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कहा से शुरू करू गोरखपुर को

Prafulla Kumar Tripathi

by Sharad Kumar
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उस बिन्दु से जहां से गोरखपुर के उन हीरा कणों को विस्मृत कर दिया गया जो नींव के पत्थर थे | या, वहां से जहां जबरन कहानीकार बना दिया गये उन लोगों से जिनका गोरखपुर से दूर – दूर का सम्बन्ध नहीं है ! या, वहां से जहां अकादमी के अध्यक्ष रह चुके और हाल ही में पद्मश्री से सुशोभित 83 वर्षीय आलोचक/कवि प्रोफेसर तिवारी से जिन्होंने अब तक सिर्फ़ एक ही कहानी लिखी है( और मजे की बात यह कि उन्होंने इसे स्वीकार भी किया है) और उनकी गणना गोरखपुर के कहानीकारों में कर दी गई है!
एक बात मैं साफ़ कर दूं कि मैं प्रोफेसर तिवारी की योग्यता और व्यक्तित्व का आप सभी की तरह ही प्रशंसक हूं और दयानन्द पांडेय तो मेरे मित्र ही हैं लेकिन यह प्रशंसा अथवा यह मित्रता मैं अपने साहित्यिक व्यक्तित्व की बलि देकर नहीं जारी रख सकता हूं |मै भी अपनी उम्र के 69 वें पायदान पर हूं | गोरखपुर मेरी जन्म और कर्मभूमि रही है| 16 वर्ष की उम्र से मैनें बाल रचनाओं को लिखना शुरु कर दिया था |20वर्ष से उन दिनों की पत्र पत्रिकाओं में मेरी, कविता, कहानी, लेख, परिचर्चा छपने लगे थे |दयानन्द ने जब गोरखपुर में पत्रकारिता और लेखन का ककहरा सीखना शुरु किया था, मैं आकाशवाणी में कार्यक्रम प्रस्तुति से जुड़ चुका था | प्रोफेसर तिवारी पद्य और आलोचना के शिखर पुरुष हैं, कोई संदेह नहीं |
‘अपने-अपने अजनबी’ कविता में प्रोफेसर तिवारी लिखते हैं – ‘मैं अपनी इच्छाएँ कागज पर छींटता हूँ, मेरी पत्नी अपनी हँसी दीवारों पर चिपकाती है और मेरा बच्चा कभी कागजों को नोचता है, कभी दीवारों पर थूकता है।’ { हालांकि जो बच्चा कागज़ों को नोचता और दीवारों पर थूकता था वह पहले अपनी पी.एच. डी. को लेकर विवादों में रहा और अब एक डिग्री कालेज में युवाओं को ज्ञान बांट रहा है |}
इस स्पष्टीकरण के बाद आइये उत्तर कथा – गोरखपुर की इस कड़ी में पहले गोरखपुर के 84 वर्षीय वरिष्ठतम कवि श्री आर. डी.एन. श्रीवास्तव की एक रोचक फेसबुक पोस्ट से करते हैं आज की शुरुआत , जिसमें उन्होंने बाक़ायदा नाम लेकर अकादमी के पूर्व अध्यक्ष और अब पद्मश्री सुशोभित कर रहे उन महान “कहानीकार” का जिक्र किया है जो अपने अहंकार के कारण किसी कवि के गीत को कमतर करके आंकते हैं…
श्री आर. डी.एन. श्रीवास्तव लिखते हैं-
“प्रोफेसर तिवारी को इस उपलब्धि की कोटि-कोटि बधाई ! मैं और तिवारीजी डी .ए .वी .नारंग इंटर कॉलेज घुघली, महराजगंज के छात्र थे। मैं उनसे दो साल आगे था। फिर भी उन से नज़दीकी नहीं बना पाया।
मैं उन दिनों तमकुही रोड के इंटर कॉलेज में सेवारत था।निकट ही भोजपुरी के महाकवि पं धरीक्षण मिश्र का गांव बरियारपुर स्थित है। वर्ष 1993 से प्रति वर्ष कवि जी के जन्मदिवस,चैत रामनवमी,पर उस गांव में दिन भर का साहित्यिक आयोजन होता है।कवि गोष्ठी भी होती है जिसका संचालन मेरे ही जिम्मे रहता रहा है।
इस आयोजन में एक बार प्रोफेसर तिवारी जी मुख्य अतिथि थे।उस गोष्ठी में मैंने भी अपनी एक ग़ज़ल का सस्वर पाठ किया था जिसे काफी सराहना भी मिली। कार्यक्रम के समापन के बाद मैं भी प्रो.तिवारी को छोड़ने उनके साथ उनकी कार तक गया।
मेरी ओर मुखातिब हो कर तिवारी जी बोले,”श्रीवास्तव जी, आप ने जो गाना गाया वह अच्छा था”।
बड़ी ख़ूबसूरती से उन्होंने एक कवि/शायर को गवैया घोषित कर दिया। अपमान का घूंट पीने के लिए ही होता है सो मैंने भी चुप चाप पी लिया।
आज कल मैनिपुलेशन का ज़माना है ।
हो सकता है कल उनको भारत रत्न भी मिल जाए। मुझे तो ख़ुशी ही होगी क्योंकि हम दोनों एक ही विद्यालय के छात्र रहे हैं।”

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