Home विषयसामाजिक एक बच्ची ने मेरी पुस्तक #विषैलावामपंथ पढ़ कर

एक बच्ची ने मेरी पुस्तक #विषैलावामपंथ पढ़ कर

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एक बच्ची ने मेरी पुस्तक #विषैलावामपंथ पढ़ कर मुझे संपर्क किया. उससे लगभग 15-20 मिनट बात हुई.
उसने कहा, वह एक संस्कारी ट्रेडिशनल फैमिली से है. जब वह यूनिवर्सिटी पहुँची तो वामपन्थी प्रभाव में बिल्कुल बदल कर वोक हो गयी. फिर मेरी पुस्तक उसके हाथ लगी तो उसे उनका खेल समझ में आया, और उसने घरवापसी कर ली.
ऐसी बातें सुनकर जीवन धन्य हो जाता है. लेकिन यह कुछ ऐसा है जैसे वार्ड में एक मलेरिया के मरीज का इलाज करना जबकि पूरे शहर में गंदे खुले नाले हैं, उनमें पलते हुए मच्छर हैं, मच्छरों से फैलता मलेरिया है. जो मसला पब्लिक हेल्थ का है, उसमें हॉस्पिटल या क्लिनिक में दो चार का इलाज करके फर्क नहीं पड़ने वाला.
उसने एक चिंता व्यक्त की – अंकल, कॉलेजों में बच्चे, खासकर लड़कियाँ बिल्कुल पागल हो गयी हैं. बिल्कुल गाँवों से, धार्मिक, संस्कारी, ट्रेडिशनल फैमिलीज़ से उठकर बच्चे आते हैं और यहाँ पहुँचकर वे कुछ और ही हो जाते हैं. वे अपने संस्कारों से, रीतियों से, धर्म से, अपने रूट्स से घृणा करने लगते हैं. यह क्यों?
मुझे ऐसा लगा, उसे वामपन्थ का इलाज यह समझ में आया कि लोग अगर और धार्मिक, और ट्रेडिशनल, और परम्परावादी और रूढ़िबद्ध हो जायें तो वे वामपन्थ से अप्रभावित रहेंगे.
जी नहीं…वह तो वे पहले ही थे. समस्या कहीं और है.
समस्या है स्वतंत्र चिंतन की. हमारी शिक्षा हमें स्वतंत्र चिंतन के लिए प्रेरित नहीं कर रही. बच्चे खुद से सोचना, प्रश्न करना नहीं सीख रहे. उन्हें जो समझा दिया जा रहा है, समझ ले रहे हैं.
इसलिए जब तक घर में रहते हैं, घर में जो परम्पराएँ सिखाई जाती हैं उनका पालन करते हैं. पर जैसे ही घर से निकलते हैं, यूनिवर्सिटी में उन्हें ये वामपन्थी कब्जा लेते हैं, उनकी आजतक की सोच और विश्वास पर शंका खड़ी कर देते हैं और उनके दिमाग में अपना ज़हर बो देते हैं. चूँकि उन्होंने पहले भी किसी बात को क्रिटिकली परखने का स्किल पैदा नहीं किया है, उनके पास इनके सवालों के जवाब नहीं होते और वे इनके जाल में फँस जाते हैं. जैसे कि जो बच्चा स्कूल में सबसे सीधा सादा मम्मी का बच्चा होता है वह हॉस्टल पहुँच कर सिगरेट शराब गांजा सब पीने लगता है.
मैंने अपने बेटे को हज़ार बातें बतायीं हैं, घन्टों बहस की है लेकिन उसे कभी अपनी सोच को परे रखकर मेरी बात को स्वीकारने को मजबूर नहीं किया. मैं उसकी बातों से बहुत चिन्ता और आशंकाओं से जरूर गुजरा लेकिन जब वह यूनिवर्सिटी पहुँचा तो सवाल पूछने का उसका यह स्किल काम आया. मुझे डर था कि इंग्लैंड की यूनिवर्सिटीज के घोर वामपन्थी वातावरण में उसपर पता नहीं क्या प्रभाव पड़ेगा, लेकिन वह वहाँ के वामपन्थी प्रभावों से बिल्कुल अछूता निकल आया.
वामपन्थ के इंडोक्टरीनेशन का उत्तर रिवर्स इंडोक्टरीनेशन नहीं है, बल्कि वैचारिक स्वतंत्रता है. उन्हें सिर्फ बताइये मत, खुद से सोचने दीजिये और सोचने की क्षमता विकसित करने दीजिए. जो वैचारिक रूप से सबसे गुलाम और बौद्धिक रूप से सबसे कमजोर लोग होते हैं वे ही सबसे आसानी से वामपन्थ के जाल में पड़ते हैं

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