Home हमारे लेखकदयानंद पांडेय दरअसल लखनऊ में रिपोर्टरों ने तो राजनीतिक

दरअसल लखनऊ में रिपोर्टरों ने तो राजनीतिक

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दरअसल लखनऊ में रिपोर्टरों ने तो राजनीतिक हलकों में काकटेली डिनर खा पी कर ऐसी ही रवायत बना दी थी। कई बार तो बिन बुलाए भी कई पत्रकार पहुंच जाते। बस उन्हें सूचना भर होनी चाहिए। और कई बार यह भी होता कि भोज पर बुला कर मेजबान राजनीतिज्ञ ख़ुद गायब रहता। क्यों कि उस का मकसद पत्रकारों की मेजबानी नहीं, उन्हें खिला पिला कर, ‘‘ओब्लाइज’’ भर करना होता।
पत्रकार भी भर पेट शराब पी कर, मुर्गा खा कर ओब्लाइज हो कर चले जाते। मान अपमान की उन्हें कोई परवाह नहीं रहती। मुख्यमंत्री या कोई मंत्री एक बार स्टेट प्लेन या हेलीकाप्टर में किसी पत्रकार को बिठा कर दो दिन घुमा लाता तो वह उस यात्रा का वर्णन तो चंदरबरदाई शैली में डट कर लिखता ही उस का आफ रिकार्ड ब्यौरा महीनों यहां वहां परोसता फिरता। पर यह सब मान अपमान तब सिर्फ रिपोर्टरों के हिस्से तक था। संपादक तबका तब तक इस नाबदान से बचा हुआ था।
पर जल्दी ही संपादकों का पतन भी शुरू हो गया। और उस बार तो हद ही तो गई। एक मुख्यमंत्री ने अपने मुख्यमंत्रित्व के एक साल पूरे हो जाने की पूर्व संध्या पर दो हिंदी और एक अंगरेजी अख़बार के तीन चुनिंदा संपादकों को भोजन पर आमंत्रित किया। तीनों संपादक समय से मुख्यमंत्री निवास पर पहुंच गए। वहां उन की बड़ी आवभगत हुई बिलकुल दामाद की तरह। तीनों संपादक गदगद ! जब बड़ी देर हो गई फिर भी मुख्यमंत्री नजर नहीं आए तो संपादक गण परेशान हुए। पूछताछ की तो पता चला कि मुख्यमंत्री जी नहीं आ पाएंगे पर आप सादर भोजन करिए। तीनों संपादकों ने बिना मुख्यमंत्री के सादर भोजन किया। और जब चलने लगे तो एक संपादक डकार ले कर आह भरते हुए बोले, ‘‘मुख्यमंत्री जी होते तो एक बढ़िया सा इंटरव्यू भी हो गया होता।’’
‘‘इंटरव्यू हो गया है न!’’ मुख्यमंत्री का एक सूचनाधिकारी अदब से बोला और बने बनाए इंटरव्यू की टाइप प्रतियां निकाल कर तीनों को एक-एक प्रति देते हुए बोला, ‘‘तीनों इंटरव्यू अलग-अलग हैं।’’ उस ने विनम्रतापूर्वक जोड़ा, ‘‘आई मीन तीनों इंटरव्यू तीन तरह के हैं। सेम-सेम नहीं हैं। तीनों के एंगिल और क्योश्चिन डिफरेंट-डिफरेंट हैं।’’ कहते हुए अंगेरेजी के संपादक जो अंगरेजों के जमाने से ही पत्रकारिता कर रहे थे, आजादी के तुरंत बाद एम॰ एल॰ सी॰ का सुख भी लूट चुके थे, जिन की अंगरेजी पत्रकारिता में बड़ी प्रतिष्ठा और धाक थी से वह सूचनाधिकारी बोला, ‘‘सर आप का आइटम अंगरेजी में ही है। हिंदी से ट्रांसलेशन वाली दिक्कत नहीं होगी।’’
मुख्यमंत्री निवास से चलते समय इन तीनों संपादकों को बने बनाए इंटरव्यू के साथ-साथ भारी डग्गा यानी भारी गिफ्ट से भी नवाजा गया और निवेदन किया गया कि ‘‘सर, कोई काम हो तो बिना संकोच आदेश करें।’’
तीनों संपादक मुख्यमंत्री निवास से खुशी-खुशी लौटे।
