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पारिवारिक अपवाद हर बात के होते हैं

Vivek Glendenning Umrao

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
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पारिवारिक मूल्यों, जीवन मूल्यों व दाम्पत्य-जीवन मूल्यों का दावा करने वाले हमारा भारतीय समाज इन मूल्यों के प्रति सीमा से परे खोखला व ढोंगी है। जो परिवार संयुक्त संपत्ति या संयुक्त व्यापार इत्यादि जैसे स्वार्थ के कारण एकजुट व अंडरस्टैडिंग जैसे होने का ढोंग करते हैं, वे सब भी खोखले व ढोंग की ही श्रेणी के ही हैं।

.अपवाद हर बात के होते हैं, इस बात के भी हैं।

 

एक ही माता-पिता से जने सगे भाई बहन, एक ही दादा दादी या नाना नानी से जने चाचा ताऊ बुआ मौसी मामा व इनसे पैदा हुए बच्चे। इसी श्रंखला को और अधिक बढ़ा भी सकते हैं। यदि ईमानदारी व वास्तविकता के साथ देखा जाए तो ये लोग परिवार का होने के बावजूद, नजदीकी रिश्तेदार होने के बावजूद सामाजिक/पारिवारिक कर्मकांड के कारण कुछ अवसरों पर दिखावा भले ही कर दें, लेकिन अंदर से ईर्ष्या जलन घृणा इत्यादि का ही आंतरिक भाव रखते हैं।
यदि देखा जाए तो अधिकतर मामलों में परिवार के लोगों के बीच की दूरियां एक झटके में खतम हो सकती हैं। लेकिन चूंकि जीवन मूल्यों को वास्तव में ईमानदारी के साथ जीने की भावना व मानसिकता नहीं होती है, इसलिए आजीवन दूरियां और बढ़ती रहतीं हैं, अपनी अगली पीढ़ी को भी यही ऋणात्मकताएं स्थानांतरित की जाती हैं।
जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर, राष्ट्र के नाम पर नफरत करने वाले लोग, ईर्ष्या करने वाले लोग। यदि कभी ईमानदारी से खुद के अंदर झांक कर देखें तो वे बिना अपवाद पाएंगे कि वे खुद अपने ही परिवार, अपने ही रिश्तरेदारों, अपने ही मित्रों, अपने ही समाज के लोगों के प्रति ईर्ष्या व नफरत का भाव रखते हैं। दिखावटी ढोंग चाहे जो करते हों।
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हमारे समाज के अधिकतर लोग आजीवन ईर्ष्या व नफरत के भाव को ही सर्वोपरि रखते हुए जीते हैं, इसी भाव को जान-अनजाने अपनी अगली पीढ़ियों में आगे बढ़ाते हैं। जिसकी जितनी कुव्वत है, वह उस स्तर की ईर्ष्या व नफरत को जीता है। कोई परिवार के अंदर, कोई रिश्तेदारों के अंदर, कोई मित्रों के अंदर, कोई समाज के अंदर, कोई दूसरी जाति से, कोई दूसरे धर्म से, कोई दूसरे देश से। ईर्ष्या व नफरत मूल तत्व है हमारे समाज के जीवन का। आजीवन अपनी जीवन ऊर्जा का बहुत ही बड़ा हिस्सा इसी में खर्च करते हैं, कभी एक क्षण के लिए भी गंभीरता से यह नहीं सोचते हैं कि जीवनी-ऊर्जा के इस निवेश के बदले में मिलता क्या है, सिवाय अपने मन के भीतर की क्षणिक फर्जी-खुशी, फर्जी-तसल्ली इत्यादि के।
दरअसल हमारे समाज में अधिकतर लोग वह जीवन जीते ही नहीं हैं जो वे जीना चाहते रहे होंगे। शैशवावस्था से ही बच्चों को उनकी स्वतंत्र दृष्टि विकसित करने के लिए अवसर उपलब्ध कराने की बजाय। माता पिता व परिवार अपनी कुंठाओं के आधार पर बच्चों के पैदा होते ही उनको ट्रेन करना शुरू कर देते हैं। बच्चे कभी समझ ही नहीं पाते कि वे वास्तव में करना क्या चाहते हैं, जीना कैसे चाहते हैं। ऊपर से भले ही सबकुछ सामान्य व अच्छा दिखता हो, लेकिन अंदर से वे अपने अंदर कहीं न कहीं खालीपन पाते हैं। इसलिए उनके अंदर दूसरों के प्रति ईर्ष्या व नफरत लगातार बढ़ते हुए क्रम में विकसित होती रहती है। दूसरों की भोंडी नकल उतारते हैं।
बहुत लोगों में तो ईर्ष्या व नफरत का स्तर इस कदर हो जाता है कि दूसरों के अच्छे कामों को, दूसरों की अच्छाई तक से भी ईर्ष्या व नफरत करते हैं। उपहास उड़ाते हैं, अपने ही जैसों की टोली बनाकर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष हमला करते हैं, नीचा दिखा पाने की जद्दोजहद में जुटे रहते हैं।
