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कर्णाटक चुनाव में कांग्रेस की जीत

स्वामी व्यालोक

by Swami Vyalok
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2014 से कोई चुनाव ऐसा नहीं बीता, जब मोदीजीवा की परीक्षा नहीं ली गयी। यह कांग्रेसियों का, लिबिर-लिबिर गिरोह का, फेमिनाजियों का, सिकुलरों का पसंदीदा शगल था। अब दक्खिनी टोले के महावीर भी इसमें आ गए हैं। परिणाम आए नहीं कि मीम और गालियां शुरू। अरे भाई-बहिनों, रुको जरा…ठहरो जरा।

1. भाजपा की सीटें घटी हैं, लेकिन वोट परसेंटेज बढ़ा है। पार्टी इसे सीटों में परिणत नहीं कर पाई, ठीक पंजाब और दिल्ली की तरह। वहां कांग्रेस का वोट कंजरवाल को शिफ्ट हुआ, यहां जेडीएस का वोट पाड़ा की पार्टी को शिफ्ट हुआ। बीजेपी के लिए यह जरूर चिंता का विषय है कि जिन राज्यों में त्रिकोणीय मामला है, वहां यह दो-दलीय मुकाबला बनने से कैसे रोका जाए, राजस्थान और म.प्र. में तो मामला बस दो दलों का ही है, तो वह अलग बात।
2. बीजेपी इससे भी बुरी तरह हारती। डिजर्व करती थी। अगर मोदीजीवा लास्ट में बांस नहीं लगाता, तो पूरी इमारत ढही हुई थी। येदुरप्पा ने पूरी पार्टी को बंधक बनाया हुआ था, बासवराज उस चंगुल से उबर नहीं पाए और भ्रष्टाचार के आरोप लगभग तय हो गए। जनता में परसेप्शन चला गया। 2 परसेंट वोट जो इधर बढ़ा है, वह मोदीजीवा की ही देन है, इसलिए चिल। वैसे, विश्लेषक तो कांग्रेस की जीत का श्रेय पाड़ा और भारत दर्शन को भी दे रहे हैं…।
3. बीजेपी के वोटर्स को गाली देने से कुछ नहीं होगा। वो जैसे हैं, वैसे ही हैं। चिंता अब ये है कि कांग्रेस ने जो उलजलूल वादे किए हैं, उसको पूरा करने के चक्कर में कर्नाटक का क्या हाल होगा?
4. बुद्धिजीवियों की तरह बर्ताव न करें, लकड़बग्घो। योगीजीवा को लेकर इतना न कूदें कि वही डांट दे, आप लोगों को। उनकी ट्रेनिंग चल रही है, चलने दीजिए। यूपी में भी कंजर की पार्टी का आगमन हो गया है, यह बेहद चिंता की बात है।
5. कांग्रेस का अंत बेहद करीब है। वह अंतिम सांसे ले रहे मरीज की तरह ही है। बस, एक धक्का और दो…।
6. और अंत में, जिस दिन चुनाव प्रचार खत्म हुआ, मोदीजीवा आगे के लिए निकल गया था। वह राजस्थान में था। तो, आगे की तैयारी कीजिए, जबरन बुद्धिजीवी न बनिए और एकजुट होकर राजस्थान और देश के लिए भिड़ जाइए। यह चुनाव का नहीं, देश का सवाल है…
बाकी तो जो है सो हइए है…

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