Home बाल कहानिया जब इच्छाएँ थीं तो पैसे नहीं थे, अब पैसे हैं तो वो इच्छाएँ न रहीं

जब इच्छाएँ थीं तो पैसे नहीं थे, अब पैसे हैं तो वो इच्छाएँ न रहीं

by Nitin Tripathi
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जब इच्छाएँ थीं तो पैसे नहीं थे, अब पैसे हैं तो वो इच्छाएँ न रहीं
बचपन में गाँव का मेला बहुत अट्रैक्ट करता था. वो गरम गरम चासनी से लबालब वाली जलेबी, वह पेठा, वह गन्ने का रस, वह गुड़ की पट्टी, वह मधु मक्खियों के ढेर के बीच काली काली बर्फ़ी, वह समोसे, वह घड़े के पानी वाले गोल गप्पे, वह टिक्की, खस्ते, पकौड़ी – कितना भी खा लो इच्छा तृप्त न होती थी. और जिन बड़े लोगों के साथ मेला जाओ पता नहीं उनका मन कैसे इतनी जल्दी भर जाता था.
और वह हर माल एक रुपए का वाली दुकान.
हर बार मेले में यही ख़याल आता था जब बड़ा हो जाऊँगा, इंजीनियर बनूँगा, फ़ैक्टरी से घर आऊँगा, मोटर साइकिल खड़ी करूँगा, मुहल्ले के बच्चों को मेला ले जाऊँगा और सारी चाट, जलेबी सब खा जाऊँगा. हर माल एक रुपए का वाली पूरी दुकान को अपने ट्रैक्टर पर ही रखवा कर घर ले जाऊँगा.
अब वह समय आया तो ये इच्छाएँ ही न रहीं. यद्यपि अब लूई विटान का प्रोडक्ट ख़रीद भी वह सैटिस्फ़ैक्शन नहीं मिलता जो तब पाँच रुपए में हर माल वाली दुकान से पाँच आइटम ख़रीद कर मिलता था.
बचपन में हवाई जहाज़ की यात्रा के सपने देखते थे, पिता जी समझाते कि गाँव में हवाई अड्डा कहाँ बनाया जाए तो हम मित्रों के साथ साइट भी ढूँढ लाते. और अब हवाई यात्रा से अच्छी रेल यात्रा लगती है.
पर यही लाइफ़ है. अभी भी गाँव है, मेले हैं, बच्चे हैं, उनकी अपनी अपेक्षाएँ हैं, अपने सपने हैं. थोड़ा परिवर्तन आया है, सपनों के पर लग गए हैं, हर माल दस रुपए का अब भी बच्चों को अट्रैक्ट करती है, पर अब मोबाइल गेम उससे ज़्यादा अट्रैक्ट करते हैं. ठेले वाली जलेबी और चाट अच्छे घरों के बच्चे नहीं खाते हैं अब,पर लालच उन्हें भी आता है. सुनने में आया है भविष्य में वाक़ई में लखनऊ का हवाई अड्डा गाँव के पास ही खुलेगा. अब बच्चों के सपने फ़ैक्टरी और मोटर साइकिल नहीं होते, कार दिल्ली अमेरिका होते हैं.
पर बेसिक्स वही हैं.
बचपन, उसके सपने और सपनों की उड़ान.

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