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चिम्पांज़ी काफ़ी हद तक मनुष्यों की तरह होते है.

Nitin Tripathi

by Nitin Tripathi
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चिम्पांज़ी काफ़ी हद तक मनुष्यों की तरह होता है. डालफिन के दिमाग़ का साइज़ मनुष्य से ज़्यादा होता है. शेर की शारीरिक क्षमता मनुष्य से ज़्यादा होती है. लेकिन दुनिया पर राज इंसानों का है – केवल एक वजह से. उसकी कहानियाँ गढ़ने और फ़िर उन कहानियों पर यक़ीन कर लेने की प्रवृत्ति से.

आरम्भ में जब मानवता का विकास हुआ, तो आपस में ही चोरी चकारी, डकैती, ओपन सेक्स, कुछ भी मिल जाओ खा लो जैसी जानवरी वृत्तियाँ मनुष्य में थीं. फ़िर मनुष्य धर्म को लेकर आया. आरम्भिक दौर के हर धर्म ने कुछ बेसिक नियम बनाएँ जो प्रायः सेम ही थे जैसे घमंड, लालच, चोरी आदि का त्याग, विवाह की महत्ता, विवाहेत्तर सम्बन्धों को पाप मानना आदि. इन सब नियमों ने एक बेसिक सोसाययटी बना दी, लोग बग़ैर इस डर के कि पड़ोसी उनका खाना खा जाएगा, कालोनी बना रहने लगे. पड़ोसी चाहता तो वह सदैव ऐसा कर सकता था पर उसे भय था कि उसे पाप लगेगा. और यह पाप वाली कहानी उसे भगवान ने नहीं समझाई, यह उसे उसके ही जैसे एक अन्य मनुष्य ने सुनाई और उसने यक़ीन किया.

धीमे धीमे मनुष्य की कहानियाँ और बड़ी होती गई. यह देश है, इसकी रक्षा करना तुम्हारा धर्म है. जब मनुष्य पैदा हुआ तो उस वक्त उसके कान में भगवान ने नहीं डाला था कि यह सोमालिया तुम्हारा देश है, इसकी रक्षा करना तुम्हारा कर्तव्य. यह कहानी पहले एक ने बनाई फ़िर बाक़ी सबने ऐसी यक़ीन की कि लोग जान दे देते हैं देश के नाम. पर फ़ायदा यह हुआ कि जहां जानवर अकेले या हद से हद पाँच दस के group में रहते हैं, मनुष्य करोड़ों की संख्या में एक साथ रहने लगा.

समय के साथ साथ कहानियाँ बढ़ती गईं. ये काग़ज़ का नोट रुपया है, इससे कुछ भी ख़रीद सकते हो. और लो अरबों लोग यक़ीन करने लग गए. और विहंगम – कारपोरेट ऑफ़िस में जाओ किसी भी नाम से कम्पनी रजिस्टर कर लो. अब से लेन देन पैसा हिसाब किताब क़ानूनी ज़िम्मेदारी कम्पनी की – यह है क्या? मनुष्य द्वारा क्रिएट की गई कहानी और फ़िर मनुष्यों द्वारा उस पर किया गया यक़ीन.

आज भी जो आपको एकदम फ़िक्शन लग रहा है कल हो सकता है मनुष्यता इसी के इर्द गिर्द टहले. हो सकता है मेटा वर्ल्ड हो जहां हमारे आपके अवतार टहल रहे हों और वहाँ की कमाई लड़ाई झगड़े यहाँ के मोह माया से ज़्यादा महत्व पूर्ण हो जाए. हो सकता है धरती से काग़ज़ी करेंसी ग़ायब हो जाए और कोई क्रिप्टो टाइप पूरी दुनिया में चलने लगे. हो सकता है एक पाँचवा ड़ायमेंशन हो मन की दुनिया जिसे देखने के लिए एक कम्पनी का यंत्र लेना होगा, आँख बंद कर उसे दबाइए गोवा पहुँच गए. और यही सब कूल माना जाए.

वैसे हमारे बड़े बुजुर्ग यह समझ गए थे कि यह संसार एक कहानी है, मिथ्या है मोह माया ममता का जाल जो केवल इंसान द्वारा बुनी हुई कहानियों में उलझा हुआ. इसे सुलझा कर निकल पाना ही मनुष्य का अंतिम उद्देश्य. या यह भी हो सकता है कि कोई उद्देश्य ही न हो. हम बस कहानियों वाली निरुद्देश्य कहानी हों, जिसके हर पात्र को लगता है कि उसका कुछ उद्देश्य है पर अंततः वह है कहानी ही.

नोट: पोस्ट का एक हिस्सा युवाल नोवा हरारी की सेपियन थ्योरी से प्रभावित है. कंक्लूज़न और एड ons मेरे हैं. यदि आपने युवाल को नहीं पढ़ा है तो काफ़ी कुछ मिस किया है. अमेजन में युवाल की पुस्तकें ढूँढ कर ख़रीद कर पढ़ें. सर्वप्रथम सैपिएँस पढ़ें.

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