दूसरे दिन तीनों संपादकों के अख़बारों में मुख्यमंत्री का इंटरव्यू पहले पेज पर विथ बाइलाइन विस्तार से छपा था। वह इंटरव्यू जो इन स्वनाम धन्य संपादकों ने लिया ही नहीं था, वह इंटरव्यू जो मुख्यमंत्री ने दिया ही नहीं था, वह इंटरव्यू जो सूचना विभाग के कई सूचनाधिकारियों और संयुक्त निदेशकों ने मिल-जुल कर तीर पर तुक्का स्टाइल में तैयार किया था। वही इंटरव्यू अक्षरशः इन अख़बारों में उन के संपादकों ने अपनी-अपनी बाइलाइन के साथ खोंस दिया था।
जाहिर है संपादकों का भी अब पतन हो गया था।
अब ऐसे महौल में अगर कोई संपादक तन जाए, रीढ़ दिखाने लगे मुख्यमंत्री से तो सूचना निदेशक के लिए ‘‘मैनेज’’ कर पाना बहुत नहीं तो थोड़ा मुश्किल तो था ही। हालां कि वह सूचना निदेशक व्यवहार में शालीन, मिजाज में नफीस और ‘‘मैनेज’’ करने में ख़ासी महारत रखता था। वह था तो आई॰ ए॰ एस॰ कैडर का ही। और सीनियर भी। पर आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारियों की ऐंठ और अपने आप को ख़ुदा समझने की अकड़ उसे छूती तक नहीं थी। कम से कम अपने व्यवहार में वह इस की गंध नहीं आने देता था। पर उसकी शालीनता, नफासत और कायस्थीय कमनीयता इस संपादक को मैनेरिज्म के बावजूद मैनेज नहीं कर पा रही थी। वह संपादक की केबिन में ‘‘सर-सर’’ कहता यहां वहां फोन घुमाता रहा और लगातार यह जताता रहा कि कहीं भी मुख्यमंत्री जी मिल जाएं तो कम से कम फोन पर ही मुख्यमंत्री से संपादक को भोजन का न्यौता दिलवा दे। हालां कि संपादक उसे बार-बार बताते जा रहे थे कि, ‘‘आज तो मैं फिर भी भोजन पर मुख्यमंत्री निवास नहीं आ पाऊंगा। क्यों कि मुझे कहीं और जाना है। और कम से कम इस तरह तो कतई नहीं।’’
‘‘कल का रख लें सर !’’ सूचना निदेशक विनम्रता पूर्वक बोला।
‘‘नहीं इस तरह तो नहीं।’’ संपादक बोले।
इस बीच जाने कैसे और कहां से सरोज जी को ख़बर लग गई कि मुख्यमंत्री ने संपादक को खाने पर बुलाया है और संपादक ने जाने से मना कर दिया है। वह भागे-भागे संपादक की केबिन में घुसे और बिना किसी इधर-उधर के सीधे-सीधे प्वाइंट पर आ गए, ‘‘कहौ तो हम चले जाएं।’’ सरोज जी की बात सुन कर सूचना निदेशक बिदका। पर सरोज जी जैसे बोरिया बिस्तर बांध कर आए थे, ‘‘प्रतिनिधित्व हम कर देंगे।’’ सुन कर संपादक का चेहरा लाल हो गया। पर सूचना निदेशक के वहां होने के नाते वह कुछ बोले नहीं। लेकिन सरोज जी फिर भी चालू रहे, ‘‘कहौ तो हम चलिए जाएं।’’
‘‘पर मुख्यमंत्री जी ने एडीटर साहब को बुलाया है।’’ सूचना निदेशक ने स्पष्ट किया।
‘‘तो क्या हुआ ?’’ सरोज जी बाल हठ पर आ गए, ‘‘एडीटर के बिहाफ पर हम चले चलते हैं। बात वही भई।’’
‘‘ठीक है हम बाद में तय कर लेंगे।’’ कह कर अदब से सिर झुका कर सूचना निदेशक चला गया। उस के जाने के बाद सरोज जी भी उस के पीछे-पीछे संपादक की केबिन से बाहर निकलने लगे तो संपादक को लगा कि कहीं सरोज जी सूचना निदेशक के साथ नत्थी हो कर सचमुच ही न एडीटर के बिहाफ पर मुख्यमंत्री का भोज खा आएं! सो उन्हों ने सरोज जी को रोकते हुए कहा, ‘‘सुनिए सरोज जी !’’
