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विरोध प्रदर्शन में चीनी पुलिस नहीं पहनती ड्रेस जाने क्यों

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
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चीन में जब भी विरोध प्रदर्शन होते हैं, अपवाद घटना छोड़ पुलिस ड्रेस नहीं पहनती है, ताकि जो लोग विरोध प्रदर्शन में भाग ले रहे हैं, उनकी जानकारी व योजना इत्यादि प्राप्त करने में सहूलियत हो, जरूरत पड़ने पर आगे चल कर प्रदर्शनकारियों को इतना कुचल दिया जाए कि कभी सपने में भी न सोच पाएं कि विरोध करना है। प्रतिवर्ष हजारों लोगों की हत्याएं चीन की सरकार करवाती है और उनके सभी प्रकार के डाटा गायब कर देती है कि लिखापढ़ी में इन लोगों के माता-पिता भाई-बहन इत्यादि तक भी साबित नहीं कर पाते हैं कि उनके परिवार में कोई बंदा था भी।
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यदि पुलिस ड्रेस पहन कर विरोध प्रदर्शनों में उतर जाए, तो एक बात बिलकुल ही पक्की होती है कि मामला बहुत गंभीर है।
अप्रैल से चल रहे विरोध की स्थिति यहां तक आ पहुंची कि पहले पुलिस को ड्रेस पहनकर उतरना पड़ा ताकि लोगों में दहशत पैदा हो। लोग फिर भी नहीं माने तो पुलिस ड्रेस के अलावे बिना वर्दी के भी पुलिस उतारी गई जिसका काम था विरोध करने वाले लोगों के हाथ पैर तोड़ना, आंखें फोड़ना।
(चीन में स्वास्थ्य सरकार की जिम्मेदारी है नहीं इसलिए लोगों को अपने इलाज का खर्चा खुद उठाना पड़ता है, भारी भरकम प्रीमियम देते हुए हेल्थ इन्श्योरेंस लेना पड़ता है। चीन ने अमेरिका की नकल कर रखी है हेल्थ इंश्योरेंस के मामले में। योरप की नकल नहीं किया है क्योंकि योरप में स्वास्थ्य की जिम्मेदारी सरकार की है)
हाथ पैर तोड़ने, आंखे फोड़ने से भी बात नहीं बनी तो चीन की साम्यवादी पार्टी सरकार ने टैंक उतार दिए, ताकि लोग इतना डर जाएं कि फिर दो तीन दशकों तक विरोध करने की कल्पना तक करने से उनकी रूह कांपे।
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मैं वर्षों से लगातार कहता आया हूं कि चीन की इकोनोमी हवाई है, खोखली है। जब नीच व महाधूर्त पुतिन ने यूक्रेन पर युद्ध थोपा और रूस पर प्रतिबंध लगाए गए तब मैंने कहा कि इन प्रतिबंधों का असर दूरगामी है और महीनों बाद असर दिखना शुरू होगा। इनका प्रभाव चीन पर भी पड़ना है, क्योंकि चीन की इकोनोमी का चरित्र ही परजीवी है तथा चीन में आम लोगों को मजबूत नहीं किया गया है।
मार्च से रूस पर प्रतिबंध लगने शुरू होते हैं, अप्रैल से चीन में लोगों को परेशानी होनी शुरू हो जाती है, जो बढ़ते-बढ़ते इस भयंकर स्थिति तक आती है कि चीन की साम्यवादी सरकार (सनद रहे साम्यवादी सरकार) लोगों को उन लोगों को जो अपनी खुद की कमाई को पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उनको डराने के लिए कुचलने के लिए टैंक उतार देती है।
(आम लोगों को मजबूत करने से खतरा यह रहता है कि कल को मजबूत होकर तानाशाही सत्ता का विरोध करना शुरू कर सकते हैं, इसलिए सर्वाइवल करते रहें, बाजार के उपभोक्ता बने रहें, जद्दोजहद में फसें रहें। स्वास्थ्य व शिक्षा के तंत्र को ऐसा बनाओ कि पीढ़ी दर पीढ़ी जीवन ही खप जाए परिवार को ही पालने के जद्दोजहद में।)
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लेकिन जिन लोगों को साम्यवाद की धेला भर भी समझ नहीं, जिन लोगों के लिए लेनिन की बर्बरता, माओ की बर्बरता तथा तानाशाही व अधिनायक सत्ता-तंत्रों की स्थापना व मजबूतीकरण ही साम्यवाद लगता है। ऐसे बीमार मानसिकता के लोगों से ऑब्जेक्टिविटी की अपेक्षा की ही नहीं जा सकती है। ये लोग गूगल सर्च करके कुछ भी आंडू-पांडू उठा लाते हैं, सरसरी निगाह से कुछ हेडलाइन पढ़ लेते हैं, दो चार लाइन अंदर का भी कभी कभार पढ़ लेते होंगे। बस खुद को ज्ञानी व शोधार्थी मानकर जुट पड़ते हैं बताने में कि लेनिन महान था, माओ महान था, स्तालिन महान था, सोवियत संघ महान था, पुतिन महान है। योरप बुरा है।
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इस तरह के फर्जी साम्यवादी लोग मुझे भयंकर रूप से सैडिस्ट व कुंठित लगते हैं। इन लोगों को इस बात से समस्या रहती है कि योरप अपने ही लोगों के ऊपर अत्याचार क्यों नहीं करता है, अपने लोगों के प्रति जवाबदेही क्यों महसूस करता है। इन लोगों को चीन जैसे देश महान लगते हैं क्योंकि चीन अपने देश के लोगों के ऊपर संस्थागत तरीके से अत्याचार करता है और कुछ प्रतिशत लोगों को अनापशनाप ऐश करवाता है। इन सैडिस्ट लोगों की नजर में यही साम्यवाद है, इस चक्कर में मार्क्स को भी घसीट लाते हैं। मने कुछ भी करके, बस अपनी लगानी है क्योंकि न तो गंभीर न ही व्यापक अध्ययन करने की औकात ही नहीं है।
जब भारत दस बीस चलताऊ गेस पेपर टाइप वाहियात किताबें रटकर, पिछले वर्षों में आने वाले सवालों का पैटर्न देखकर रटकर IAS बनकर खुद को दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञानी मानने, समाज व देश के हर विषय व मुद्दे का विशेषज्ञ मानने व खोखले अहंकार की बीमार मानसिकता वाला समाज है, और यही लोग देश के लोगों के आदर्श हैं तो समाज के लोग आब्जेक्टिविटी व गंभीर अध्ययन से कोई नाता क्योंकर रखें। अपवाद लोगों की बात नहीं हो रही है।
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विवेक उमराव
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