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ब्रिटिश से आजादी के 75 वर्ष

Umrao Vivek Samajik Yayavar

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
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ब्रिटिश राजनैतिक-गुलामी से राजनैतिक-आजादी मिले हुए 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं। 75 वर्ष एक लंबा समय होता है, इस लंबे समय में कई पीढ़ियां 1947 के बाद पैदा होकर वयस्क हो चुकी हैं।

    • अब तक हमें संप्रदाय व धर्म इत्यादि के आधार पर नफरत/मानसिक-गुलामी से बाहर आ चुका होना चाहिए था।

      अब तक हमें भारत को गुलाम बनाए रखने के लिए बनाई नौकरशाही ढांचे व चरित्र की गुलामी से बाहर आ जाना चाहिए था।
      अब तक हमें हर समस्या के लिए पाकिस्तान, अमेरिका, योरप इत्यादि को गाली देने की फूहड़ मानसिकता की गुलामी से बाहर आ जाना चाहिए था।
      अब तक हमें सामाजिक दास-व्यवस्था व भ्रष्टाचार के मूल स्रोत, जाति जैसी अति-घिनौनी कुव्यवस्था की गुलामी से बाहर आ जाना चाहिए था।
  • लेकिन हम बाहर नहीं आ पाए, क्योंकि हमने बाहर आने के लिए प्रयास नहीं किए, उल्टे हमने अपनी ऊर्जा का प्रयोग दोषारोपण करने में लगाया। हमने अपने महान पूर्वजों से कुछ नहीं सीखा, हमने नहीं सीखा कि गुलामी से बाहर आने के लिए कितनी पीढ़ियों को लगातार संघर्ष करते हुए कुर्बान होना पड़ता है।

    हमने अपने महान पूर्वजों से नहीं सीखा कि झूठ, फरेब, प्रपंच, तीन-तिकड़म इत्यादि-इत्यादि से वाहवाही व शेखी भले ही मिलती है, आजादी नहीं मिलती है, गुलामी से बाहर निकलना संभव नहीं हो पाता है। हमने अपने महान पूर्वजों से नहीं सीखा कि गुलामी से बाहर आने के लिए, बटने की बजाय मिलकर साथ चलना होता है। हमने तो उल्टे अब और अधिक बटते जाने व आपस में एक दूसरे से कितनी अधिक नफरत करने सकें, इसी में अपनी जीवनी ऊर्जा को झोंक रखा है। ऐसा करने में हम लज्जा की बजाय गर्व का अनुभव करते हैं। हम मानसिक व वैचारिक रूप से भयंकर बहुत भयंकर बीमार होते जा रहे हैं।

    हम इतने क्रूर होते जा रहे हैं कि हम यह तक नहीं सोचते हैं कि हम अपनी आने वाली संतानों को क्या छोड़ कर जा रहे हैं, क्या देकर जा रहे हैं। हमें लगता है कि मुद्रा ही सबकुछ है। हम इतने अंधे होते जा रहे हैं कि हमें यह किंचित भी अंदाजा नहीं कि मुद्रा की हैसियत बहुत ही कम होती है, मुद्रा की हैसियत विनिमय के लिए सहूलियत से अधिक कुछ भी नहीं। मुद्रा की सर्वोच्च हैसियत केवल उसी समाज में होती है जहां शोषण है, नफरत है, आत्याचार है, भ्रष्टाचार है। ऐसे समाजों में मुद्रा में सर्वोच्च शक्ति निहित हो जाती है, मुद्रा सबसे अधिक ताकतवर हो जाती है, यहां तक कि व्यक्ति व समाज पर अपना निरंकुश नियंत्रण स्थापित कर लेती है, गुलाम बना लेती है। हमें यह भान नहीं रहता कि मुद्रा का अर्थ संपत्ति नहीं होता है।

    ब्रिटिश-गुलामी से राजनैतिक आजादी मिले हुए 75 वर्ष होने के महान-उत्सव अवसर पर मेरी यही कामना है, कि हमें हमारे महान पूर्वजों के पुण्य-प्रताप से सदबुद्धि व शक्ति प्राप्त हो जिससे हम अपने आपको गंभीर संघर्ष के लिए तैयार कर सकें ताकि हम इन तमाम गुलामियों से आजाद हो सकें।

    जैसे हमारे महान पूर्वज संघर्ष व त्याग से आने वाली पीढ़ियों के लिए गर्व अनुभव कर पाने के लिए बहुत कुछ कर गए। वैसे ही हम भी अपने पूर्वजों की भांति अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसा गंभीर छोड़ जाएं कि उन्हें भी हम पर गर्व अनुभव हो।

    कम से कम हममें इतनी तो ईमानदारी, विचारशीलता व लज्जा तो बची ही होगी कि हम यह तो समझते ही होंगे कि भ्रष्टाचार, झूठ, फरेब, प्रपंच, कुचक्र, हड़पना, धूर्तता, ईमानदारी व प्रतिबद्धता का ढोंग इत्यादि-इत्यादि से माल-पानी जमा करना इत्यादि नीचता की श्रेणी में आता है, न कि आने वाली पीढ़ियों के लिए गर्व करने लायक गंभीर प्रवाह की श्रेणी में आता है।

    हम अंदर से सामाजिक ईमानदार बनें। हम प्रपंच, फरेब, झूठ, मक्कारी, धूर्तता व ढोंग से बाहर आएं। हम तमाम गुलामियों से बाहर आने की शिद्दत से जद्दोजहद करें। हमारा ऐसा करना ही पूर्वजों को सच्चे मायनों में श्रद्धांजलि, अपने व अपने परिवार के लिए कमिटमेंट्स तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए गर्व करने लायक देना है। आजादी के महा-उत्सव पर खुद को व आपको कोटि-कोटि बधाई देता हूं, साथ ही यह आशा करता हूं कि तमाम गुलामियों से बाहर निकलने के लिए, हम अपने अंदर ईमानदारी से गंभीर संकल्प लेंगे।

    जय हिंद।

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