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फिर अपने जैसों के ही बीच एक दूसरे का महिमामंडन करते हुए, क्षणिक फर्जी-खुशी में होने के ढोंग को जी लेते हैं, जबकि इस क्षण भी अंदर से ईर्ष्या व नफरत की कुंठा को ही जी रहे होते हैं, अंदर से टीस ही रहे होते हैं।
यही लोग जब आगे चलकर माता पिता बनते हैं तो अपने बच्चों को यही देते हैं। क्योंकि इन लोगों की जीवन के प्रति कोई समझ ही नहीं होती है। वाहवाही लूटने के लिए जीवन मूल्यों की खोखली बातें तो बढ़चढ़ कर करते हैं, लेकिन वास्तव में जीवन मूल्यों से दूर-दूर तक नाता नहीं होता है। बच्चे अपने माता पिता, परिवार, रिश्तेदारों, समाज, घर, बाहर जब यही सब देखते सुनते हैं तो उनको लगता है कि यही जीवन जीने का तरीका है, जीवन ऐसे ही जिया जाता है।
सबसे बड़ी खामी यह फर्जी कथा-कहानियों द्वारा माता-पिता व गुरु को ईश्वर की तरह प्रायोजित कर रखा गया है, पवित्र व शुद्ध-बुद्ध माना जाता है। यह सब इतनी भयंकर तरीके से किया जाता है कि आदमी के पास यह बेसिक सोच भी नहीं रह पाती कि वह यह सोच सके कि कैसे कोई व्यक्ति जो बेईमान है धूर्त है झूठा है फरेबी है ईर्ष्यालु है नफरती है, चरित्रहीन है, भ्रष्टाचारी है, हिंसक है, असंवेदनशील है, वह ईश्वर कैसे हो सकता है, शुद्ध बुद्ध कैसे हो सकता है। स्वार्थ व भोग के कारण माता पिता को ईश्वर मानना बहुत ही बड़ी व मूलभूत खामी है।
हमारा समाज, हमारा परिवार, हमारे माता पिता, हमारे गुरुजन हमें यह नहीं सिखाते कि छोटी-छोटी बातों के लिए भी दूसरों की सराहना कैसे करनी है वह भी ईमानदारी के साथ अंदर से भावना रखते हुए, यदि कोई हमारे लिए कुछ करता है तो उसके प्रति अंदर से ईमानदार भावना रखते हुए धन्यवाद ज्ञापन कैसे करना है। कैसे किसी की क्षमता को योग्यता को परिश्रम इत्यादि की सराहना करनी है। न तो हमें यह सिखाया जाता है, न ही हम अपने बच्चों को यह सिखा पाने की क्षमता, परिपक्वता व भावना ही रखते हैं। हम इसका उल्टा सिखाते हैं, और ऐसी सिखावट को हमने अपने समाज में प्रतिष्ठित कर रखा है।
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हमारा समाज, हमारा परिवार, हमारे माता पिता, हमारे गुरुजन हमें यह नहीं सिखाते कि यदि हमसे कोई गलती हुई हो जिसके कारण दूसरे को कष्ट हुआ है तो उसके लिए ईमानदारी से भाव रखते हुए क्षमा कैसे मांगते हैं, दिखावटी क्षमा जैसा ढोंग नहीं, अंदर से महसूस करते हुए यह भाव रखते हुए कि ऐसा किसी के साथ दुबारा नहीं करेंगे। उल्टे यह सिखाया जाता है कि कैसे झूठ बोलकर, फरेब गढ़कर, प्रपंच रचकर यह साबित किया जाए कि ऐसा किया ही नहीं गया है। झूठ, फरेब व प्रपंच इत्यादि में ही बहुत सारी जीवनी ऊर्जा खर्च की जाती रहती है। रातदिन इन्हीं दांवपेचों की जालसाजी में ही मस्तिष्क व मन को व्यस्त रखा जाता है, मानसिकता ही ऐसी बन जाती है। यही हम अपने बच्चों में भी आगे बढ़ाते रहते हैं। हम इसी को स्मार्ट होना, चतुर होना कहते हैं, महिमामंडित करते हैं, हमें लगता है कि दुनिया का हर समाज ऐसा ही है, इसलिए हम सभी समाजों का सभी लोगों का विश्लेषण भी इसी आधार पर ही करते हैं। हमें सड़ियल पानी वाला अपना कुआं सर्वश्रेष्ठ लगता है।
हमारा समाज इन सब फूहड़ताओं व ऋणात्मकताओं में इस कदर लिप्त रहता है, लिप्त रहते हुए इस कदर कुंठित हो चुका है कि हमने भ्रष्टाचार, बेईमानी, धूर्तता, नफरत, ईर्ष्या इत्यादि को महिमामंडित कर रखा है, प्रतिष्ठित कर रखा है। हमें लगता है कि यही जीवन के रास्ते हैं। हम अपने जीवन व अपने बच्चों की प्राथमिकताएं इत्यादि भी इन्हीं आधारों पर तय करते हैं। इसे ही शिक्षा, सामाजिकता, संस्कार, व पैरेंटिंग मान रखा गया है।
