Home राजनीति आरक्षण का खेल खेलने का लाभ सरकार बनाने और समाज को प्रतिभाहीन बनाने में

आरक्षण का खेल खेलने का लाभ सरकार बनाने और समाज को प्रतिभाहीन बनाने में

दयानंद पांडेय

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80 करोड़ निर्बल लोगों को मुफ्त राशन देना , उज्ज्वला के तहत मुफ़्त गैस , मुफ्त पक्का मकान , मुफ्त शौचालय देना है आप सालो-साल देते रहिए। डाक्टर , इंजीनियर आदि की पढ़ाई में भी इन की पूरी फीस माफ़ कर दीजिए। पर 90 परसेंट वाले बच्चों को धकिया कर 40 परसेंट वाले बच्चों को एडमिशन देने से तो बच ही सकते हैं। नौकरी देने से तो बच ही सकते हैं। ऐसी प्रतिभाहीन योजना से बाज आइए। सोचिए कि 90 परसेंट वाली प्रतिभा को धकिया कर 40 परसेंट वाले को सिर पर बिठा कर आप 75 बरसों से कौन सा समाज बना बैठे हैं। जातीय नफ़रत की नागफनी उगा बैठे हैं। सामाजिक समता के नाम पर उग रही इस नागफनी को रोकिए। ओ बी सी और दलितों द्वारा बात-बेबात आगज़नी और हिंसा से कब तक डरते रहेंगे ? वह नाराज हो कर धर्म परिवर्तन कर लेंगे , उन की इस ब्लैकमेलिंग से कब तक भयभीत रहेंगे ?

आप को नहीं मालूम तो मालूम कीजिए कि देश ज्वालामुखी के ढेर पर बैठ चुका है। ओ बी सी , दलित और मुस्लिम की राजनीति सिर्फ़ राजनीति तक ही सीमित रखिए। नहीं कल को योग्य चिकित्सक , योग्य इंजीनियर , योग्य प्रशासनिक अधिकारी आप ढूंढते रह जाएंगे। बहुत बीमार समाज बना बैठे हैं , हम लोग। इतना कि हिप्पोक्रेट राजनीतिज्ञ ताल ठोंक कर जातीय जनगणना की दूरबीन से ही विकास खोजने की वकालत का पहाड़ा पढ़ने लगे हैं। अभी अयोग्य लोगों के राज्य सभा में पहुंच जाने से उन के जूतमपैजार पर आप माथा फोड़ रहे हैं। कल को यह जूतमपैजार गली-गली , सड़क-सड़क दिखने वाला है। हिंसा और अराजकता के दम पर योग्यता पर अयोग्यता की विजय का पथ प्रशस्त हो चुका है।

भारतीय समाज को इस तरह हिंसक और तालिबान बनने से रोकना अब बहुत ज़रूरी हो गया है। आप को लगता है कि जनता ने बहुमत से चुन कर आप को संसद में भेजा है। तो क़ानून बनाने का , उस को लागू करने का आप का अधिकार है। पर मुट्ठी भर अराजक और हिंसक लोग आप को काम नहीं करने दे रहे। दुरुस्त बात है। लोकतंत्र के लिए यह सचमुच शुभ नहीं है। फिर इसी बिना पर यह भी कैसे शुभ है भला कि 90 परसेंट पाने वाला बच्चा कोने में खड़ा-खड़ा फ्रस्ट्रेट होता रहे और 40 परसेंट पाने वाला उस के कंधे पर पैर रख कर खड़ा हो जाए और सारी मलाई बिना मेहनत के लूट ले।

जैसे संसद में विपक्ष अल्पमत में होते हुए भी सारे सिस्टम की नाक में दम किए हुए है , वैसे ही कम अंक पा कर भी आरक्षण वाला बच्चा ज़्यादा नंबर पाने वाले बच्चों की नाक में दम किए हुए है। कभी दलित , कभी मुस्लिम , कभी ओ बी सी का ट्रंप कार्ड खेलने से भी ज़्यादा घातक है , प्रतिभशाली बच्चों का गला काट कर प्रतिभाहीन बच्चों को निरंतर आगे बढ़ाते जाना। प्रतिभाहीन समाज बना कर आप की सरकार तो बन सकती है , आप का हिंदुत्व भी बच सकता है। पर जब प्रतिभा की ज़रूरत होगी तब क्या करेंगे भला। आक्सीजन और दवाई की तरह क्या प्रतिभा भी आयात करेंगे ? अभी तो आप की सारी प्रतिभाएं यू के , यू एस की प्रगति में अपना ख़ून-पसीना एक कर रहे हैं।

ब्रेन-ड्रेन की मार बहुत बड़ी है। ब्रेन-ड्रेन पहले बीस-पचीस प्रतिशत ही था। अब यह 70 प्रतिशत से अधिक हो चुका है। पहले बच्चे पढ़ कर यू के , यू एस भागते थे। अब पढ़ने के लिए ही भाग जाते हैं। पढ़ कर वहीँ काम करने लगते हैं। फिर जब तक माता-पिता जीवित रहते हैं तब तक भारत याद रहता है। फिर वह भारत भी भूल जा रहे हैं। आंख उठा कर देखिए। देश प्रतिभाओं से रिक्त हुआ जा रहा है। आरक्षण-आरक्षण खेलने का लाभ सरकार बनाने में फिलहाल बहुत उपयोगी है पर भारतीय समाज को प्रतिभाहीन बनाने में और ज़्यादा उपयोगी साबित हो रहा है। कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण और मुस्लिम वोट बैंक के चक्कर में अंतत: साफ हो गई है।

सपा , बसपा जैसी जातिवादी पार्टियां भी सफाचट हो गईं इसी मुस्लिम वोट बैंक की बदबू में। अब भाजपा ओ बी सी और दलितों के तुष्टिकरण में नत हो कर बदबू मारने लगी है। भाजपा और आर एस एस को लुका-छुपी का खेल बंद कर सीधे-सीध 50 प्रतिशत का आरक्षण दलितों को 50 प्रतिशत आरक्षण ओ बी सी को दे कर फाइनली छुट्टी ले लेनी चाहिए। हिंदुत्व बचाने का अगर यही तरीक़ा शेष रह गया है तो यही सही। बाक़ी लोगों को मंगल ग्रह या चंद्रमा पर भेज देना चाहिए। लोग वहीं अपना-अपना आबोदाना खोज लें।

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