Home विषयजाति धर्म जम्मू-कश्मीर के 17 लाख बेघर लोग : 7वाँ और अंतिम भाग

जम्मू-कश्मीर के 17 लाख बेघर लोग : 7वाँ और अंतिम भाग

by Awanish P. N. Sharma
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साल 2014 में लिखी गयी 7 भागों की इस सीरीज को दोबारा आपके सामने रखते हुए आग्रह रहेगा कि इस 7वें और अंतिम भाग को जरूर पढ़िए :
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के कभी अध्यक्ष रहे वजाहत हबीबुल्ला ने विभिन्न मौकों पर कश्मीरी पंडितों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने का सुझाव जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार को दिया लेकिन राज्य सरकार ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई। पंडित कहते रहे हैं कि जिस तरह के नरसंहार से पंडितों को राज्य में गुजरना पड़ा और अल्पसंख्यक होने के नाते उनकी जो स्थिति है उसे देखते हुए उनके समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलना चाहिए था। मगर ऐसा नहीं हुआ और जम्मू-कश्मीर में आज तक अल्पसंख्यक आयोग का गठन तक नहीं हुआ है। दरअसल राज्य सरकार बहुसंख्यक आबादी को अल्पसंख्यक आयोग का गठन करके नाराज नहीं करना चाहती।
कश्मीरी विस्थापितों के नाम पर अकेले चर्चा में रहे इन पंडितों पर खुद के खिलाफ हिंसा और कत्लेआम के प्रतिकार के बजाय भागने के आरोप और नाकारा कौम की तोहमतें भी जब-तब लगती रहीं हैं। लेकिन क्या ऐसा है !
आज जब इनको घाटी में टाउनशिप देकर अन्य लोगों के साथ बसाने की एक पहल पर विरोध की आग लग जाती हो पूरी घाटी के कट्टरपंथिओं में, तब जरा ये सोचें की उसी घाटी में इस आवाज को कौन बहस में आने देना चाहेगा। कश्मीरी पंडितों के विभिन्न संगठनों की मांग है कि उन्हें कश्मीर में ही एक अलग केंद्रशासित होमलैंड का निर्माण करके बसाया जाए। इनका ये भी कहना है कि कौन कहाँ जाता है इससे हमे कोई मतलब नहीं, उन्हें कश्मीर घाटी में ही रहना है और भारत के सम्विधान के अंदर हासिल हक से ही रहना है।
कश्मीरी पंडितों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनके कश्मीर स्थित घरों को आग लगा दी गई या फिर उन्हें तोड़ दिया गया। जमीन पर स्थानीय लोगों ने अवैध कब्जा कर लिया या फिर दो जून की रोटी की व्यवस्था के लिए इन्हें उसे कौड़ियों के भाव बेचना पड़ा। नरसंहार की उस घटना के बाद अपने परिवार के साथ जम्मू स्थित रिफ्यूजी कैंप में रहने लगे लोगों के पास जो कुछ था सब पीछे छूट चुका था। न पैसे थे न रोजगार। ऐसे में अपनी जमीन बेचने के अलावा इनके पास कोई चारा नहीं था। घर का खर्च चलाने के लिए इन्हें अपनी जमीन कौड़ियों के भाव बेचनी पड़ी। खरीदने वाला भी जानता था कि ये मजबूर हैं इसलिए उसने जमीन की कीमत नहीं बल्कि सांत्वना राशि ही दी।
गाहे-बगाहे घाटी स्थित विभिन्न तबकों द्वारा कश्मीरी पंडितों की वापसी को लेकर की जाने वाली बयानबाजी पीड़ितों में किसी उत्साह के बजाय गुस्से का संचार करती है। विस्थापित कहते हैं घाटी के वे पृथकतावादी लोग हमें घाटी में वापस देखने को बेकरार हैं जिन्होंने हमारे लोगों का कत्लेआम किया, बहन बेटियों की इज्जत लूटी। इन लोगों को तो जेल में होना चाहिए था क्योंकि सब कुछ इन्हीं की देखरेख में हुआ। विश्वास की खाई कितनी गहरी है कि ये बातें अब काम की नहीं लगतीं। यह लिप सर्विस है। दुनिया को वे यह दिखाना चाहते हैं कि देखिए साहब कश्मीरी पंडितों के लिए हम घाटी में कब से पलक पांवड़े बिछाए हुए हैं। वही हैं जो आना नहीं चाहते। असली सवाल यह है कि क्या सरकार पंडितों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने को तैयार है। और फिर यह जानना भी जरूरी है कि घाटी के मुसलमान पंडितों की वापसी के लिए कितने उत्साहित हैं। क्योंकि आखिर में रहना तो उन्हीं के साथ है।