‘‘हां।’’ कह कर वह ठिठक गए। बोले, ‘‘बोलौ !’’
‘‘आप मुख्यमंत्री के यहां आज एडीटर के बिहाफ पर भोजन पर मत चले जाइएगा।’’ संपादक ने जोर दे कर कहा, ‘‘और अगर जाइएगा तो इस्तीफा दे कर जाइएगा।’’
‘‘अरे, नहीं प्यारे।’’ सरोज जी बोले, ‘‘हम कवनो नादान हैं। इतनी बात तो हम भी समझते हैं। आखि़र इज्जत की बात है। और हम इस में बट्टा नाहीं लगावेंगे।’’ सरोज जी मौका नाजुक देख कर पट पैंतरा बदल गए थे, ‘‘ऊ तो हम एह मारे कहि रहे थे कि अफसर है, मुख्यमंत्री का ख़ास है, कहीं नाराज न होई जाए। और जानते ही हो प्यारे कि लाला को पचास काम पड़ते हैं मुख्यमंत्री से। इस लिए उस को खुश करने के लिए उतना कहि दिया। बस ! हम सचहूं थोड़े जाएंगे।’’ उन्हों ने जोड़ा, ‘‘आखि़र इज्जत हम हू को प्यारी है प्यारे !’’
‘‘कुछ नहीं। कोई इज्जत विज्जत नहीं प्यारी है आप जैसे लोगों को।’’ संपादक ने कहा, ‘‘आप ही जैसे लोगों ने पत्रकारों की छिंछालेदार करा रखी है। नहीं मुख्यमंत्री की इतनी हिम्मत के अपने चाकरों से भोजन के लिए हमें कहलाए !’’
‘‘घबराओ नहीं प्यारे !’’ सरोज जी उत्तेजित होने का अभिनय करते हुए बोले, ‘‘हम कल ही मुख्यमंत्री को टाइट करते हैं।’’
‘‘यह भी करने की जरूरत नहीं है।’’ संपादक बोले, ‘‘आप को तो बस मुख्यमंत्री से मिलने का बहाना चाहिए।’’
‘‘नहीं हम मुख्यमंत्री को अबकी टाइट करेंगे।’’ सरोज जी वीर रस में आ गए थे, ‘‘आखि़र हमारे संपादक की गरिमा का सवाल है प्यारे !’’
‘‘कुछ नहीं। कोई जरूरत नहीं।’’ संपादक ने कहा, ‘‘मुख्यमंत्री के एक मामूली से अफसर के आगे तो आप अभी मेरे सामने ही गिड़गिड़ा रहे थे। मुख्यमंत्री को क्या टाइट करेंगे ?’’
‘‘वह अब हम पर छोड़ौ।’’ सरोज जी बोले, ‘‘हम समझ लेंगे।’’
‘‘कहा न कोई जरूरत नहीं।’’ संपादक ने कहा, ‘‘सरोज जी किसी भी बहाने आप मुख्यमंत्री के पास नहीं जाएंगे।’’
‘‘पर संपादक की गरिमा का सवाल है प्यारे !’’ सरोज जी किसी घाघ मगरमच्छ की तरह अपनी बात पर डटे रहे।
‘‘संपादक मैं हूं। अपनी गरिमा की रक्षा करना मैं जानता हूं।’’ उन्हों ने कहा, ‘‘वह मैं कर लूंगा। आप अपनी गरिमा बचाइए। कुछ ग्रेस मेनटेन करिए सरोज जी !’’
