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मुस्लिम कौम का मुद्दा नहीं है अतीक अहमद की हत्या

फ़ैयाज़ अहमद फ़ैज़ी

by Faiyaz Ahmad
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एक तथाकथित सेकुलर लिबरल बड़ी महिला पत्रकार ने तो अतीक की जाति तक ढूंढ निकाली और प्रधानमंत्री की पसमांदा नीति पर ही सवाल उठाते हुए विवेचना प्रस्तुत कर दी कि एक ओर प्रधानमंत्री पसमांदा को जोड़ने की बात कर रहे हैं और दूसरी ओर पसमांदा की हत्या हो रही है।
ये वही लोग हैं जो मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय के सवाल पर आंखें चुराते हुए मुस्लिम समाज के जातिगत विभेद को नकारते रहे हैं। आज वही लोग अतीक की जाति बताकर मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। एक और तथाकथित बड़े राष्ट्रवादी सैयद यूट्यूबर जो अतीक की जाति बता यह मिथ्या नैरेटिव गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं कि सभी माफिया पसमांदा ही होते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि माफिया बनने के लिए मजबूत राजनैतिक और अफसरशाही बैकग्राउंड वाला हनक और दबंगई चाहिए जो शासक वर्गीय अशराफ वर्ग को ही प्राप्त रहा है। इसलिए अधिकतर मुस्लिम समाज से आने वाले माफिया अशराफ वर्ग से ही रहे हैं। अतीक जैसे लोग अपवाद हो सकते हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि इन दोनों अशराफ बुद्धिजीवियों का उद्देश्य भाजपा और पसमांदा के बीच पनप रहे नए रिश्ते में दरार डाल भाजपा और पसमांदा दोनों को कमज़ोर करने का प्रयास है।

यह भी एक तथ्य है कि अशराफ ने ऐसा नैरेटिव बनाया है कि मुस्लिम समाज, इतिहास के क्रूर बादशाहों और आज के गुंडे बदमाश माफिया को ही अपना हीरो (नायक) मानता रहा है। यूं तो मुस्लिम समाज में समाज सुधारक पैदा नहीं होते हैं और अगर कोई इक्का दुक्का हुआ भी तो उसे विलेन (खलनायक) मानता रहा है।

पसमांदा आंदोलन का इस प्रकरण में यह स्पष्ट मानना है कि यह पूरी तरह कानून व्यवस्था और लोकतांत्रिक राजनीति के सुधार से जुड़ा मुद्दा है और इसे किसी भी स्थिति में मुस्लिम सांप्रदायिकता का मुद्दा नहीं बनने देना चाहिए।
अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की हत्या का मामला एक वर्ग द्वारा ऐसे प्रस्तुत किया जा रहा है मानों मुस्लिम कौम का लीडर मार दिया गया है। वह भी पुलिस की सुरक्षा में। रमजान के महीने में भी मस्जिद की मिंबरों से ऐसे खुतबे सुनाई दिये जो सुनाई नहीं दिये जाने चाहिए थे। अतीक अहदम को कौम का लीडर, दीन का रखवाला बनाकर प्रस्तुत किया गया। स्वाभाविक है मुसलमानों में जो अशराफिया तबका है वह समाज का सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ना जानता है। इसलिए अपराध जगत से जुड़े अतीक और उसके भाई को कुछ लोगों द्वारा शहीद तक घोषित कर दिया गया, मानों वह इस्लाम के लिए लड़ते हुए मारा गया है।
अशराफिया तबके द्वारा तैयार किये गये इस माहौल में देश के कथित सेकुलर और लिबरल लोग भी ताल से ताल मिलाते नजर आये। क्या सेक्युलर लिबरल और क्या मजहबी मौलाना, सब एक सुर में अतीक को कौम का रहनुमा, मुसलमानों का मसीहा, सरकार के अत्याचार से पीड़ित साबित करने में लग गए। एक तथाकथित सेकुलर लिबरल बड़ी महिला पत्रकार ने तो अतीक की जाति तक ढूंढ निकाली और प्रधानमंत्री की पसमांदा नीति पर ही सवाल उठाते हुए विवेचना प्रस्तुत कर दी कि एक ओर प्रधानमंत्री पसमांदा को जोड़ने की बात कर रहे हैं और दूसरी ओर पसमांदा की हत्या हो रही है। ये वही लोग हैं जो मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय के सवाल पर आंखें चुराते हुए मुस्लिम समाज के जातिगत विभेद को नकारते रहे हैं।
आज वही लोग अतीक की जाति बताकर मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। एक और तथाकथित बड़े राष्ट्रवादी सैयद यूट्यूबर जो अतीक की जाति बता यह मिथ्या नैरेटिव गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं कि सभी माफिया पसमांदा ही होते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि माफिया बनने के लिए मजबूत राजनैतिक और अफसरशाही बैकग्राउंड वाला हनक और दबंगई चाहिए जो शासक वर्गीय अशराफ वर्ग को ही प्राप्त रहा है। इसलिए अधिकतर मुस्लिम समाज से आने वाले माफिया अशराफ वर्ग से ही रहे हैं। अतीक जैसे लोग अपवाद हो सकते हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि इन दोनों अशराफ बुद्धिजीवियों का उद्देश्य भाजपा और पसमांदा के बीच पनप रहे नए रिश्ते में दरार डाल भाजपा और पसमांदा दोनों को कमज़ोर करने का प्रयास है। बहुजन आंदोलन के प्रिय एक मौलाना जो दिन रात हिन्दू समाज में सामाजिक न्याय के लिए चिंतित रहते हैं, उन्होंने एक सामूहिक दुआ में अतीक-अशरफ के लिए इस अंदाज में दुआ की जैसे कोई अल्लाह का वली गुजर गया हो या कोई मर्दे मुजाहिद उम्मत (मुसलमानो) के लिए जेहाद करते हुए मारा गया हो। सार्वजनिक रूप से अल्लाह का आव्हान कर रहें है कि वो इसका बदला ले। दुआ के शब्दों को देखिए…. “इनकी शहादत को आला मकाम आता फरमा….अल्लाह इंतकाम (बदला) लीजिए…..उम्मत को गलबा (विजय) आता फरमा…. इस तरह की दुआ ने मुस्लिम समाज में साम्प्रदायिकता को तेजी से बढ़ाने में जबरदस्त योगदान दिया जिसके नतीजे में देश में कई जगह रमजान के अलविदा जुमा के बाद अतीक-अशरफ के समर्थन में नारेबाजी की खबरें भी सुनने में आई। यह स्पष्ट है कि मुस्लिम साम्प्रदायिकता का उभार होने से सीधा सीधा लाभ शासक वर्गीय अशराफ वर्ग को होता है
और सीधा सीधा नुकसान देशज पसमांदा समाज को होता है इसलिए अशराफ वर्ग मुस्लिम साम्प्रदायिकता भड़काने का कोई भी अवसर हाथ से जाने नहीं देता ये। वंदे मातरम तक में हिन्दू मुसलमान ढूंढ लेते हैं, जबकि पसमांदा कार्यकर्ता मुस्लिम लीग से लेकर अब तक मुस्लिम सांप्रदायिकता के धुर विरोधी रहें हैं। यह भी एक तथ्य है कि अशराफ ने ऐसा नैरेटिव बनाया है कि मुस्लिम समाज, इतिहास के क्रूर बादशाहों और आज के गुंडे बदमाश माफिया को ही अपना हीरो (नायक) मानता रहा है। यूं तो मुस्लिम समाज में समाज सुधारक पैदा नहीं होते हैं और अगर कोई इक्का दुक्का हुआ भी तो उसे विलेन (खलनायक) मानता रहा है। इस नैरेटिव का लाभ अशराफ वर्ग हमेशा अपने हित में करता रहा है। अतीक प्रकरण में नए नए सांप्रदायिक हुए हिन्दू समाज के कुछ लोगो ने भी आग में घी डालने का काम किया और पुलिस अभिरक्षा में हुए इस अपराधिक कृत्य को रावण और कंस के वध की तरह बता सोशल मीडिया पर उत्सव का माहौल बनाने का प्रयास किया। जिसकी प्रतिक्रिया में मुस्लिम समाज में पहले से भड़की साम्प्रदायिकता की आग की लपटें और तेज़ी से उठने लगी।

