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एक आई ए एस आफिसर की कहानी

Dayanand Panday

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संजय को अपने पड़ोसी आई.ए.एस. अधिकारी भाटिया की याद आ गई। जो उसके फ्लैट के नीचे वाले फ्लैट में रहता था। और उन दिनों समाज कल्याण विभाग का निदेशक था। संजय जब अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने जाता तो भाटिया हाफ पैंट पहने कार से उतरता। वह बताता, “टहलकर आ रहा हूं।” उसकी सेवा में चार पांच गाड़ियां और तमाम नौकर चाकर लगे रहते। सो जब वह कार से उतरता हुआ बोलता, “टहल कर आ रहा हूं।” तो संजय को हैरानी नहीं होती। पर एक रोज गजब हो गया।
वह इतवार का दिन था।
संजय सोया हुआ ही था कि किसी ने तेज-तेज काल बेल बजाई। दरवाजा खोला तो देखा गैराज के ऊपर बने क्वार्टरों में रहने वाले दो तीन कर्मचारी थे। वह सब हांफ रहे थे और कह रहे थे, “संजय जी जल्दी चलिए।”
“क्यों क्या बात है?” आंखे मीचते हुए संजय बोला।
“बहुत बड़ी खबर है।” वह एक साथ बोले, “कैमरा भी ले लीजिए।”
“कैमरा मेरे पास कहां हैं।” संजय बोला, “मैं फोटोग्राफर तो हूं नहीं।”
“तो कैमरा वाला बुला लीजिए।”
“पर पहले बात तो बताओ।”
“एक आई.ए.एस अधिकारी है भाटिया। वह रोज अपने गैराज में सुबह-सुबह कार लेकर आ जाता है। मुंह अंधेरे। फिर आधे-एक घंटे तक गैराज बंद कर अंदर ही रहता है। तो लोगों को शक हुआ। आते-जाते कार के अंदर देखते तो वह अकेला ही रहता। एक दिन हम दो तीन लोगों ने पीछा किया। तो देखा गोमती बैराज के पास भाटिया ने कार रोकी। पीछे का फाटक खुला और एक लड़की कार से उतर कर आगे की सीट पर जाकर बैठ गई। हम लोगों को विश्वास नहीं हुआ। एक बार लगा कि आंखों को धोखा हुआ होगा। फिर दुबारा पीछा किया, तिबारा पीछा किया। हर बार यही ड्रामा। उस लड़की के बारे में पता किया तो मालूम पड़ा कि वह उसकी पी.ए. है। और गोमती नगर में रहती है। वह भी सुबह-सुबह टहलने के बहाने निकलती है और कार लेकर समय पर पहुंच जाता। फिर वह कार में बैठ जाती। गोमती बैराज पर कार रुकती और वह आगे से पिछली सीट पर आकर सो जाती। कार गैराज में आ जाती किसी को पता नहीं पड़ता। और गैराज क्या है पूरा बेडरूम है। हार्ड बेड, परदा सब कुछ है।”
“तो अब गैराज की फोटो खिंचवानी है?” संजय खीझता हुआ बोला।
“नहीं साहब।” उसमें से दूसरा व्यक्ति बोला, “उन दोनों की फोटो खींचनी है।” वह बोला, “हम लोग बहुत दिनों से तड़े हुए थे। कि यह मुंह अंधेरे रोज क्यों आता है। और घंटे-घंटे भर अंदर क्या करता है। पर जब लड़की वाली बात पता पड़ी तो पूरी योजना बना कर आज बंद कर दिया साले को।” वह अभी यह बात बता ही रहा था कि नीचे से सीढ़ियां चढ़ता एक और व्यक्ति दौड़ा-दौड़ा आया। बोला, “वह भाटिया तो यहीं नीचे ही रहता है।”
“चलो उसके बीवी बच्चों को भी उसकी कारस्तानी बताएं।” दूसरा व्यक्ति बोला। और सबके सब फट-फट सीढ़ियां उतर गए। भाटिया की बीवी को बुलाया उन सबने और सारा वाकया बताया। भाटिया की बीवी कुछ बोली नहीं और घर का दरवाजा नौकर से बंद करवा दिया। वह सब ऊपर आकर फिर संजय के घर की कालबेल बजाने लगे। संजय अब तक वहां जाने का इरादा बदल चुका था। उसने सोचा पड़ोसी के फच्चर में पांव फंसाना ठीक नहीं रहेगा। पर कालबेल बजती रही। दरवाजा खोलकर वह बेरुखी से बोला, “अब क्या बात है?”
“बात तो वही है। आप चलिए न साहब।” वह बोला, “पेपर में निकलेगा तो मजा आजाएगा। आपके पेपर की सेल बढ़ जाएगी।”
“सेल वेल की चिंता तुम छोड़ो।” कहते हुए उसने अपनी विवशता फिर ओढ़ी, “मेरे पास कैमरा नहीं है। और बिना फोटो के यह खबर बनेगी नहीं।”
“कैमरे वाले को फोन कर दो साहब।”
“पर फोटोग्राफर के पास फोन नहीं है।”
“तो हमें पता बता दीजिए। हम घर से बुला लाएंगे।”
