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दृष्टि : एक नज़र धर्म और इतिहास पर

देवेन्द्र सिकरवार

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वैसे तो मैं विकास दिव्यकीर्ति का प्रशंसक कभी नहीं रहा लेकिन वर्तमान में जो कुछ किया जा रहा है वह सिर्फ और सिर्फ कुछ छुटभैयों द्वारा उनके संस्थान से मोटी रकम ऐंठने और अपनी राजनीति चमकाने का प्रयत्न भर नजर आ रहा है।
इस प्रकरण में जो सबसे खतरनाक बात नजर आ रही है वह यह है कि ये लंबी लंबी जटा रखने वाले, चित्र विचित्र मेकअप करके भगवा ओढ़कर बैठने वाले, अध्ययनशून्य कथाकार, मठाधीश पोंगे और जन्मनाजातिवादी करपात्री गिरोह के लोग हिंदुत्व पर उसी तरह नियंत्रण बनाना चाहते हैं जैसे इस्लाम में कठमुल्लों ने बनाया हुआ है।
विकास दिव्यकीर्ति ने जो कुछ कहा है उसका प्रत्याख्यान किया जाना चाहिए, किया जायेगा-
तथ्यों से,
तर्कों से,
प्रमाणों से,
जो कि हिंदुत्व की परंपरा है।
अगर मार दो, काट दो, आग लगा दो, माँ बहन की गाली आदि देनी हैं तो इस्लाम कुबूल करो और हिंदुत्व को अपनी सड़ांध से मुक्त करो।
फेसबुक दिनों दिन गुंडों का अड्डा बनता जा रहा है जहां तर्क व प्रमाण का कोई अर्थ नहीं रह गया है और इतिहास के नाम पर मनमाने तरीके से मनगढ़ंत कहानियां लिखी जा रही हैं।
अगर तुम्हारी आस्था प्रश्नों से परे है तो स्पष्टतः वह तुम्हारे खोखले अहं का प्रदर्शन है क्योंकि कोई भी आस्था तर्क, प्रमाण व संदर्भ से परे नहीं है और अगर है तो उसे स्वयं तक सीमित रखिये, दूसरे पर लादने का तालिबानी प्रयत्न मत कीजिये।
मैंने पहले भी कहा है और लिखा भी है कि राम, कृष्ण और शिव ये तीन ऐसी विभूतियां हैं जो प्रश्नों से परे हैं लेकिन यह मेरी आस्था नहीं बल्कि उनके महतकृत्यों और अनंत विशाल व्यक्तित्वों के कारण हैं जहाँ हर प्रश्न का तार्किक, प्रामाणिक और वैज्ञानिक उत्तर उपस्थित है।
राम, कृष्ण और शिव किसी भी आक्षेप या बचाव से परे हैं परंतु फिर भी मैं, राम का रक्तवंशज, अपने इस महान पूर्वज के निर्मल यश के विरुद्ध प्रत्येक आक्षेप का उत्तर सप्रमाण देने को प्रतिश्रुत हूँ लेकिन यह कार्य मैं विकास दिव्यकीर्ति को तार्किक प्रामाणिक प्रत्याख्यान देकर करूंगा न कि उन्हें गाली या धमकी देकर।
मेरा हिंदुत्व मुझे यही सिखाता है।
मेरे राम ने भी मुझे यही बताया है।

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