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शिव हमेशा ही आकर्षित करते रहे

by Swami Vyalok
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शिव हमेशा ही आकर्षित करते रहे हैं, इसलिए कि सॉफिस्टिकेटेड नहीं, एलीट नहीं। वंचितों के नाथ हैं, असहायों के सहाय हैं, खलनायकों को भी आशीष दे डालते हैं तो प्रवंचक भी उनकी पूजा कर सकते हैं। भूत, प्रेत, चर, अचर, जग, क्षर, अक्षर, नाशी, अविनाशी, बैताल, चुड़ैल कोई भी उनको पूज सकता है, मान सकता है, कोई बंदिश नहीं, कोई रोक नहीं।
बाधा नहीं है शिव के पास। कर्मकांड नहीं है। विधियां नहीं हैं, विधान नहीं है। जिसको जैसा भाए, वह वैसा शिव पा सकता है। शिव इसीलिए सुंदर भी हैं, सत्य भी। वाममार्गी भी शिव के, कट्टर रामनामी भी उनके। भेद नहीं है शिव के पास, अभेद हैं वह। दारोगाजी भी नहीं हैं, देवताओं के। मन है तो आक-धतूर चढ़ा दो, न मन है तो पानी ही सही। वैसे, चढ़ाने पर आओ तो रुद्राभिषेक में बाबा क्या नहीं चढ़वा लेते हैं।
शिव वर्जनाओं में हैं, वर्जनाओं के परे हैं, नियमों का अतिक्रमण हैं, वह आपके मुताबिक ढलते हैं, आपको ढालते नहीं।
अवस्था बढ़ने के साथ-साथ शिव के प्रति अनुराग बढ़ता जा रहा है, हालांकि बचपन से रहा मैं शक्ति का उपासक हूं। वैसे, माइ-बाबू ही हैं दोनों। कुछ साल पहले शिव पर जो लिखा था, आज फिर से साझा कर रहा हूं….
शिव..शिव..शिव!!! क्या लिखूं, क्या कहूं तुम्हें!
मेरे प्रियतम, मेरे आराध्य, मेरे मित्र, सखा, गुरु और आदर्श।
भारतीय चिंतन, दर्शन और मनीषा ने मनुष्यता का जो चरम खींचा है, वह है शिव। आस्तिकता का चरम है शिव।
शिव प्रेमी हो, तो प्रेमिका के शव को लेकर उन्मत्त की भांति नाचे, विश्व मात्र के प्राणों पर ला दे, और वीतराग हो तो श्मशान भूमि की राख लपेटे।
शिव आसक्त हो तो स्तनयुगलों पर चित्रकारी करने वाला अप्रतिम चित्रकार हो, निरासक्त हो तो मृगछाल डालकर घूमता रहे।
शिव कल्याणकारी हो तो विश्व भर का विष पी ले, क्रोधांध हो तो तीसरी आंख खोल विश्व को भस्मीभूत कर दे।
वह नाचे तो मदहोश होकर, नटराज बन जाए, वह समाधि ले तो पत्थर हो जाए। वह है शिव।
वह वीर हो तो रुद्र जैसा, योद्धा हो तो महादेव जैसा, दानी हो तो आशुतोष जैसा, योगी हो तो महेश की तरह, सुंदर हो तो शिव की तरह। यह है शिव, यह है शिव, यही है शिव।
सागर की उत्ताल तरंगो सा विस्तृत जिसका हृदय हो, सृजन और प्रलय जिसकी दो आंखों में झूलता हो, अमरत्व और विनाश जिसकी दो बांहे हों, वही हैं शिव, वही है शिव, वही है शिव।
बनो तो शिव, जिसके बिना शक्ति भी शव है…
चाहो तो शिव, जो अमर्त्य है, अजर है, असंभव है, अद्वितीय है….
और, रहो तो शिव, जो अविनाशी है, अक्षर है, चरमोत्कर्ष का उत्कर्ष है……
हर-हर-महादेव!!!
ये जैसे महादेव ने खुद हाथ पकड़कर लिखवाया था। इससे बढ़िया मैं कभी कुछ लिख नहीं सका, शिव के लिए।

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