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और अंत में….प्रार्थना…

by Swami Vyalok
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बात छठ की या दीवाली-दशहरा किसी की नहीं है। बात सनातन की है। यहां फिर कहना पड़ेगा कि नराधम वामपंथी जिसे आज हिंदुइज्म (हिंदूवाद) और हिंदुत्व में बांट रहे हैं, हिंदुत्व को राजनीतिक विचारधारा बता रहे हैं। ये नरपिशाच मजबूर हैं, क्योंकि इनको इस्लाम और ईसाइयत के तौर पर केवल वही देखने को मिला है, जो मजहब और रिलिजन के नाम पर दरअसल विस्तारवादी राजनीतिक विचार (?) हैं, जिन्होंने रेगिस्तान और यूरोप के उजाड़ों से केवल छीनना सीखा है, कत्ल करना सीखा है। वे हिंदुत्व को समझ ही नहीं सकते।
बात छठ की, दीवाली-दशहरे या अक्षय नवमी की है ही नहीं। ये दैत्य हमें लीलने को पिछले 1200 वर्षों से आक्रमण कर रहे हैं। ऊपर से तुर्रा ये कि आरफा जैसी जिहादन, खुर्शीद जैसा लुच्चा और पाड़ा जैसा खानदानी चोर हमें हिंदुत्व सिखाते हैं। हममें से कई सीखते भी हैं, उनका झंडा भी ढोते हैं। जब इनका कुछ बस नहीं चलता तो कहते हैं कि –हिंदुस्तान में हिंदू खतरे में है, हाहा हा–। जी हां। हम खतरे में हैं। न होते तो पूरी दुनिया में होने के बाद आज मुट्‌ठी भर ज़मीन पर सिमट न गए होते।
इन म्लेच्छों की चाल को समझिए। ये कुछ वैसा ही है, जैसा आज से 25 साल पहले हमारे जेएनयू के हॉस्टल के वॉर्डन कांति वाजपेयी ने मुझे उपदेश देते हुए कहा था, जब हमलोगों ने दुर्गापूजा के दौरान व्रत रखने के बाद उसके उद्यापन के लिए हवन करने की मांग की थी, “देखो व्यालोक, इफ्तार तो एक सामूहिक त्योहार है, उसमें रिलिजियस एंगल नहीं है, तुम यहां धर्म को लेकर घुस आए हो। हवन तो धार्मिक मुद्दा है।” यह कहते हुए प्रो. वाजपेयी ने मुझे फेस्टिवल और रिलिजस एक्टिविटी का काफी फर्क समझाया।
उनके आधे घंटे के लेक्चर के बाद मैंने बड़ी विनम्रता से जो तब कहा था, उसी को यहां दुहरा रहा हूं, ‘सर, गलती से भी किसी मुसलमान के सामने ये मत कह दीजिएगा, वरना आपके ऑक्सब्रिज एक्सेंट (ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज में पढ़नेवालों की ज़ुबान) को वह आपका जबड़ा तोड़कर निकाल लेगा। आप किसी हिंदू को सेरमनी, रिलिजस एक्टिविटी और फेस्टिविटी में अंतर न बताइए। हमारे सारे त्योहार धार्मिक हैं, कर्मकांडी-गैर कर्मकांडी हैं और अ-धार्मिक भी हैं। हमारी फेस्टिविटी आपको होली या दीवाली कहां नहीं दिखती, या केवल पशुओं के वध से ही वह आपको दिखेगी….’
खैर, वह बहस लंबी चली। हम जीते। तब से गंगा-जमना में टनों सीवर बहा। हम छठ करते हैं, लेकिन बिहार में गंगा के साथ, बिहार के हरेक शहर में नदियों के साथ, तालाबों के साथ जो कर रहे हैं, वह दीख रहा है।
लड़ना-झगड़ना बंद कीजिए, बच्चों और कुत्तों की तरह।
आप तूफान के केंद्र में हैं…तेरी बरबादियों के मश्वरे हैं आसमानों में……
इत्यलम्।

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