Home लेखकBhagwan Singh पुराणों का सच भाग – 5

पुराणों का सच भाग – 5

by Bhagwan Singh
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पार्जिटर ने अपनी विफलताओं के बाद भी कुछ प्रश्न ऐसे उठाए हैं, जिनको उस दबाव से बाहर रख कर समझें, जिसमें वह काम कर रहे थे, तो भारतीय इतिहास की अधिक गहरी समझ पैदा होती है। इतना ही नहीं, दूसरे स्रोतों से उपलब्ध जानकारी की तुलना में पौराणिक संकेत अधिक भरोसे के सिद्ध होते हैं। उदाहरण के लिए, इतिहासकारों ने भारतीय समाज को तीन प्रमुख वंशों में बांट रखा है। सभ्यता के निर्माण और प्रसार का श्रेय वे आर्य जनों को अथवा उनका निषेध करते हुए द्रविड़ जनों को देते रहे हैं। ये हैं कोल/मुंडा, द्रविड़ और आर्य। परंतु इनमें से किसी को भारत का मूलनिवासी नहीं माना जाता रहा है। यह औपनिवेशिक जरूरतों और गोरी नस्ल की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए तैयार किया गया अर्ध सत्य था और इसी को प्रामाणिक इतिहास बना कर शिक्षा संस्थाओं में पढ़ाया और दुहराया जाता रहा है। इस नकली इतिहास से वे मौन और मुखर दोनों रूपों में यह संदेश देते रहे हैं कि इस देश का मूलनिवासी कोई नहीं है। जो इसे जीतता रहा है वही इस पर राज्य करता रहा है। यह तर्क बाहरी देशों से अपनी जन्मकुंडली मिलाने वालों को भी रास आता रहा है। शिक्षा का, अर्थात् भारतीय चेतना के निर्माण का दायित्व उन्हें ही सौंप दिया गया था इसलिए स्वतंत्रता के बाद भी उसी औपनिवेशिक राग को अंतर्राष्ट्र दुहराया जाता रहा। इसका सार सत्य यह है कि भारतीय भूभाग और जलवायु में ऊर्जा और ओजस्विता घट जाती है और इसलिए इस पर सदा से आक्रमणकारियों का राज रहा है, जो भी कुछ समय के बाद अपनी ओजस्विता खो देते रहें, इसलिए भारतीयों के बस में कुछ नहीं है। राष्ट्रीय मनोबल को कुचलने का इससे बड़ा षड्यंत्र नहीं हो सकता था। इसे प्रगतिशीलता और सेकुलरिज्म का नाम दे कर श्लाघ्य बना दिया गया था, और वामपंथी अंतर्राष्ट्रवाद को भी यह रास आता था। इसको तोड़ने के लिए प्रमाणों और तर्कों के साथ खंडन किया जाए, तो उस मानसिकता में ढले हुए भारतीय सबसे पहले उत्तेजित होते और प्रस्ताव का खंडन न कर पाने की स्थिति में राष्ट्रवादी, दक्षिणपंथी यहां तक की संप्रदायवादी घोषित करने की चेष्टा करते रहे हैं। इसका दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि जब यही चुनौती अंग्रेजी में दी जाए ओर पश्चिमी देशों के विद्वान कोई, अन्य चारा न देख कर अपनी पुरानी मान्यता में सुधार करने पर और अपनी रही सही साख बचाने के लिए स्वयं भी पुरानी मान्यता को खारिज करने लगते हैं, उसके बाद इन मार्क्सवादी विद्याधरों की अकड़ कम होती है। अर्थात् बौद्धिक रूप में आज हम पहले से अधिक गुलाम ही नहीं है, स्वतंत्रता की इच्छाशक्ति तक खो चुके हैं। यह उसी शिक्षापद्धति की देन है।
पुराणों से जो चित्र उभरता है वह भले ही धुंधला हो, उसमें कई तरह की मिलावट भी हो, परंतु इससे अन्य स्रोतों की तुलना में अधिक विश्वसनीय इतिहास सामने आता है। इसके लिए हमें पुराणों की अंतःसंगति को पहचानना होगा। हम पार्जिटर के हवाले से अपनी बात इसलिए कह रहे हैं कि उन्होंने सभी पुराणों और यथासंभव दूसरे पौराणिक स्रोतों का हवाला देते हुए अपनी बात कही है, और इस तरह वह हमारे काम को आसान बनाते हैं। यूं तो उन्होंने मध्य हिमालय के उत्तर से ऐलों या आर्यों के पुराने आक्रमण की बात की है, परंतु यह उनकी कल्पना की उपज है। वह स्वयं स्वीकार करते हैं पुराणों में ऐसा कुछ नहीं है।