Home विषयभारत निर्माण बुंदेलों-हरबोलों के मुंह से विकास की नई कहानी

बुंदेलों-हरबोलों के मुंह से विकास की नई कहानी

by Awanish P. N. Sharma
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बुन्देलखण्ड एक्प्रेसवे निर्माण के इस रिकॉर्ड समय की लक्ष्य प्राप्ति के लिए निर्माण प्रकल्प यूपीडा और उसके मुखिया “मेट्रो मैन” की तर्ज़ पर “एक्प्रेसवे मैन” कहलाने के योग्य हैं।

 

रामचरित मानस के रचियता गोस्वामी तुलसीदास का मन जब व्याकुल हुआ तो विनय पत्रिका में उन्होंने ‘हारे मन अब चित्रकूटहि’ लिखकर राम की तपोभूमि का बखान किया था। मुगल शासक अकबर के नौ रत्नों में से एक रहीम ने ‘चित्रकूट में रम रहे रहिमन अवध नरेश, जापर विपदा पड़त है, सोई आवत यह देश’ की रचना की थी। भगवान राम ने अपने चौदह वर्ष के वनवास का सर्वाधिक समय चित्रकूट में ही बिताया था। चित्रकूट से करीब 15 किलोमीटर दूर भरतकूप इलाका भगवान राम और उनके छोटे भाई भरत के बीच बने स्नेह के बंधन की पौराणिक स्मृतियां संजोए हुए है। कुछ ऐसे ही बंधन से बंधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्ययमंत्री योगी आदित्यनाथ की जोड़ी आज से अट्ठाइस महीने पहले यानी 29 फरवरी 2020 को भरतकूप के इसी इलाके के गोंड़ा गांव में बुंदेलखंड विकास की एक नई दास्तान लिखने को मौजूद थी।
एक जिला-एक उत्पाद योजना के स्टॉल देखने के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के चित्रकूट के प्रसिद्ध लकड़ी के खिलौने के स्टाल पर पहुंचे। उन्होंने स्टाल पर रखी लकड़ी की एक गेंद को उठाकर हाथ से दबाया. ‘अरे, यह तो बहुत अच्छा है.’ कहकर प्रधानमंत्री मोदी ने स्टाल पर मौजूद कारीगरों से इसके बारे में जानकारी ली और अगले करीब 15 मिनट बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे ही बटन दबाकर बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे योजना की शुरुआत की, तमाम कारीगरों सहित जनसभा में मौजूद हजारों लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। मानो चित्रकूट के विश्वप्रसिद्ध लकड़ी के उत्पाद भी चहक के कह रहे हों “बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे बन जाने से काठ के हाथी-घोड़े भी अब रफ्तार भरेंगे।” भरतकूप (चित्रकूट) से शुरू होने वाला 296 किलोमीटर लंबा बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे बांदा, महोबा, हमीरपुर, जालौन, औरेया होते हुए इटावा के कुदरैल गांव के पास आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे से जुड़ रहा है। करीब 15 हजार करोड़ की लागत से मात्र 28 महीनों में बनकर तैयार होने वाला यह एक्सप्रेसवे आज बुंदेलखंड की ‘लाइफ-लाइन’ के रूप में साकार है।
बुंदेलखंड के जंगली इलाकों की वनवासी महिलाओं की जुबान से अनायास यह कहावत निकल जाती है ‘गगरी न फूटे, चाहे खसम मर जाए।’ यानी पानी से भरी गगरी न फूटे भले ही पति मर जाए। पानी की भीषण किल्लत को बयां करती यह कहावत बुंदेलखंड के पिछड़ेपन को भी दर्शाती रही है। आज उत्तर प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार की हर घर पीने के पानी योजना को पाइपलाइन बिछा कर घर-घर जमीन पर उतार रही है।  बुन्देलखण्ड एक्सप्रेसवे अपने साथ ही देश का दूसरा विशाल डिफेंस कॉरिडोर की सौगात लेकर आ रहा है जो एक्प्रेसवे की रफ्तार को उत्पादन की रफ्तार से जोड़ते हुए हर स्तर के रोजगार और आर्थिक तरक्की के तमाम अवसर इस क्षेत्र को देने वाला है। चित्रकूट के घाट से दिल्ली जमुना घाट तक की दूरी महज 6 घण्टों में पूरा कराने की रफ्तार बताती है कि बुन्देलों की इस धरती को विकास की कैसी गति मिलने जा रही है।
आजादी के 75 सालों के बाद भी बुंदलेखंड को मिला तो महज राजनीतिक दिलासाएं। बुंदेलखंड अपनी सांस्कृतिक विरासतों से हमेशा लबरेज रहा। ऐसा नहीं था कि बुंदेलखंड के पास अपने लिए कुछ नहीं था मगर संसद और विधानसभाओं में बैठे लोगों ने सिर्फ इसका सीना चीरा। देश और विदेश में बुंदलखंड की सुर्खियां बनी तो इस कारण कि यहां पर किसान आत्महत्याएं हुईं, यहां पर दहेज के लिए बेटियों को मारा गया, यहां पर किसान का परिवार घास की रोटी खाने को मजबूर हुआ। खनन की खान से लेकर खेती की उर्रवक जमीन भी इसके नसीब में लिखी रही। आज एक सुखद तस्वीर सामने आ रही है। इस तस्वीर को देखकर यहां के मुरझाएं चेहरों में एक मासूम मुस्कराहट दिख रही है।
निश्चित ही बुन्देलखण्ड एक्प्रेसवे निर्माण के इस रिकॉर्ड समय की लक्ष्य प्राप्ति के लिए निर्माण प्रकल्प यूपीडा और उसके मुखिया अवनीश कुमार अवस्थी “मेट्रो मैन” की तर्ज़ पर “एक्प्रेसवे मैन” कहलाने के योग्य हैं।  बुंदेलखंड में शुरू हुई करीब 60 हजार करोड़ रुपयों की तमाम योजनाएं साकार होने के बाद बुंदेलों-हरबोलों के इस पिछड़े इलाके में एक नया विकास-गीत लिखेंगी।

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