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भारतीय माताओं-पिताओं से बड़ा कम्युनिस्ट कोई नहीं

Vivek Umrao

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
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ढाई-तीन साल की उमर से ही बच्चों को स्कूल में ठेल दिया जाता है। इन छोटे बच्चों के स्कूलों में भी थोड़ा बहुत दिखावटी उट-पटांग खेलना जैसा होता है, पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है। होमवर्क दिया जाता है, बहुत माता-पिता तो ट्यूशन तक लगा देते हैं। किंडरगार्टन के भी पहले से बच्चों का भयंकर शोषण शुरू हो जाता है। जो माता पिता जितना बड़ा शोषक उसे उतना प्रगतिशील, प्रतिबद्ध व जागरूक माता पिता माना जाता है।
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छोटे बच्चों की बात फिलहाल छोड़ देते हैं। बात करते हैं आठवीं के बाद के बच्चों की। बच्चा स्कूल में काम करता है, स्कूल में घर के लिए होमवर्क दिया जाता है, ट्यूशन पढ़ता है, सेल्फ-स्टडी करता है।
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स्कूल 6 दिनों के लिए होते हैं।
स्कूल में लगभग 6 घंटे काम करता है।
कम से कम 2 घंटे होमवर्क करता है।
कम से कम 1.5—2 घंटे ट्यूशन करता है।
लगभग 4-5 घंटे सेल्फ-स्टडी करता है।
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रविवार को व छुट्टियों में तो अधिक काम करना पड़ता है। ढेरों शार्ट-टर्म कैप्सूल कोर्स करवा दिए जाते हैं, शार्ट टर्म कोचिंग सेंटर्स में ठेल दिया जाता है। इसके अलावा छुट्टियों के सदुपयोग के नाम पर या रिवीजन के नाम पर स्कूल के 6 घंटों से अधिक का वजन लाद दिया जाता है। छुट्टियों के लिए स्कूल से भारी भरकम होमवर्क मिलता है, वह अलग। ऐसा ही और भी बहुत कुछ।
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यदि सब कुछ जोड़-जाड़ दिया जाए तो 15-16 घंटे प्रतिदिन का काम बच्चे को करना पड़ता है (माता पिता ज्यादे प्रगतिशील व जागरूक हुए तो यह 18 घंटे तक भी हो सकते हैं)। माता पिता के ताने या चासनी का फर्जी आवरण ओढ़ा कर दी जाने वाली प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष समझाइश अलग से (प्रवचन कहिए, इमोशनल ब्लैकमेल कहिए या माता पिता का तथाकथित अनुभव का साझा करना कहिए), सब अलग से बोनस के तौर पर।
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छोटी सी आयु से ही हम अपने बच्चों को ट्रेन कर रहे होते हैं कि शोषण कैसे करवाना है। पहले जो माता पिता मार-पिटाई करते थे उनको अच्छा माना जाता था, अब थोड़ा मामला बदल गया है जो माता पिता मार-पिटाई करते हैं, उनको बुरा माना जाता है। जो माता पिता बिना मार-पिटाई के शोषण कर लें उनको प्रगतिशील व विचारशील व क्रांतिकारी माना जाता है। माता पिता के दोनों ही प्रकारों में बच्चों का शोषण करने के चरित्र में कोई खास अंतर नहीं है, अंतर है तो केवल हिंसा करने के चरित्र में।
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जो माता पिता अधिक महात्वाकांक्षी हुए या जिनकी अपनी छिपी हुई लिप्साएं अधिक हुईं, ऐसे माता पिता तो अपने बच्चों को तो बहुत ही अधिक रगड़ देते हैं। खुद जब बच्चे, खुद जब छात्र थे तब अय्याशी किए होते हैं, लेकिन पैरेंटिंग के स्वयंभू विशेषज्ञ बन जाते हैं। अपने छात्र जीवन की झूठी कहानियां अपने बच्चों को बताते हैं ताकि बच्चों की दृष्टि में आदर्श बने रहें और बच्चे बिना सवाल इनके आदर्शपने के बोझ के नीचे दबे हुए स्वेच्छा से इनकी गुलामी को स्वीकार किए रहें, ऊपर से गर्व महसूस करें।
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माता पिता बच्चों की इच्छाओं के बदले में शर्ते रखते हैं कि यह पाना है तो इतना नंबर पाना होगा या इस प्रतिस्पर्धा में यह स्थान पाना होगा। बहुत माता पिता तो बाकायदा साप्ताहिक मीनू बनाकर रखते हैं। कुछ माता पिता पढ़ाई लिखाई नहीं तो खेलकूद इत्यादि (जो इन माता पिताओं को ऐसे लगते हैं कि इनमें अधिक पैसा है या अधिक नाम पहचान है या सेलिब्रिटी बनने के अवसर अधिक हैं) को प्रोत्साहित करते हैं। लेकिन एजेंडा बच्चों का शोषण करना ही होता है, ऊपरी आवरण भले ही अलग से दिखें।
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यही बच्चे जब बड़े होते हैं, यदि उन्होंने अपनी खुद की समझ विकसित नहीं की, तो जो हो रहा है, जो बताया जा रहा है, जो प्रोपेगैंडा किया जाता है, उसे ही माता पिता होना, पैरेंटिंग, प्रगतिशीलता, जागरूकता, जीवन जीने का सही तरीका इत्यादि मानकर अपने बच्चों के साथ भी वैसा ही करते रहते हैं (कुछ दिखावटी बदलाव भले ही हो जाएं, जैसे हिंसा करने का तरीका बदल जाए, इमोशनल ब्लैकमेलिंग का तरीका बदल जाए, या ऐसा ही कुछ और)। जो बच्चे बड़े होकर अपनी दृष्टि विकसित कर लेते हैं, वे बच्चे बुरे कहलाते हैं, हरामखोर कहलाते हैं।
बिलकुल खालिस कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा संचालित देशों की तरह की व्यवस्था रहती है। भारतीय माताओं पिताओं से बड़ा कम्युनिस्ट कोई नहीं। चीन व सोवियत संघ को सीखना चाहिए।

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