(इन निष्कर्षों को वंशावली या पुराणों में कहीं भी सामने नहीं रखा गया है।. 301) हां, कहा यह गया है कि पूरी धरती पर ययाति के पांच पुत्रों के वंशधरों का आधिपत्य है परंतु ना तो इसका सिरा मिलता है न ही पुछल्ला (सच है, यह कहा जाता है कि ययाति के वंशजों की पांच जातियों में पृथ्वी का प्रभुत्व था, लेकिन इस कथन का जातीय महत्व कहीं नहीं देखा गया है, और उन लोगों को कोई पूर्वता नहीं दी गई है।.) परंतु इसकी जरूरत भी नहीं है। इस कन्फ्यूजन का अपना सच यह है कि भारतीय पौराणिक स्मृतिलोक में यवनों (ग्रीकों), हूणों, चीनों (तुषारों ), दरदों के आक्रमण से पहले के किसी बाहरी आक्रमण की याद नहीं है परंतु इस बात की याद है, कि पूरी दुनिया को भारतीय पुरुखों की संतानों ने आबाद किया है। इसकी पुष्टि महान इतालवी भाषा विज्ञानी Alfredo Trombetti ने अपनी पुस्तक L’unità d’origine del linguaggio, 1905 में भी की है:
अत्यंत विस्तृत और विस्तृत अध्ययन के आधार पर, ट्रोम्बेटी ने एक योजना तैयार की जिसमें व्यापक और व्यापक समूह और भाषाओं के परिवार शामिल हैं, जो अंकों, सर्वनाम रूपों और इसी तरह की जीवित समानताओं का उपयोग करते हैं। ऐसे संरचनात्मक शब्द अपने रूप में रूढ़िवादी होने के लिए उपयुक्त हैं, और ज्यादातर मामलों में वे एक भाषा से दूसरी भाषा से आसानी से उधार नहीं लिए जाते हैं। उन्होंने ऑस्ट्रो-एशियाई समूह के सूडानी-बंटू और मुंडा-खमेर में अंकों के बीच समानताएं दर्ज कीं; हैमिटिक-सेमिटिक, द्रविड़ियन, मुंडा और पॉलिनेशियन में सर्वनामों के बीच; इंडो-चाइनीज और यूरालिक में अंकों के बीच(वह कहते हैं “यूराल-अल्ताइक”); डकोटा (अमेरिकी भारतीय) और जॉर्जियाई (कोकेशियान क्षेत्र में) में क्रियाओं के बीच। उन्होंने देखा कि भारत में अपने केंद्र वाले एक विशाल वृत्त की परिधि पर सबसे व्यापक रूप से अलग-अलग समूहों के बीच सबसे बड़ी समानताएं पाई जानी हैं। इसलिए उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि भारत सभी जातियों के साथ-साथ सभी भाषाओं के लिए घर और प्रारंभिक बिंदु था। यह सच है कि ट्रोम्बेटी कुछ आश्चर्यजनक समानताएं पैदा करता है। लेकिन जब कोई भाषा की महान गतिशीलता पर विचार करता है: परिवर्तन और परिवर्तन के लिए इसकी प्रवृत्ति। (मार्गेट श्लॉ, गिफ्ट ऑफ टंग्स, 1949, पी।
इंटरनेट के माध्यम से जो लेख देखने में आए उनमें इरादतन भारत की केंद्रीयता के पक्ष को गोल कर दिया गया है जो सचेत रूप में त्रांबेत्ती के मंतव्य की हत्या मानी जाएगी:
(उन्होंने सभी भाषाओं के मोनोजेनेसिस, या सामान्य उत्पत्ति की परिकल्पना तैयार की, जो उनके तर्क को व्याकरणिक रूपों में शब्दावली और पत्राचार में व्यापक समानता पर आधारित है। अपर्याप्त तुलनात्मक तरीकों ने ट्रोम्बेटी को उनके प्रस्तावित वंशावली वर्गीकरण या मोनोजेनेसिस की उनकी परिकल्पना को साबित करने से रोका; हालांकि, उनके द्वारा एकत्र की गई सामग्री में कई सहसम्बन्ध हैं जो आगे के अध्ययन और सत्यापन के योग्य हैं।) श्रेणी में I पुस्तक ल’यूनिटा डी’ओरिजिन डेल लिंगुआगियो, 1905 में प्रकाशित हुई)
