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मुग़ल काल में मंदिरों की स्थिति

Mann jee

by Mann Jee
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कुछ समय पहले मुग़ल काल में मंदिरों की स्थिति और काफ़ी विवरण यूरोपियन यात्रियों के हवाले से लिखा था। कुछ बाते इन यूरोपियन यात्रियों के रोज़नामचे से ध्यान देने योग्य है।
– इन मंदिरों में एंट्री फ़ीस या शुल्क दे कर एंट्री दी जाती थी। फ़ीस वसूल करने वाले मुग़ल सूबेदार होते थे। मंदिरों में उल्लेखनीय थे जगननाथ जी , केशव देव , काशी विश्वनाथ, अन्नपूर्णा देवी आदि। फ़्रेंच जौहरी टैवरनियर तो बाक़ायदा इन मंदिरों में अंदर तक गया और मुख्य विग्रह, मूर्ति आदि का सजीव विवरण लिख गया। तो यदि एक विधर्मी मंदिर में पैसे दे घुस रहा है तो सोचने योग्य बात है कि जाती के आधार पर मंदिर में प्रवेश पर रोक कैसे लागू किया होगा?
– कुछ मंदिरों को बादशाही जागीर आदि इसी कॉण्टेक्स्ट में प्रदान की जाती रही- मंदिर से वसूली मुख्य वजह थी।
– मंदिर हर बादशाह के दौर में टूटे- लेकिन फिर भी अनेक प्राचीन मंदिर शेष रहे । कारण वही था- वसूली।
– गंगा स्नान पर तक टैक्स था। औरंगज़ेब काल में तो सूर्य ग्रहण तक पर टैक्स देना था पूजा करने के लिये।
– बर्नियर काशी विश्वनाथ से जुड़े गुरुकुल के आचार्यों से धर्म पर वार्तालाप करता है- उल्लेख करता है उनके पास ग्लोब भी है। यदि जाती आदि की कोई लक्ष्मण रेखा होती तो क्या बर्नियर उनके साथ बैठ पाता?
– ये लोग भारत में उस काल में घूम रहे थे- लिख रहे थे भारतीय जनता तीर्थ स्थलों पर अवश्य जाना चाहती है चाहे प्राण क्यों ना गँवाने पड़े- अनेक जगह तीर्थ यात्रियों के ऐसे क़िस्से है। मतलब साफ़ है- तीर्थ यात्रा का उद्देश मनोरंजन क़तई ना था।
– ये लोग मंदिरों के विध्वंस के बारे में भी लिख रहे थे। टैवरनियर और मानुची ने अहमदाबाद के इबादतगाह के बारे में लिखा है कि पहले ये एक विशाल मंदिर था।
– आज भी कई मंदिरों के विग्नशेष और खंडित मूर्तियाँ यही इशारे कर रही है। भला किसी को क्या पड़ी होगी तो समय और ऊर्जा लगा पत्थर के हाथी मूर्ति आदि को भंग करे- उनको बेढब बनाये।
कोढ़ में खाज तब उत्पन्न होता है जब कोई इन लुटेरों को शूरवीर, टैक्टिकल, इमारत बनाने वाला, ड्रेस डिज़ाइनर वाला या फ़ूड क्विज़ीन वाला बतलाता है। बस इसी बात से मेरे कुत्ते फेल हो जाते है!

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