Home विषयलेखक के विचार ओशो कबाड़ी और सुनार हैं ..

ओशो कबाड़ी और सुनार हैं ..

मधुलिका शची

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ओशो ही क्या वो सभी दार्शनिक कबाड़ी और सुनार हैं जो विभिन्न मतों महजबों में घुसकर कबाड़ खोजते हैं और बहुमूल्य बातों को भी खोजकर उसे मिलाकर समाज के लिए आभूषण बनाने का प्रयास करते हैं। इनका अपना कुछ नही होता कचरा भी समालोचना से पनपा होता है और सोना भी….
ओशो विभिन्न धर्मों ,मतों, मजहबों के घर में प्रवेश करते हैं फिर उन धार्मिक मजहबी घरों के रूल बुक , उनकी जीवन शैली, संस्कृति में कचरा खोजते हैं । कचरे को वो किसी कूड़े के ढेर पर भेजने के बजाय उसका मैनुफैक्चरिंग करके, रिसायकल करके उसे समाज को सौंपने का प्रयास करते हैं।
ओशो अपने अनुसार कचरे और बहुमूल्य वस्तुओं को अलग करते हैं ।
हम ओशो को ही सत्य मानकर उनका ही पढ़कर कचरे को कचरा और कुछ वस्तुओं को बहुमूल्य मानकर वर्गीकृत करने का प्रयास करते हैं भले ही ओशो ने खुद को वाणी को अंतिम मानने से रोका हो..
सत्य की खोज कुछ और नहीं है बल्कि यह दृष्टि और दृष्टिकोण की खोज है । बुद्ध कहते हैं “मैंने अपना सत्य पाया ” अर्थात उनकी दृष्टि ने जो देखा परखा जाना वही दृष्टिकोण में परिवर्तित होकर उनका अपना सत्य बन गया। बुद्ध जानते थे यह अंतिम नहीं है इसीलिए उन्होंने कहा “अप्प दीपो भवः” का अनुसरण करो।
हम अतीत से सीख सकते हैं जान सकते हैं कि क्या कुछ जो अतीत में छूट गया है उसे वर्तमान में प्राप्त करें। हम अतीत की कार्बन कॉपी अगर बन गए तो एक विकसित वर्तमान का निर्माण कैसे कर सकते हैं औऱ जब वर्तमान ही समृद्ध नहीं होगा तो समृद्ध भविष्य की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं।
हम सभी कबाड़ी भी हैं और सुनार भी तभी तो हमारे भविष्य स्वप्न सदैव बेहतरी खोजते हैं इसलिए यदि एक कबाड़ी सिर्फ दूसरे कबाड़ी पर ही निर्भर रह जायेगा और वह धर्मों, मतों ,मजहबो के मूल द्वार पर जाकर खोज नहीं करेगा तो वह नवीन क्या पायेगा ..? क्या पता पूर्व के दार्शनिकों ने जो खोजा है , जाना है उनमें से बहुत कुछ अभी छूट गया हो ..?
हंस विवेकशील है क्योंकि वह नीर और क्षीर को अलग करने, पहचानने की क्षमता रखता है पर यह तभी संभव है जब हंस उस मूल पात्र के पास जाए जिसमें नीर क्षीर रखा हुआ है ।
एक पूर्व कबाड़ी और सुनार ने क्या क्या कबाड़ में गिन लिया और क्या क्या कचरे में डाल लिया यदि यह जानना है है तो मूल ग्रंथों , समाज , संस्कृति को स्वयं समझना होगा …अगर एक पुराने कबाड़ी या सुनार पर ही विश्वास करके रुके रह जाएंगे तो आपको उतना ही कचरा और सोना दिखेगा जितना उसने दिखाया है ।
अतीत ही सुंदर है इस आत्महीनता और आत्म मुग्धता दोनों से पीछा छुड़ाकर हमेशा कार्बन कॉपी न तो बनने का प्रयत्न करें और न ही अतीत की कार्बन कॉपी किसी को बताकर उसकी वैचारिक हत्या करें….

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