“अच्छा।” कह कर संजय बड़े असमंजस में पड़ गया। उसने फोटोग्राफर का पता देते हुए कहा, “काफी दूर रहता है ये।”
“कोई बात नहीं साहब।” वह व्यक्ति बोला, “हम चले जाएंगे। पर आप अभी चलिए।”
“हमको अभी ले चल कर क्या करोगे?” संजय टालते हुए बोला।
“नहीं साहब आपका अभी चलना जरूरी है।” उसमें से एक बोला।
“नहाने धोने दोगे कि ऐसे ही चलूं?” संजय ने फिर टाला।
“वापस आकर नहा धो लीजिएगा।” वह व्यक्ति बोला, “पर अभी वहां पहुंचना जरूरी है।”
“तुम लोगों ने गैराज में ताला तो बाहर से बंद कर दिया है न?” संजय बोला, “फिर जल्दी किस बात की, वह भाग तो पाएगा नहीं।”
“वो तो ठीक है साहब। पर आप चले चलते तो ठीक था।” उसने जोड़ा, “हम लोग छोटे कर्मचारी हैं।”
“औऱ वह आई.ए.एस. अधिकारी है। कभी हमारे ही विभाग में अफसर बनकर आ जाए तो हम लोगों की तो नौकरी खा जाएगा।” दूसरा व्यक्ति बोला, “इसीलिए हम लोग सामने नहीं आना चाहते।”
“पर उसकी बीवी के सामने तो आ गए हो।” संजय बोला, “इस तरह डरना था तो ताला ही नहीं लगाना था।”
“अब तो साहब सांप के बिल में हाथ डाल दिया है।” पहला व्यक्ति बोला।
“तुम लोग ऐसा करो कि पुलिस को खबर कर दो।” संजय सलाह देते हुए बोला, “वह लड़की समेत पकड़ा जाएगा। बेइज्जत होगा। और सारे अखबारों में अपने आप खबर छप जाएगी।”
“पुलिस में भी आप ही खबर कर दीजिएगा साहब।” दूसरा व्यक्ति बोला।
“जब सब हम ही कर दें तो तुम लोग क्या करोगे?” संजय उकता कर बोला।
“पुलिस हम लोगों की कहां सुनेगी?” दूसरा व्यक्ति फिर बोला।
“क्यों नहीं सुनेगी पुलिस? बिलकुल सुनेगी।” संजय बोला, “बस तुम लोग यह मत बताना पुलिस से कि किसी आई.ए.एस. अफसर को बंद किया है। वरना थाने की पुलिस भी डर जाएगी। तुम लोग ऐसे ही कोई ड्राइवर वगैरह बताना।”
“ठीक साहब!” पहला व्यक्ति बोला।
“ठीक-ठीक नहीं, अब चले जाओ।” संजय ने कहा, “अब हमें भी नहा धो लेने दो।”
नहा धोकर संजय गैराज पर पहुंचा तो पुलिस, फोटोग्राफर सभी आ चुके थे। पर वह आई.ए.एस. अफसर भाटिया भाग चुका था। हुआ यह कि जब इन आदमियों ने भाटिया की बीवी को किस्सा बताया तो उसने तुरंत हथौड़ी देकर एक नौकर को भेज दिया। उसने बाहर से गैराज का ताला तोड़ कर भाटिया को लड़की समेत भगा दिया। वैसे गैराज की हालत देख कर लगता था कि भीतर से भाटिया ने भी गैराज का फाटक तोड़ने की कोशिश कार से धक्का मार-मार कर की थी। भाटियां वहां से निकला तो बाहर की भीड़ उसे देखते ही तितर बितर हो गई। उलटे उसने वहां लोगों को गालियां दी और धमकी भी कि, “एक-एक को देख लूंगा।” और वहां से निकल भागा।
संजय पछता कर रह गया। उसने खुद से ही सवाल किया कि, “क्या उसने खुद नहाने धोने के बहाने भाटिया को बचाने का मौका नहीं दिया? पड़ोसी धर्म निभाने में लग गया?”
“सो तो है!” उसने खुद को जैसे जवाब दिया।
उसने सोचा कि भाटिया के घर आज महाभारत मचेगा। पर उसकी बीवी ने ऐसा कुछ नहीं किया। किसी को पता भी नहीं चला कि ऐसा कुछ हुआ है। पर उसके बाद से हुआ यह कि भाटिया की शक्ल काफी दिनों तक नहीं दिखी। उसका टहलना जैसे बंद हो गया था। नौकरों को सुबह-सुबह डांटने की भाटिया की आवाज भी गायब हो गई थी। उसकी बीवी ऐसे चेहरा गिराए दिखती गोया यह हरकत भाटिया ने नहीं उसी ने किया हो। संजय को देखते ही वह आंखें नीचे कर लेती। उसकी बेटियों का भी यही हाल था। संजय ने भी किसी से कुछ नहीं कहा, न ही खबर लिखी। एक बार उसने सोचा कि एक सटायर पीस या टिट बिट्स का एक पीस बिना नाम लिए लिख दे। पर नहीं लिखा। टाल गया। पर बाद में उसने गौर किया कि भाटिया की बीवी उसे घृणा की नजरों से देखने लगी। शायद उसे लगा कि वह सब कुछ संजय ने ही कराया हो।
भाटिया अब फिर टहलने जाने लगा था। वह ऐसे मिलता जैसे कुछ हुआ ही नहीं। संजय ने उसे एहसास भी नहीं कराया। न ही कोई चरचा की। बात खत्म हो गई थी।

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