उदास सरोज जी चुपचाप तब खिसक गए थे। सरोज जी जिन के लिए नरेंद्र जी अक्सर कहा करते थे, ‘‘सरोज जी की योग्यता कायदे से जिला संवाददाता बनने लायक भी नहीं है। पर वह किस्मत की खा रहे हैं और बरसों से राजधानी में विशेष संवाददाता बने बैठे हैं। विधान सभा, मुख्यमंत्री ‘‘कवर’’ कर रहे हैं तो कोई क्या कर लेगा ?’’ नरेंद्र जी जोड़ते, ‘‘क्या पता किसी दिन वह संपादक भी बन जाएं।’’ गरदन हिला कर वह कहते ‘‘सरोज जी की तमन्ना तो है ही संपादक बनने की।’’
एडीटर के बिहाफ पर बेहयाई और अपमानित होने की हदें लांघ मुख्यमंत्री का भोज खाने के लिए ललकने वाले वही सरोज जी एक्टिंग ही सही एडीटर बन गए थे। सरोज जी के तीन सपनों में से एक सपना आज पूरा हो गया था। सरोज जी कार्यवाहक संपादक बन गए थे और संजय से नाराज थे।
बेहद नाराज !
गंदी गोमती, गंधाते सरोज जी, विधान सभा मार्ग और ‘‘गंगा जी धीरे बहो’’ गुनगुनाता संजय। इन चारों का संयोग कहिए, दुर्योग कहिए, कोई अंतविर्रोध रच रहा था, कोई कंट्रास्ट कि कोई कोलाज गढ़ रहा था, कोलतार का बना विधान सभा मार्ग उस काली घुप अंधेरी रात में कुछ भी तय नहीं कर पा रहा था। स्ट्रीट लाइट्स भी उसे ऐसा कुछ हेर पाने में मदद देने से जैसे इंकार कर रही थीं। पर संजय था कि गुनगुनाता ही जा रहा था ‘‘गंगा जी धीरे बहो, नाव फिर भंवर में है।’’ ठहरे हुए पानी वाली गंदी गोमती की बदबूदार गंध का आदी यह विधान सभा मार्ग ‘‘गंगा जी धीरे बहो’’ का मर्म तो नहीं समझ पा रहा था पर इस गीत के दूसरे मिसरे ‘‘नाव फिर भंवर में है’’ की आंच उसे जरूर मिल रही थी, महसूस हो रही थी। जाने कैसे ? अब जब कि गोमती भंवर बिसार चुकी थी। भूल चुकी थी भंवर का भाष्य !
ठहरे हुए पानी को भला भंवर का भाष्य क्या मालूम ? भंवर का भेद वह कैसे भेदे भला ? भंवर की भावना, भंवर के स्वाद, भंवर के भ्रम में कैसे भिंगोए किसी को वह। पर विधान सभा मार्ग भंवर की आंच में भींज रहा था। आंच में भी भींजता है कोई भला ? पर विधान सभा मार्ग तो भींज रहा था। यह भींजना आंच से उपजा पसीना तो नहीं था? कि बाढ़ आ गई थी गोमती में जो वह भंवर का भाव विधान सभा मार्ग को शेयर के भाव की तरह परोस रही थी, परोस-परोस उसे भिंगो रही थी, नाव को भंवर के लपेटे में ऐसे लपेट रही थी गोया वह आग की लपट हो !
हां, यह बाढ़ ही थी।
भंवर के भाव ऐसे उछल रहे थे गोया शेयर के भाव हों।
‘‘तो ऐसे में संजय महाराज क्या किसी डॉक्टर ने प्रेसक्राइब किया है कि जान बूझ कर आप अपनी नाव भंवर के भाव चढ़ा दें ?’’ वह ख़ुद ही से पूछता है। और ख़ुद ही जवाब भी देता है कि, ‘‘हां प्रेसक्राइब्ड तो किया है।’’ वह जरा अटकता है और जोड़ता है ‘‘नियति के डॉक्टर ने। और नियति से, नियति के नियंता से मैं लड़ना नहीं चाहता।’’ जवाब उस का लंबा होता जाता है, ‘‘दरअसल नपुंसकों, कायरों और जाहिलों के आगे मैं घुटने नहीं टेकना चाहता । भले ही आज इन्हीं का समय है। और समय से भला कौन लड़ा है ? जानता हूं कि समय बड़ा हरजाई है, निर्मम है। पर मैं एक बार समय से भी लड़ लूंगा। यह जानते हुए भी कि समय से हर कोई हारा है। हो सकता है मैं भी हारूं। हो सकता है मैं जीतूं भी। समय से न सही, इस समय के नपुंसकों, कायरों, जाहिलों, कुटिलों और धूर्तों से तो जीतूंगा ही। हो सकता है इन से भी हार जाऊं। हो सकता है मेरी नाव को भंवर लील ले, उबरने न दे। पर मैं उबर भी न पाऊंगा इस की गारंटी देने वाला भंवर भी कौन होता है ? ताकतवर भंवर होगा तो वह हमें लील जाएगा। मुझ में शक्ति होगी, युक्ति होगी तो मैं उबर जाऊंगा। और यह भंवर भी भला कौन बारहमासी है। ठहरे हुए पानी में भटक कर बाढ़ के सिर आया हुआ भंवर ! कितने देर रहेगा ? एक दिन पानी फिर ठहरेगा, भंवर का भाव भहरा जाएगा। हां, उस के बाद जो सड़न, बदबू और उस की बयार बहेगी वह जरूर मार डालने वाली होगी। बचने की जरूरत इसी से है।’’
‘‘पर वह बचे कैसे ?’’ वह खुद ही पूछता है, ‘‘कोई कार्य योजना है क्या ?’’
