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जात्युत्कर्ष_जात्यापकर्ष

देवेन्द्र सिकरवार

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भारत में वर्णान्तरण सदैव होता आया है।
कुशिकवंशी विश्वरथ के ब्राह्मण बनने और उनके वंशज वर्तमान ‘कौशिक’ गोत्री ब्राहणों से लेकर क्षत्रिय नाभाग का वैश्यों में वर्णान्तरण क्रमशः इसके उदाहरण हैं।
लेकिन जन्मनाजातिगत व्यवस्था लागू होने के बाद अधिकांशतः जन्मना कट्टरता के चलते जात्यापकर्ष अधिक हुआ जिसकी नींव अर्बुदाचल के उस महान सम्मेलन में पड़ी, जिसमें तत्कालीन युग में उपस्थित कई गणक्षत्रिय कुलों जैसे मालव, यौधेय, अर्जुनायन, काक, खरपरिक आदि के साथ प्राचीन राजतंत्री क्षत्रियों जैसे रघुवंशी, चंद्रवंशी आदि ने भाग लिया।
जिन गणतंत्री क्षत्रिय कुलों ने अपनी गणपहचान का त्याग कर नए गोत्र, ब्राह्मण सर्वोच्चता, जन्मनाजातिगत व्यवस्था और उज्जैन के रघुवंशी क्षत्रियों का नेतृत्व स्वीकार किया केवल उन्हें ब्राह्मण व्यवस्था में शासन का अधिकार दिया।
इसी कारण क्षत्रियों के दो वर्ग बन गए जिन्हें सुलेमान ने क्रमशः ‘सतकतारिया’ व ‘सबकफूरिया’ कहा।
भारतीय परंपरा में यह आगे चलकर क्रमशः राजपूत क्षत्रिय व अन्य क्षत्रिय कहलाये। कुछ प्राचीन और नवीन शक्तिशाली कुल जैसे गुहिलोत, तोमर, चंदेल आदि भी उसमें आ मिले जिन्होंने ब्राह्मण नेतृत्व वाली जन्मनाजातिगतव्यवस्था को स्वीकार कर लिया और वे भी राजपूत कहलाने लगे।
राजपूतों ने ‘भाई बंदी’ प्रथा, जो भारतीय सामंतवाद का विशिष्ट लक्षण था, के आधार पर जमीन, जागीरें केवल अपने भाइबन्दों तक तक सीमित रखीं जिसके कारण माली, जाट, गुर्जर, अहीर आदि अन्य क्षत्रिय जातियां शासनतंत्र में रखी ही नहीं गईं और उसी अनुपात में उनकी सामाजिक स्थिति भी गिरती गई। यही कारण है कि नेतृत्व वाले लाभार्थी क्षत्रिय भाईबंद ‘राजपुत्र’ कहलाने लगे।
लेकिन इसके बावजूद इन जातियों ने अपनी गणसभा के माध्यम से ही अपने राजनैतिक, सामाजिक व धार्मिक प्रशासन व्यवस्था को चलाया और राजपूत शासक भी लगान के अतिरिक्त अन्य मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते थे। सिंध में दाहिर ने जाटों की इस व्यवस्था में हस्तक्षेप किया जिसके दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम मकरान के जाटों के मुहम्मद बिन कासिम के साथ गठबंधन के रूप में सामने आया।
एक व्यक्ति के तौर पर मेरा मानना है कि जाटों माली आदि की यह गणव्यवस्था अर्थात खांप पद्धति न केवल लोकतांत्रिक थी बल्कि न्यायपूर्ण और मानवीय भी थी लेकिन दुःखद ऐतिहासिक तथ्य यह भी था कि इसने उन्हें ब्राह्मण नेतृत्व वाली राजतंत्री व्यवस्था से बाहर कर दिया। ब्राह्मणों के प्रति इन जातियों के तिरस्कार व चिढ़ के बीज इतिहास में यहां छिपे हैं।
ब्राह्मण- राजपूतों की जन्मनाजातिगत अवधारणा इस हद तक कट्टर थी कि पितृसत्ता होने के बावजूद माता का भी राजपूत होना अनिवार्य कर दिया गया।
गैरराजपूत माता से उत्पन्न संतानों को भी इस घृणित सामंती व्यवस्था में कोई जगह नहीं थी। प्रमाण के तौर पर ग्वालियर के प्रसिद्ध राजा मानसिंह तोमर की विश्वप्रसिद्ध गूजरी रानी मृगनयनी के पुत्र ‘राजे’ और ‘बाले’ के वंशज ‘तोमर’ वंशनाम धारण करने के बाद भी राजपूतों द्वारा वैवाहिक संबंध के लिए स्वीकारे नहीं गए और उनके वंशज आज तोमर गुर्जर हैं।
राजपूत, जाट, गुर्जर, माली, किरार आदि जातियों में राजपूत वंशनामों की उपस्थिति राजपूतों की इसी मूर्खतापूर्ण नीति का परिणाम है और आज भी लागू है।
भरतपुर के वर्तमान युवराज द्वारा दिया गया वक्तव्य इसी परिपेक्ष्य में है जब उनके जादौन या भाटी पूर्वज ने किसी जाट कन्या से विवाह कर तथाकथित राजपूती मर्यादा को भंग किया था जिसके कारण उनका कुल जाटों में आया जिनका जाटों ने उदारतापूर्वक बाहें फैलाकर स्वागत किया। पर दुःखद तथ्य यह भी है कि जाटों में भी राजपूतों-ब्राह्मणों की यह तथाकथित जन्मनाजाति व रक्तशुद्धता की मूर्खतापूर्ण धारणा पैठ बना रही है।
इसके अलावा राजपूत राजाओं व ठिकानेदारों की निकृष्ट वासना का परिणाम बड़ी संख्या में ‘गोला’ व ‘गोलियों’ के रूप में देखने को मिलता है जिसके परिणाम राणा कुंभा व राणा विक्रमादित्य की हत्या के रूप में झेलने पड़े।
इसीलिये मैं इतिहास को भावुकता के स्थान पर वास्तविकता में पढ़ने पर जोर देता हूँ पर अधिकांश भावुक लोग सोचते हैं कि उनके सभी पूर्वज पंक्ति से एकपत्नीव्रतधारी, सच्चरित्र और बड़े मानवतावादी थे जबकि सच ये है कि वे भी आप जैसे ही थे-
आप जितने ही देशभक्त और आप जितने ही जन्मनाजातिगतश्रेष्ठतावादी,
आप जितने ही सच्चरित्र और आप जितने ही रसिया,
आप जितने ही ईमानदार और आप जितने ही बेईमान,
आप जितने ही धार्मिक और आप जितने ही पाखंडी।
इतिहास को इतिहास की तरह पढिये।
इतिहास को दिल से नहीं दिमाग से पढिये।
स्रोत:
1) ‘अनसंग हीरोज: #इंदु_से_सिंधु_तक
2)नवसाहसांक चरित
3)भविष्यपुराण
4)सुलेमान व मसूदी के विवरण
5)भारत में सामंतवाद: रामशरण शर्मा

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