त्रांबेत्ती के निष्कर्षों को न तो माना गया नहीं खारिज किया गया। वास्तव में वह भाषा की उत्पत्ति पर विचार कर रहे थे, जिसके पीछे यह समझ काम कर रही थी कि जैसे दूसरे सभी प्राणियों की आवाज एक जैसी होती है उसी तरह आरंभ में मनुष्यों की बोली भी एक जैसी ही रही होगी जिसमें दूरियां बाद में पैदा हुईं। इसका हमारा समाधान भिन्न है जो आगे चल कर पुस्तकाकार आएगा। वह एक मूलीयता के सिद्धांत के जनक न भी माने जाएं तो
नॉस्ट्रेटिक [एक प्रस्तावित भाषा सुपरफ़ैमिली जिसमें इंडो-यूरोपियन, एफ्रोएशियाटिक, द्रविड़ियन, यूरालिक और अल्टाइक परिवार शामिल हैं।]
के पूरक तो हैं ही। न तो उनके विचारों को सही पाया गया, न ही नास्त्रातिक की परिकल्पना को। इनका समाधान भारतीय पुराण कथाओं से होता है।
विगत हिम युग के दौरान दुनिया के लगभग सभी प्रजातियों के जत्थे प्राणरक्षा के लिए भारत में एकत्र हो गए थे और अपने पुराने अटन क्षेत्र को मुग्ध भाव से याद करते थे, जैसा ठंढे भूभागों के लोग भारत की झुलसाने वाली गर्मी और सड़ाने वाली आर्द्रता, मच्छरों मक्खियों सरीसृपों की असंख्य प्रजातियों वाले पर्यावरण से घबराने पर करते रहे हैं। उन्हें अपनी साइबेरियाई भूमि स्वर्ग प्रतीत होती थी, जैसा कि भारत की संपन्नता के कारण आगे चल कर भारत प्रतीत होने लगा। हजारों साल तक एक दूसरे से मिलते और टकराते, छिपते-बचते जीवित रहे थे और ऊष्म या राहत का दौर आने पर भारतीय भूभाग से उनके अनगिनत जत्थे सभी देशों और दिशाओं में फैले। पूरे भारत में कभी कोई एक भाषा नहीं बोली जाती थी। असंख्य भाषाएं थीं। फिर भी हजारों साल के कलह और अपनापे के अनुभवों के कारण, भारत के सभी नर यूथों का विविध रूपों में मेल मिलाप होता रहा और उस प्राचीन काल में भी कुछ तत्व ऐसे विकसित हो चुके थे जिन्हें केवल भारतीय कहा जा सकता था और इन्हीं की सभी दिशाओं में व्याप्ति के आधार पर त्राम्बेत्ती ने अपने निष्कर्ष निकाले थे, और इन्हीं की सुनी सुनाई कहानियों के आधार पर पुराणकारों ने ययाति की पांच संतानों से पूरी धरती हावी होते दिखाया था। ठीक इसी तरह का दावा असुर कहानी में भी किया गया है। अर्थात् बहुत प्राचीन काल से ही कृषि, बागवानी, पशुपालन, जल प्रबंधन और भूसंपत्तियों के उपयोग का ज्ञान विश्व को भारत से बाहर जाने वाले लोगों के माध्यम से हुआ। ईरानी स्रोत क्या कहते हैं? उनके आदि पुरुष (यम या जमशेद), समस्त ज्ञान विज्ञान और कलाओं के साथ आए और उन्हें शिक्षित और प्रशिक्षित किया।
यह हर जगह “पहले वाले” –Arb का कार्य है। अल-आवा-इल – सभी कल्पनीय चीजों को सिखाने के लिए, और यम की दिवंगत कथा में, जैसे। थालीबी यम – जमशीद, हथियारों, काठी, लगाम, अन्य औजारों और औजारों का निर्माण, रेशम, लिनन और कपास की कताई और बुनाई, पूरी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, पत्थरों की उत्खनन और चिनाई, चाक और सीमेंट बनाना सिखाता है, वास्तुकला, हाइड्रोलिक पहियों और मिलों, पुल निर्माण, खनन, इत्र, फार्मास्यूटिक्स, दवा, जहाज निर्माण, और मोती मत्स्य पालन। (ईनस्ट हर्ज़फेल्ड, जोरोस्टर एंड हिज़ वर्ल्ड, 1947, खंड 1, पृ. 330)
ध्यान दें कि ईरान, सुमेर, अरब, मिस्र, मिनोआ, ग्रीस सभी की पुराण कथा में अपने अपने ढंग से यह दर्ज है कि सभ्यता का प्रचार करने वाला पुरुष या समुदाय कहीं अन्यत्र से सभी कलाएं और ज्ञान विज्ञान लेकर आता है और वहांं सभ्यता का उदय होता है, दूसरी ओर भारतीय परंपरा है जो कहती है कि सभ्य लोग यहां से दुनिया को शिक्षित सभ्य बनाने के लिए लोग गए (पिछली पोस्ट में उद्धृत ऋचा)। समस्या के समाधान के लिए इससे अधिक प्रामाणिक दूसरी कोई दलील नहीं हो सकती जिसमें पक्ष और विपक्ष दोनों में मुहर और उसकी छाप जैसी समानता है ।