‘‘कोई कार्य योजना तो नहीं है।’’ वह ख़ुद को जैसे जवाब देता है, ‘‘पर एक सूत्र है। जिसे वह अपनी रिपोर्टिंग में अकसर आजमाता रहा है कि आंख, कान और दिमाग खुले रख कर पानी की तरह जाना और पानी की तरह आना, साथ में अमृत-विष, हीरा-मोती, कूड़ा-कचरा, अच्छा-बुरा जो भी तथ्य मिले बहा लाना और सब को सलीके से परोस देना। तो वह पानी बन कर लड़ेगा भी।’’ वह फिर जोड़ता है ऐसे जैसे ख़ुद को टोकते हुए, खुद को टटोल रहा हो, ‘‘और पानी ! पानी तो बड़े घमंड से खड़े पहाड़ की छाती भी चीर कर बहता हुआ जमीन पर आ जाता है सब को जीवन देने। और जीवन दे कर बहते-बहते नदी बन समुद्र में समा जाता है।’’
‘‘तो क्या वह भी समुद्र में समा जाएगा ?’’ उस का यह सवाल खुद उस में जाग जाता है। और इस सवाल का अर्थ, उस की ध्वनि गुम होने लगती है।
इस सवाल का शोर, संजय के भीतर इतना ज्यादा है कि इस की गूंज के आगे खुद को वह निरुत्तर पाता है !
जाने यह भंवर के भय का शोर है, कि समुद्र में समा जाने का संशय है, कि समय की आग में स्वयं को सुलगाने का संकट ?
समय, स्वयं, शोर और सुलगन ! शायद सभी हैं।
वह खुद को चेतावनी देते हुए बताना भी चाहता है कि सिगरेट के साथ सुलगने और समय के साथ सुलगने की दुश्वारी, उस का फर्क और परिणाम भी वह सोच ले !
कि समय आखि़र समय है और सिगरेट सिर्फ सिगरेट ! समय सिगरेट नहीं है। और सिगरेट समय नहीं है।
समय का यह सवाल उसे साल रहा है, उसे बेध रहा है। इतना कि क्षण भर को लगता है वह बधिर हो जाएगा। स्कूटर रोक कर उस ने सिगरेट सुलगा ली है। वह सुलगने लगा है। पर राह नहीं मिलती।
शराब मिलती है।
प्रेस क्लब में बैठा वह शराब पी रहा है। अब शराब है, सिगरेट है, थकन है, वह है, पर सुकून नहीं है। साथ में प्रकाश बैठा है। रूमाली रोटी और कबाब खाते हुए वह लड़के को बिरयानी लाने की हांक देता है। सामने कुछ पत्रकार जुआ खेल रहे हैं। कुछ जुआ खेलते-लोगों को देख रहे हैं। कुछ ऊंघाए, कुछ उनींदे, कुछ ऊबे बैठे टी॰ वी॰ देख रहे हैं। पर ज्यादातर के हाथों में सिगरेट और शराब है।
तो क्या यह सब भी सुलग रहे हैं ? सिगरेट की तरह, भींगी हुई लकड़ी की तरह कि संजय की तरह ?
