Home विषयइतिहास अनसंग हीरोज़ – ऋग्वैदिक हिंदू पठान

अनसंग हीरोज़ – ऋग्वैदिक हिंदू पठान

देवेन्द्र सिकरवार

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कितने लोग जानते हैं कि जब तक सूर्यपूजक महाराज ललितादित्य, वैष्णव नागभट्ट प्रतिहार और बौद्ध राजा धर्मपाल जैसे जागरुक नरेश अफगानिस्तान के हिंदू पठानों व हिंदू तुर्कों को सहायता भेजते रहे इस्लाम का फैलाव रुका रहा।

गांधार क्षेत्र की इन छावनियों में उत्तर भारतीय सैनिकों की भारी संख्या में उपस्थिति के कारण ही अरबी यात्रियों ने कहा था–

“गांधार ‘रहबूदों’ का देश है।”

हिंदू सैनिकों का यह प्राचीन छावनी क्षेत्र आज भी ‘रावलपिंडी’ के नाम से प्रसिद्ध है।
फिर आया मूर्खताओं का दौर।

हिंदुकुश तक विस्तृत भारत की सीमाओं को भुलाकर अफगानिस्तान को विदेश घोषित कर विदेश व समुद्रयात्रा करना अपराध घोषित कर दिया गया।

संकुचित विचारों के कारण राजाओं के राज्य ही ‘राष्ट्र’ बन गये।

सैनिक लौट आये और अफगानिस्तान के प्राचीन ऋग्वैदिक हिंदू पठानों को अकेला छोड़ दिया गया।

शाहियों के बाद हम भूल गए कि अफगानिस्तान और हिन्दुकुश हमारा ही है।

कर्मों का प्रतिफल मिलना ही था।
पर शोक की बात है कि हम अभी भी नहीं सुधरे हैं।

हमारा मनोमस्तिष्क तक अफगानिस्तान के ‘मुस्लिम पठानों’ को पुनः ‘हिंदू पठान’ बनाने और हिंदुकुश पर स्वर्णगैरिक ध्वज फहराने का स्वप्न देखने से डरता है।

यही हमारा असली पतन है।

पाकिस्तान की बात तो इसलिये भी नहीं करता कि उसका विखंडन व वहां की मुस्लिम जातियों का मास कन्वर्जन सिर्फ कुछ दशकों की बात है अगर उन्हें उनका वास्तविक इतिहास बता दिया जाये।

#इंदु_से_सिंधु_तक हमारी नई पीढ़ी की आंखों में हिंदुकुश पर सूर्यध्वज फहराने के स्वप्न को बसाने का भी प्रयास है।

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