कश्मीरी पंडितों के मन में इस बात को लेकर भी पीड़ा है कि घाटी की मुस्लिम आबादी ने उस दौरान उनका साथ नहीं दिया जब उन्हें वहां से खदेड़ा जा रहा था। विस्थापित कहते हैं कि अगर कश्मीर के मुसलमान उस समय हमारे साथ खड़े होते तो किसी आतंकवादी में ये हिम्मत नहीं होती कि वह किसी कश्मीरी पंडित को चोट पहुंचाने की सोच पाता। लेकिन उन्होंने उस समय हमारा साथ देने के बजाय कट्टरपंथियों के सामने या तो शांत रहे या घुटने टेक दिए।
वर्ष 1990 में जो कुछ भी हुआ उसको कश्मीरी पंडित जेनोसाइड अर्थात नरसंहार और एथनिक क्लींजिंग का नाम देते हैं। जो हुआ वह सिर्फ कोई आतंकी घटना नहीं थी बल्कि कट्टरपंथियों की ये सोची-समझी रणनीति थी कि कश्मीर में हर उस प्रतीक को खत्म कर दिया जाए जो उनके इस्लामिक राज्य की स्थापना में बाधक हो रहा है। घटनाएं भी उनकी इन बातों की तस्दीक करती हैं। पहले उन लोगों ने पंडितों का कत्लेआम शुरू करके भय का माहौल बनाया जिससे सारे हिंदू यहां से भाग जाएं। उसके बाद उनके घरों को आग लगी दी, मंदिरों और पूजा स्थानों को तोड़ा और जलाया। ऐसा सहज ही लगता है कि कट्टरपंथी कश्मीर से पंडितों की पूरी पहचान हमेशा-हमेशा के लिए मिटाना चाहते थे। ऐसे में अगर ये कहते हैं कि जो लोग हमें वहां बुलाना चाहते हैं, वे जरा एक बार ये शोध करके यह बताएं कि आज घाटी में पंडितों से जुड़ी हुई कितनी पहचानें सुरक्षित बची हैं।
जम्मू-कश्मीर राज्य के भीतर ही उसके एक हिस्से जम्मू में सिमटे ये सभी 17 लाख विस्थापित किसी दूसरे देश या सूबे से ताल्लुक नहीं रखते। हम जिसे कश्मीर कहते हैं, ये आबादी उसी का हिस्सा है। युद्ध में जीत के बाद भी सरकारों ने अगर अपनी नीतियों के कारण जमीनें गवायीं तो उसका दर्द पूरा कुनबा एक साथ भुगतने को अभिशप्त होता है और उसे होना भी चाहिए।
क्या इन 7 खंडों में लाखों की संख्या में तफ़सील किये गए लोगों की कुल लगभग 17 लाख, आतंक और युद्ध के मारे बेघरों को, उनके अपने ही मुल्क के, अपने ही सूबे मे कैद जीवन बिताने को मजबूर नहीं किया गया है?
शायद ही दुनिया में कोई और ऐसा उदाहरण मिले जहाँ अपनी ही जन्मभूमि पर 17 लाख लोग एक क्षेत्र में कैद किये गए हों। ऐसा दुर्भाग्य से उसी देश में होता आया और मौजूद है, जहां से हमने विश्व को मानवता का सन्देश दिया। ऐसा हम कहा करते हैं।
कश्मीर समस्या का सबसे सहज और स्वाभाविक हल इन्ही 17 लाख कश्मीरी बेघर लोगों, जो जम्मू के क्षेत्र में सिमटने को मजबूर हैं- को उनके गृह प्रदेश के पूरे हिस्से में बसाने भर मिल जाने वाला है। सत्ताओं और सरकारों की बदनीयती और उलझाव के इस वर्तमान में शायद यह एक काल्पनिक बात लगे लेकिन हकीकत की जमीन पर अगर देखें तो इस आबादी के असमान फैलाव और असंतुलन को समाप्त करते हुए, सभी अपनों को अपनाते हुए, करने में.. जम्मू-कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे और उसके विवादित 370 आर्टिकल जैसे तमाम और ऐतराज वाले क़ानूनी मुद्दे कहीं बीच में नहीं आने वाले। ये आपके घर का मसला होगा।
हाँ, बीच की सबसे बड़ी बाधा होगी सहअस्तित्व में भरोसा होना और न होने का फर्क जिसे यह राज्य और ये लाखों विस्थापित बेघरों के साथ देश देख चुका है। फिर भी मन की जमीन पर दो फूल उगने की आस बनी रहे इसी उम्मीद के साथ।
#अवनीश पी. एन. शर्मा
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