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हिंदुत्व_की_एकात्मता

देवेन्द्र सिकरवार

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13वीं शताब्दी ई.
महाराष्ट्र का पंढरपुर!
“अरे भैया, बड़े भाग्य से ऐसा सुअवसर मिलता है। बिठोबा की सेवा का। बिठोबा की स्वर्ण करधनी के निर्माण का सौभाग्य तुम्हें मिला है।”
“ये सुअवसर अपने पास रखो। महादेव के अतिरिक्त अन्य किसी का नाम सुनना भी पाप है।” सुनार क्रुद्ध हो उठा और उसने महादेव के स्थान पर ‘बिठोबा’ का नाम कानों में जाने के प्रायश्चित्त के रूप में आचमन किया।
“सुनो तो, भगवान बि…..”
“सावधान! जो अबकी महादेव के स्थान पर अन्य किसी को भगवान कहा तो।” सुनार की आँखें लाल हो उठीं और ग्राहक सहम गया।
“पर, मूलतः वे सब एक ही तो हैं।” ग्राहक ने मिमियाकर अपना आखिरी प्रयत्न किया।
“तुम एसे नहीं मानोगे।” सुनार ने हिंस्र स्वर में कहा और लाठी की ओर हाथ बढ़ाया।
ग्राहक जो मंदिर प्रबंधन समिति के सदस्य थे, सिर पर पैर रखकर भाग लिए।
एक के बाद एक नगर के प्रभावशाली सदस्य अनुरोध लेकर गए लेकिन प्रत्येक की परिणिति वही रही।
मुख्य पुजारी भी इस सुनार से ही करधनी बनवाने पर अड़े थे।
केवल इसलिये नहीं कि वह पंढरपुर के श्रेष्ठतम स्वर्ण कलाकार थे बल्कि इसलिए कि उनके अवचेतन में बिठोबा ने ही उनसे यह मांग की थी कि उन्हें इसी सुनार के हाथ की करधनी पहननी है।
अंततः स्वयं पुजारी जी इस अनुरोध के साथ सुनार के पास आये।
सुनार पुजारी का बहुत सम्मान करता था अतः वह उनका अनुरोध न ठुकरा सका लेकिन बिठोबा की कमर का नाप लेने के लिए शर्त रखी कि वह आँखों पर पट्टी बांधकर रखेगा और निरंतर शिव पंचाक्षरी का जाप करेगा।
शर्त मान ली गई।
अगले दिन स्नानादि से पवित्र होकर सुनार बिठोबा की मूर्ति का नाप लेने पहुँच गया, और हां, आँखों पर पट्टी बांधकर।
सुनार के होंठों से निकलते शिव पंचाक्षरी के शब्द पहली बार बिठोबा के मंदिर में गूंज रहे थे।
नाप लेने की प्रक्रिया शुरू हुई और सुनार ने बिठोबा की मूर्ति को टटोलना शुरू किया।
लेकिन यह क्या????
सिर पर किरीट के स्थानपर जटाजूट,
जटाजूट पर अर्धचंद्र व गंगा की शीतल धारा,
माथे पर तीसरा नेत्र…”
“मेरे भोलेनाथ”, सुनार ने पट्टी नोंचकर फैंक दी।
लेकिन यह क्या?
भोले बाबा के स्थान पर बिठोबा श्रीविग्रह रूप में मुस्कुरा रहे थे।
“हे शिव….हे शिव…यह क्या हुआ?” लज्जित होकर सुनार ने फिर पट्टी चढ़ा ली।
उसने फिर नाप लेना शुरू किया।
“बांहों पर रुद्राक्ष के बाजूबंद, गले में नागराज वासुकि का भयावह स्पर्श और भमाभिभूत देह….”
“मेरे महादेव, यह तो तुम ही हो।”
पट्टी फिर उतार दी गई लेकिन सामने फिर वही बिठोबा का श्रीविग्रह…..
लज्जित भक्त ने फिर पट्टी चढ़ा ली।
फिर टटोलना शुरू हुआ।
“मुण्डमाल की खोपड़ियाँ, कटि में बाघम्बर, कमर में बंधी मूँजमेखला….”
“महादेव, भोले बाबा…”
पट्टी फिर उतारकर फैंक दी गई।
सामने इस बार वस्तुतः भोलेनाथ ही थे।
हाथ जुड़ गए, नेत्रों से आंसुओं की धारा बहने लगी….लेकिन यह क्या?
महादेव का श्रीविग्रह अपना रूप बदलने लगा।
–जटाएं रत्नजटित स्वर्णमुकुट में बदलने लगीं,
-तीसरे नेत्र व त्रिपुंड के स्थान पर वैष्णव तिलक,
-गले में नाग के स्थान पर झिलमिलाता स्वर्णहार,
-बाघम्बर के स्थान पर पीतांबर
केवल रत्नजटित करधनी के स्थान पर बस मुंज मेखला थी।
सारा रहस्य सुनार के सामने था।
भक्ति का अहं विगलित हो गया।
एकात्मता का रहस्य स्पष्ट हो गया।
उसने जान लिया कि उसके और प्रभु के बीच उसका अहंकार ही बाधा थी। सन्कीर्णता की गली से उसे उबारने के लिए ही यह लीला रची गई।
अब उसके लिए महादेव व बिठोबा में कोई अंतर न रहा।
एक कट्टर परंतु संकीर्ण पांथिक सुनार, महान #संत_नरहरि_सोनार के रूप में अमर हो गया।

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