भारतीय स्रोत केवल यह दावा नहीं करते हैं कि यहां से विश्व को आबाद करने/ जीतने या सभ्य बनाने और शिक्षित करने के लिए लोग बाहर गए, बल्कि भूभौतिक यथार्थ इसकी पुष्टि करता है कि सभ्यता की नीव यहां पड़ी, आगे का क्रमिक विकास यहीं जारी रहा है और इसमें किसी एक जाति का महत्त्व किसी दूसरे से अधिक नहीं है, क्योंकि भाषाओं से लेकर खानपान तक के स्तर पर पूरे भारत में भिन्नता में ऐसी समानता दिखाई देती है जो हजारों साल पहले की साझेदारी की पुष्टि करती है। सम्मिश्रण इतना गहरा कि यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन किसकी संतान है और इसलिए भारतीय पौराणिक साहित्य में बार-बार एक ही पिता की संतानों से सभी जातियों की उत्पत्ति दिखाई जाती है।
पार्जिटर इसे देख कर उलझन में पड़ जाते हैं। वह एक मूल को तोड़ कर अलग रेसों (वंशों) की उद्भावना साक्ष्यों के विरुद् करते हैं। पर नए पुराने का घालमेल करते हुए पहुंचते कहां हैं:
तो ऐसा कहा जाता है, ययाति के वंशजों (वंश) में पृथ्वी का प्रभुत्व था। यह परिणाम भारत के आर्यों के कब्जे से बिल्कुल मेल खाता है, इसलिए जिसे हम आर्य जाति कहते हैं, वही भारतीय परंपरा ऐला जाति कहलाती है, और इसलिए ऐला = आर्यन। सौद्युम्न जाति निस्संदेह मुंडा जाति और इसकी शाखा पूर्व में सोम-खमेर लोक होगी; और बीच के क्षेत्र में यह अनावा के कब्जे से, और समुद्र से नए लोगों द्वारा बंगाल के पूर्व आक्रमण द्वारा भी अधीन हो गया होता यदि इस तरह के आक्रमण का उपरोक्त अनुमान सही होता। उपरोक्त तीन राज्यों सहित शेष भारत पर कब्जा करने वाले मानव स्टॉक, स्वाभाविक रूप से खुद को द्रविड़ घोषित करने के लिए प्रतीत होता है। 295
कोलों को वह द्रुह्यु कुल के भरत से जोड़ते हैं:
इस (द्रुहु) वंश के महान राजा मारुत्त (जिन्हें मत्स्य गलत तरीके से भरत कहते हैं) का कोई पुत्र नहीं था और उन्होंने दुष्यंत पौरव को गोद लिया था, और इस प्रकार यह रेखा पौरव वंश में विलीन हो गई, जैसे कि ब्रह्माण्ड, वायु, ब्रह्मा और हरिवंश घोषित करना। फिर भी यह जोड़ा जाता है कि इस रेखा से या दुष्यंत से एक शाखा थी जिसने पांड्य, कोला, केरल, और सी के राज्यों की स्थापना की थी। दक्षिण में। रेखा इस प्रकार खड़ी है, बहुत संक्षिप्त है – तुर्वसु, वाहनी, गर्भ, गोभानु, त्रिशनु, करंधमा, मरुत्त, दुष्यंत, सरुथा (या वरुथा), अंदिरा; और पंड्या, केरल, कोला और कुल्या (या कोला)। 106-8.
अब हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं रक्त के आधार पर भारतीय समाज को समझा ही नहीं जा सकता, सभी जनों के रक्त सभी में मिले हुए हैं और इस दृष्टि से उत्तर और दक्षिण का फर्क टिक नहीं पाता। यही निष्कर्ष जीनोम अध्ययनों से भी निकलता है। आर्य नाम की कोई जाति नहीं। द्रविड़ नाम की कोई जाति नहीं है। यह शब्द तमिल के लिए संस्कृत के विद्वानों द्वारा गढ़ा हुआ है। मुंडा, कोल, मग, सक, कस, आदि असंख्य जाति वाचक संज्ञाए हैं और ये उत्तर से लेकर दक्षिण तक बिखरी रही है और इन्हीं के समायोजन से भारतीय सभ्यता का उत्थान हुआ है। यही हमारे भाषाई अध्ययन और स्थान नामों के अध्ययन का निचोड़ भी है।

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