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पवित्र पावन हमारी गंगा

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पवित्र पवन हमारी गंगा

आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी परीक्षण कर माना कि हिन्दुओं में परमपवित्र मानी जाने वाली गंगा सचमुच ही सामान्य जल से अलग, विशिष्ट औषधीय गुणों से युक्त चमत्कारी जल/नदी है।यह अलग बात है कि समुद्र तक के यात्रा क्रम में मानवसृजित जितना प्रदूषण उसमें डाला जाता है कि अन्तिम पड़ाव पहुँचते वह उतनी शुद्ध पवित्र उपयोगी नहीं रह पाती। तो, अन्तिम पड़ाव के जल को जाँचकर यदि यह कहा जाय कि गंगा पवित्र पूजनीय नहीं,यह प्रदूषित अमंगलकारी है।अतः इसे मिटाकर इसके स्थान पर जमीन खोदकर कोई दूसरी नयी नदी बनायी जिसे आरओ वॉटर से भरकर एकदम साफ सुथरी पेय बना दी जाय,,फिर उसी को पूजा जाय,, क्या उचित होगा यह विचार?

ठीक ऐसे ही अनन्त काल से चली आ रही सनातन धर्म रूपी जान्हवी, जो काल विशेष के दुरुहताओं से जूझती,अपने विद्वेषियों के विध्वंस का सामना करती बही चली आ रही है,,, यदि इसके कर्मविधानों, परंपराओं में कोई विचलन दूषण आ गया है तो इसे त्यागकर,इससे विरोध रखकर,समाज समूह कोई नया धर्म बना ले और जिस कोख से उक्त पन्थ जन्मा,उसी की हत्या को तत्पर हो जाय??मतलब मातृहन्ता होकर अमरत्व पाना चाहे।पा लेगा??
वैसे सनातन धर्म कोई पुस्तक लिखित/निर्देशित नियमावली नहीं,वह कल्याणकारी वह व्यवस्था है जो मानव ही नहीं प्रकृति के कण कण में सहअस्तित्व की भावना, सम्पूर्ण मानवता धारण करने की प्रेरणा और पथप्रदर्शन देती है। यह तो वह अथाह समुद्र है,जिसमें असंख्य नदियाँ धाराएँ आकर मिलती हैं और समुद्र सहर्ष सबको मान और स्थान देता है।किन्तु जलीय रूप की समानता देखते यदि नदियाँ ही अपना सामर्थ्य भूल कर समुद्र से विरोध करने लगें, उसे मिटाने की ठानें तो इस अहंकार की परिणति क्या होगी?
जहाँ की हमनें कल्पना भी नहीं की है, विश्व के उन भागों से हिन्दू धर्म से जुड़े धार्मिक साक्ष्य यदा कदा मिलते ही रहते हैं और उन्हें देख यह मानना ही पड़ता है कि सनातन ही पृथ्वी का मूल धर्म है।भले उक्त भूभाग में आज इसे मानने वाला कोई नहीं है। इसके अमरत्व में आस्था इसलिए रखनी पड़ती है क्योंकि विश्व का ऐसा और दूसरा कोई विश्वास नहीं, जो इतनी विराटता रखता हो, जीवमात्र के कल्याण, सौहार्द्र,सुख और शान्ति के ऐसे सिद्धांत रखता हो और जब ऐसा सार्वभौमिक कल्याण भाव होगा,तो मानव अस्तित्व के लुप्त होने तक,इसका लुप्त होना सम्भव नहीं हो सकता।
पन्थों वादों का भी अनन्त काल से यह दुर्भाग्य ही रहा है कि एक विराट मूल(सनातन धर्म) से किसी विश्वास को लेकर आगे बढ़े ये कालांतर में स्वयं को मूल से अलग ही नहीं,उससे श्रेष्ठ मानने लगते हैं। आरंभिक अवस्था में भले इनका उद्देश्य कल्याणकारी होता है,पर बाद में स्वयं को ये रूढ़ियों,तंग घेरों में ऐसे बाँधते हैं,अपने स्वरूप को सुदृढ अक्षुण्ण रखने को स्वयं को इस प्रकार से तालाब में परिवर्तित कर लेते हैं कि विश्लेषण आत्मशोधन एवं दोषप्रच्छालन के अभाव में उन्हीं पुराने गन्दलाते विचारों का प्रवाहहीन वह तालाब दूषित जलकुंभियों से भरकर सर्वथा अकल्याणकारी आत्महन्ता बन जाता है।उदाहरण के लिए कई नाम लिए जा सकते हैं।
वर्तमान भारत से बाहर के केवल अब्राहमिक किताबी पन्थ ही नहीं,भारतभूमि पर कुछ सौ या हज़ार वर्ष पूर्व सनातन से जन्में, उसके ही किसी विश्वास विशेष को साथ लेकर आगे बढ़े बौद्ध सिक्ख कबीरपंथी आदि अनेकानेक पन्थों ने भी अपने मूल उद्गम को विस्मृत कर स्वयं को किताबों में समेटकर, हिन्दुत्व से उग्र विरोध के कारण स्वयं को उसी रास्ते पर डाल लिया है जो सीधे विनाश की ही ओर जाती है।दुःखद यह कि सुख बाँटने के उद्देश्य से निकले ये वाद/विश्वास/पन्थ अपने इस यात्रा क्रम में अपरिमित दुःख विध्वंस पतन बाँटते नष्ट होते हैं।सीधी सी बात है, जो पन्थ “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का भाव नहीं रखेंगे,दोषों के प्रति सजग और उन्हें दूर करने को प्रतिबद्ध नहीं होंगे, काल के ग्रास होंगे।

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