाव जमाने का प्रयत्न करते थे,
भारत भूमि दर्शन की मानसिक कुश्ती का क्षेत्र है यहाँ तो ऐसे खेल हमेशा होते रहे हैं …और होना चाहिए अन्यथा दर्शन की विशालता नष्ट हो जाएगी…
आपका आरोप है कि ब्राह्मण सिर्फ सत्ता में स्थान पाने के लिए ऐसा कर रहें है तो क्या दिक्कत है भई…..!!
राम के माध्यम से क्षत्रिय अपना पक्ष मजबूत करेंगे, तो परशुराम के माध्यम से ब्राम्हण,
निषादराज के माध्यम से निषाद करेंगे …..
सारी हिन्दू जातियाँ अपने गर्व के लिये महापुरुष खोज रहीं हैं यह तो हमारे लिए अत्यंत खुशी की बात है क्योंकि इससे जातीय स्तर पर हिन्दू इतना मजबूत हो जाएगा कि हिन्दू विरोधी शक्तियाँ चाहकर भी धर्म परिवर्तन नहीं करा पाएंगी……और सभी जातियाँ सत्ता में भागीदार बनी रहेंगी ठीक सतयुग के समय की तरह..
खैर,
आप लोग व्यथित हो यही हमारे लिए खुशी की बात है।
दूसरी बात आप डर रहे हो हिंदुओं के अंदर परशुराम नाम का जागरण देखकर, आप चिंतित हो इस बात को लेकर कि राम नाम का जागरण इतना प्रभावी हुआ तो परशुराम नामका जागरण कितना प्रभावी होगा……?
“झा” जी यदि बुरा लगा हो तो कोई बात नहीं आपको बुरा लगाने के लिए ही पोस्ट लिखी गयी है,
खैर ,
मुझे पता है आपको बुरा नहीं लगेगा क्योंकि आज के जमाने में पत्रकार बनने से पहले खुद की हत्या अपने ही हाथों से करनी पड़ती है ताकि किरदार बेचकर लक्ष्मी लेते समय हाथ न कांपे..!
खैर यह पॉइंटेड लेख था ,आपकी तरह लच्छेदार भाषा में फिर कभी पोस्ट होगी।

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