Home लेखक और लेखस्वामी व्यालोक आप गू निर्यात भी करते हैं और आयात भी…

आप गू निर्यात भी करते हैं और आयात भी…

by Swami Vyalok
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अचानक ही भारतवर्ष की महान सांस्कृतिक-दूत, इंफ्लुएंसर और विदुषी-सामाजिक कार्यकर्त्री प्रियंका चोपड़ा जी के दर्शन हुए। (साला, इस नाम में ही कोई दोष है, विदुर) वह किसी अंग्रेज को होली के बारे में बता रही थीं। कुल जमा उनका सार यही था–होली इज़ लाइक अ बिग पार्टी। हम रंग लगाते हैं, रंग खेलते हैं, खाते हैं, मौज करते हैं, इट्स अ बिग पार्टी।
भारत के साथ ‘दुर्घटनावश हिंदू’ प्रधानमंत्री जवाहरलाल के समय से ही एक भयंकर भूल हुई है। हम संस्कृति के नाम पर पश्चिम का उच्छिष्ट कूड़ा अपने यहां घर से लेकर गलियों-चौराहों तक छिटका चुके हैं, तो कल्चरल-एक्सचेंज के नाम पर हम अपने यहां की सबसे सड़ी, सबसे बदबूदार चीज निर्यात भी करते हैं- भारतीय हिंदी सिनेमा या फिर ट्विंकल-प्रियंका-करीना जैसी ज़ीरो आइक्यू वाली, मैदे की बोरियों को। उनसे फिर आप उम्मीद ही क्या करेंगे?
होली को रंगोत्सव, रंग, मदनोत्सव वगैरह बोलकर बंगाली और कथित बुद्धिजीवी पहले ही इसे हिंदू त्योहारों की श्रेणी से हटवाने में सफल हो रहे हैं। 25 साल पहले एक वामपंथी बुद्धिजीवी ने मुझे होली के बहाने ही ‘रिचुअल’ और ‘फेस्टिवल’ का अंतर समझाया था। होली अगर रंगोत्सव तो दीवाली को दीपोत्सव बना ही रहे हैं, हैलोईन अब समाज की मुख्यधारा में है ही, तो हमारे पर्वों-त्योहारों का जो ‘हिंदू’ एलिमेंट या तत्त्व है, उसे ही उड़ा देने की साजिश चल रही है। हमारे सारे धार्मिक त्योहारों और चिह्नों को सेकुलर चाशनी में ढाला जा रहा है।
रंगोत्सव क्या है, रंग क्या है? भाई, प्रह्लाद और विष्णु की कथा तो हरेक हिंदू को सुनाओ न, वरना होलिका माई की जय आज कुछ भूले-भटके नौजवान कर रहे हैं, कल से हरेक हिंदू करेगा। हो सकता है, होलिका माई की मजार भी बन जाए। गंगा-जमनी तहजीब, यू नो न…
ऐसी ही भसड़ छठ को लेकर भी लोगों ने मचायी है। लोकपर्व…जनपर्व…आदि-इत्यादि। लोकपर्व क्या होता है? हमारा कौन सा त्योहार लोकपर्व नहीं है, किस त्योहार में धार्मिक एलिमेंट नहीं हैं और किस त्योहार में प्रकृति की पूजा नहीं है, प्रकृति का आह्वान नहीं है, उसकी चिंता नहीं है..?
दशहरा हमारी मातृशक्ति का आह्वान है, छठ हमारी लोकशक्ति का, दीपावली हमारे राम के घर आने का पर्व है, तो होली हमारी सामाजिकता और होलिका-दहन की खुशी का।
सेकुलर बनने की चाह में इतना सेकुलर न बन जाओ कि हमारे जैसों को होली-दीवाली के बारे में लिखकर किसी चैनल पर सेव करना पड़ जाए और आप बस गाते रहें–
डू मी अ फेवs…..लेट्स प्ले होली….

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