जानना मुश्किल है। क्यों कि यह सभी पत्रकार हैं। और पत्रकार दूसरों का तापमान तो बता सकते हैं, पर अपना नहीं बताते। और उन का तापमान कोई नोट भी करे यह उन्हें कुबूल नहीं है। दूसरों को शीशा दिखाने वाले ये लोग खुद शीशा देखना गाली समझते हैं। सब की तकलीफ सुर्खियों में बताने वाले ये लोग अपनी तकलीफ से आंख मूंद उस पर परदा डाले रहते हैं। और सुलगते रहते हैं। बिना धुएं के। ऐसे कि जैसे कोई देखे नहीं और न ही पूछे कि, ‘‘ये धुआं कहां से उठता है ?’’
सुलगना, बिन धुएं के सुलगना जैसे उन की नियति हो !
प्रेस क्लब में बैठ कर शराब पीने, जुआ खेलने का सबब तो समझ में आता है पर ये उनींदे, उंघाए, ऊबे बैठे टी॰ वी॰ देखने वाले पत्रकारों का क्या किया जाय ? क्या यह घर में टी॰ वी॰ नहीं देख पाते, घर में नहीं सो पाते जो मुंह उठाए प्रेस क्लब चले आते हैं। वह यह सब अभी सोच ही रहा होता है कि प्रकाश कहता है, ‘‘अब तुम लइया चना मंगा लो। मेरे पास पैसे नहीं हैं।’’
‘‘रुको अभी मंगा लेना।’’ संजय टालता हुआ बोला, ‘‘बिरयानी खाने के बाद लइया चना का क्या मतलब ?’’
‘‘मतलब है।’’ बोतल दिखाता हुआ प्रकाश बोला, ‘‘अभी चार-पांच पेग बची है आखि़र खींचोगे कैसे ?’’
‘‘सिगरेट से ही सही।’’ संजय बोला, ‘‘पर लइया चना रहने दो।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘बल्कि कबाब या बिरयानी ही मंगा लो।’’
‘‘टेट में पैसे हैं ?’’ प्रकाश बौखलाया, ‘‘अच्छा चूतिया हूं। दारू भी पिलाओ और बिरयानी, कबाब भी खिलाओ। चने नहीं खाएंगे। वाह !’’ वह नया पैग बनाते हुए बोला, ‘‘तुम भी अपनी ख़त्म करो।’’
‘‘चलो आज तुम भी झेलवा लो।’’ कहते हुए संजय ने एक लंबा घूंट भरा और गिलास ख़ाली कर दी।
‘‘हां, सुना आज तुम ने सुबह सरोज के साथ पंगा ले लिया ?’’ शराब की चुस्की लेता हुआ प्रकाश बोला।
‘‘मैं क्यों पंगा लूंगा ?’’
‘‘त्रिपाठी जी बता रहे थे।’’ प्रकाश बोला।
‘‘असल में सारी आग त्रिपाठी की ही लगाई हुई थी।’’
‘‘त्रिपाठी को क्या पड़ी है ?’’
‘‘पता नहीं।’’ संजय सिगरेट का धुआं फेंकता हुआ बोला, ‘‘पर मेरे आने के पहले ही दिन से मेरे पीछे पड़ा है। एक से एक चालें, एक से एक बिसातें बिछाता रहता है।’’ संजय रुका और बोला, ‘‘पर मुझे परवाह नहीं। उस जैसे लोग मेरा कुछ भी नोच नहीं सकते।’’
‘‘वो तो ठीक है।’’ प्रकाश बोला, ‘‘पर वह है चाणक्य बुद्धि का। और फिर सरोज से तुम्हें नहीं भिंड़ना चाहिए था। आफ्टर आल वह अब तुम्हारा एडीटर है।’’
‘‘मेरा एडीटर कैसे हो जाएगा !’’ संजय खीझा, ‘‘वह बनिये कि अख़बार का एडीटर हो तो हो। मेरा एडीटर नहीं हो सकता। मैं उसे एडीटर नहीं मान पाता।’’
‘‘वो तो ठीक है।’’ प्रकाश बोला, ‘‘एडीटर नहीं मानो न सही पर पंगा लेना जरूरी था ?’’

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