जबकि अतीक प्रकरण को सामान्य कानून व्यवस्था के लिहाज से ही देखना चाहिए। इस पर कानूनी रूप से जो सवाल उठाये जा सकते हैं वो उठाये जा रहे हैं। स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न्यायिक जांच बिठा दी है जो अपनी जांच कर रही है। लेकिन जो सवाल मुस्लिम समाज के सामने है वह यह कि क्या वह अपराधीकरण को अपनी मुख्यधारा मानकर चलेगा? क्या अतीक अहमद जैसे माफिया और अपराध जगत से जुड़े लोग ही उसके कौमी लीडर होंगे? अतीक अहमद वैसे ही अपराध और राजनीति का एक मिला जुला उदाहरण था जैसे दूसरे कई और माफिया यूपी बिहार में पाये जाते रहे हैं। हिन्दी बेल्ट विशेष रूप से बिहार और उत्तर प्रदेश में 70 के दशक से ही सरकारी ठेकों को हासिल करने और उससे अत्यधिक लाभ कमाने के लिए असर रसूखदार एवं दबंग लोग छोटे छोटे गैंग बनाकर सरकारी ठेकों को हासिल करने में एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने लगे। फिर शुरू हुआ वर्चस्व स्थापित करने के लिए एक दूसरे गैंग के लोगों की हत्याओं का न थमने वाला सिलसिला। इन अपराधिक कार्यों में ये लोग बहुत सेकुलर रुख अपनाया करते थे। स्वयं की गैंग के विरोधी को बिना धर्म जाति का भेदभाव किए ठिकाने लगा देते थे।

याद करिए मुन्ना बजरंगी को। वह किस धर्म का था और किसके लिए काम करता था? अगर वह धर्म जाति देखता तो मुख्तार अंसारी के इशारे पर कृष्णानंद राय की हत्या करता? स्वाभाविक है माफियाओं की दुनिया में उनके अपने उसूल होते हैं। जो उनके साथ है वह उनका अपना भाई है, जो विरोधी है माफिया उसके लिए कसाई है। अगर धर्म का इतना ही रोल होता तो अतीक चांद बाबा की हत्या करके अपनी आपराधिक यात्रा क्यों शुरु करता? इसलिए माफिया का धर्म देखना या उसे कौम का लीडर बताना मुस्लिम कौम के साथ धोखा है। अतीक अहमद ने भी अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ाने के लिए अपराध से लेकर राजनीति तक सबका सहारा लिया। उसने जो भी किया अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ाने के लिए किया, कौम की भलाई के लिए नहीं किया।

अत: ऐसी बेतुकी बयानबाजी से मुस्लिम कौम को भटकाने का काम बंद होना चाहिए कि अतीक अहमद की हत्या कौम के लीडर के हत्या है। पसमांदा आंदोलन का इस प्रकरण में यह स्पष्ट मानना है कि यह पूरी तरह कानून व्यवस्था और लोकतांत्रिक राजनीति के सुधार से जुड़ा मुद्दा है और इसे किसी भी स्थिति में मुस्लिम सांप्रदायिकता का मुद्दा नहीं बनने देना चाहिए।

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