ध्यान से देखा जाए तो माता पिता द्वारा किए गए नीचताओं, क्रूरताओं, बर्बरताओं, फरेबों, अत्याचारों, धूर्तताओं इत्यादि को छोड़कर परिवार के बीच में ऐसा कुछ भी नहीं जिसे ईमानदार भाव से क्षमा मांगने व क्षमा करने से हल नहीं किया जा सकता हो। शर्त केवल यह कि ईर्ष्या जलन इत्यादि का भाव नहीं हो, मन में ईमानदारी हो और यह इच्छाशक्ति कि दुबारा जानबूझकर नहीं किया जाएगा। मित्रों के साथ भी यही बात लागू होती है।
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माता पिता को इसलिए अलग रख रहा हूं क्योंकि माता पिता को किसी भी स्थिति परिस्थिति में भले ही आसमान ही क्यों न टूटकर सिर पर गिर जाए, अपने बच्चों के साथ नीचता, क्रूरता, बर्बरता, फरेब, अत्याचार, धूर्तता इत्यादि करने का कतई कोई भी अधिकार नहीं होता। उनके द्वारा ऐसा एक बार भी किया जाना अक्षम्य है, जबकि कई माता पिता ऐसा साल दर साल बेशर्मी व धूर्तता के साथ करते रहते हैं। दुनिया के कई देशों के समाज तो इतने परिपक्व हैं कि ऐसे माता पिता लोगों से माता पिता होने का अधिकार ही छीन लिया जाता है, उन पर हत्या बलात्कार जैसे अति-गंभीर मामलों जैसे अपराधों की सजा मिलती है। जबकि हमारे समाज में हमने उनके कार्य व्यवहार का मूल्यांकन किए बिना ही उन्हें ईश्वर का दर्जा दे रखा है, उनकी नीचता में भी उनकी महानता व छुपा हुआ महान भाव देखते हैं।
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माता पिता द्वारा क्षमा मांगने से अधिक अपने अंदर खुद के प्रति लज्जा व खुद को क्षमा न करने का ईमानदार भाव अधिक होना चाहिए। कई माता पिता अपने द्वारा की गई नीचताओं के लिए बिना कहे अपनी ओर से पूरी शिद्दत के साथ अपने भाव कर्म व्यवहार से क्षमा मांगने का अनवरत प्रयास करते रहते हैं, भले ही उनको अपने बच्चों की प्रतिक्रियाएं लगातार झेलते रहना पड़े।
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वहीं कुछ माता पिता ऐसे होते हैं कि आजीवन बेशर्म ही बने रहते हैं, अपनी नीचताओं को महसूस करने की बजाय, और अधिक नीचताएं करते रहते हैं। इनको इससे मतलब नहीं होता कि ये वास्तव में कैसे हैं, या इन्होंने अपने बच्चों के साथ क्या किया है, इनको इससे मतलब होता है कि दूसरों के सामने महान व अच्छे माता पिता होने का ढोंग कितना कर लेते हैं। क्रूरता, बर्बरता, नीचता, फरेब, झूठ, धूर्तता, ढोंग इत्यादि की कोई भी सीमा नहीं होती इन जैसे माता पिता लोगों के लिए।
मेरा अपना मानना है कि परिवार के बीच, बचपन के मित्रों के बीच कैसे भी मामले हों (बचपन के मित्र इसलिए क्योंकि उस समय की गई मित्रता में भावों की शुद्धता होती है, स्वार्थ नहीं होता प्रपंच नहीं होता), यदि मन में ईमानदार भाव हैं, यदि वास्तव में मन के अंदर प्रेमभाव है। ईर्ष्या नहीं हैं, सराहना का भाव है, धन्यवाद का भाव है, क्षमा मांगने व क्षमा करने का भाव है, तो कितनी भी दूरी बन गई हो, कितने भी वर्षों से संवाद नहीं हुआ हो, ईमानदार पहल से रिश्तों को पुनर्जीवित किया जा सकता है। जीवन एक बार आता है, ईमानदार पहल की भी जानी चाहिए, रिश्तों को पुनर्जीवित किया भी जाना चाहिए। कम से कम, मेरी विचारधारा तो यही है।
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यदि आपसे अपने परिवार में कभी भी कोई गंभीर कांड हुआ है या आपने धूर्तता की है तो आप अपने अंदर साहस लाइए, ईमानदारी लाइए और यह मानते हुए कि सामने से प्रतिक्रिया ही आएगी, अपने कांडों के लिए क्षमा मांगिए और रिश्तों को जोड़ने के प्रयास में लग जाइए और परिपक्वता व ईमानदारी के साथ रिश्तों को जीने का संकल्प लीजिए।
यदि आपके साथ कांड किया गया है या आपके साथ धूर्तता की गई है तो यदि कांड करने वाला धूर्तता करने वाला आपसे ईमानदार भाव से क्षमा मांगकर रिश्तों को पुनर्जीवित करना चाहता है, परिपक्व रिश्तों को जीना चाहता है, ऐसा करने के लिए संकल्पित है, तो उसको जरूर अवसर दीजिए।

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