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महामारी के बाद हॉस्पिटल्स का हाल

Nitin Tripathi

by Nitin Tripathi
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कोविड ने हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री को पूरी तरह से बदल दिया है. प्रथम तो पूरे विश्व में ही ट्रेंड स्टाफ़ का अकाल सा पड़ गया है. अमेरिका जैसे देशों में पोस्ट कोविड नौकरियाँ जयादा हैं पर अप्लाई करने वाले लोग कम. कोविड के समय होटेल / रेस्टोरेंट ने स्टाफ़ की छटनी की थी तो अब काम करने वाले लोग बचे नहीं. बड़ी बड़ी रेस्टोरेंट चेन इस कमी से जूझ रही हैं, तो सिंगल रेस्टोरेंट प्रायः बंद हो रहे हैं, ऑपरेशन आवर लिमिटेड करने पड़ रहे हैं, बेसिक काम करने वाले, सफ़ाई करने वाले, सब्ज़ी / मीट काटने वाले लोग नहीं हैं.
भारत में समस्या हुई एक्स्पर्ट वर्क फ़ोर्स की इस इंडस्ट्री में. अच्छे रेस्टोरेंट, होटल में ट्रेंड स्टाफ़ का सख़्त अभाव है. अभी एक परिचित को लखनऊ में पाँच सितारा होटल के रेस्टोरेंट में दावत करनी थी. पूर्व का समय होता तो हर होटल क़ालीन बिछा स्वागत करता, अब लगभग सबने मना कर दिया कि टेबल पर खिला न पाएँगे, आप बफे ले लो. स्टाफ़ नहीं है.
दूसरा यह भी रहा कि जनता की आदत स्विगी / जोमटो की हो गई. पब्लिक घर बैठे खाना मँगाने लगी तो रेस्टोरेंट वालों ने भी अपनी ऊर्जा किचन पर फ़ोकस कर दी, रेस्टोरेंट में खिलाने पर ध्यान कम रहने लगा.
इधर होटल इंडस्ट्री में आमूल चूल परिवर्तन आए हैं. कोविड काल में एक ओर जहां करोड़ों लोग बेरोज़गार हुवे तो वहीं दूसरी ओर करोड़ों लोगों का वर्क फ़्रम होम भी रहा. कोविड काल में खर्च कोई रहा नहीं, तनख़्वाह आ ही रही है, खूब पैसे बचा लिए.
अब सब घूमने निकल लिए हैं. हर टूरिस्ट प्लेस पर कुछ भी उपलब्ध नहीं है. रेट 2019 के मुक़ाबले तीस से पचास प्रतिशत बढ़े हुवे हैं सभी होटलों के.
इसके अलावा वर्क फ़्रम होम कल्चर से एक बड़ा group यंग प्रोफ़ेसनल का आ गया है जो दूर दराज़ खूबसूरत गाँवो में B&B लेकर रह रहे हैं. हिमाचल में जिन गावों में तीन साल पूर्व सात सौ हज़ार रुपए रोज़ के होम स्टे के लिए होस्ट घर से बाहर खड़े होकर गाड़ियाँ रुकवाते थे, आज दो ढाई हज़ार रोज़ के देने पर भी होम स्टे उपलब्ध नहीं हैं. इस सेग्मेंट में अकस्मात् रेट सौ से दो सौ प्रतिशत बढ़ गए हैं.
कोविड ने वाक़ई व्यवसाय के तरीक़े में आमूल चूल परिवर्तन ला दिए हैं.

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