Home विषयचिकित्सा जगत महिला पीड़ा पर विमर्श : बस सुर्खियों में बने रहने की चाहत

महिला पीड़ा पर विमर्श : बस सुर्खियों में बने रहने की चाहत

by Swami Vyalok
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तीन काम हुए, आज। पहली बात सबसे शुरू में। कई दिनों बाद जुकरू की कैद से आजादी मिली। देखा कि इस बीच ऑर्गैज्म का गटर कई सारे गंदे नालों से होता हुआ पूरे फेसबुक पर फैल गया है। बात शुरू कहां से हुई, कहां जा पहुंची। जिसने भी इस बात की शुरुआत की, उसका जो प्राप्य था, वह मिल गया- ‘बदनाम भी होंगे, तो क्या नाम न होगा’?
यह युग ही यही है। समय का चलन ही यही। 700 क्या 7000 महिलाओं की जिंदगी बदलनेवाली बातों, लोगों या समस्याओं पर कोई नहीं देखेगा, लेकिन 7 सेकंड का छिछोरा वीडियो या 7 निमिष का एक पोस्टर पूरे विमर्श के केंद्र में होगा।
अस्तु, ‘गिल्टी माइंड्स’ नाम की एक वेब-सीरीज आयी है। अमेज़न प्राइम पर। पहला एपिसोड देख रहा था। ठीकठाक ही लग रही थी, तभी अचानक, अनायास और बिना किसी भूमिका के दो महिलाओं का लपड़-चपड़ शुरू हो गया। लेस्बियन संबंधों की वकालत शुरू हो गयी। स्टोरीलाइन से उसका इतना ही वास्ता है कि अगर वह पूरा वाकया काट दिया जाए, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। तुरंत बंद कर दिया और तड़कुल जी के साथ टहलने निकल लिया।
यह पूरा एक पैटर्न है। हिंदी फिल्मों का जड़विहीन, विकृत समाज ही तो ओटीटी पर भी जा और गंध फैला रहा है। जो बॉलीवुडिया भांड़ हिंदी में स्क्रिप्ट तक नहीं लिखते, बोलते नहीं, समझते नहीं, उनके दम ही क्या होगा जो वे सभ्यता और संस्कृति तक पहुंच भी सकें।
शादी और शादी के बहाने परिवार नाम की संस्था पर ही प्रहार किए जा रहे हैं। वह संस्था, जिसने तमाम आक्रमणों के बावजूद भारत और भारतीयता को बचाए रखा। वैश्वीकरण ने हमसे ‘समाज’ छीन लिया, हम कबूतर के दड़बों में कैद होकर खुद को प्रगति-पथ का चालक समझ लिया, अब ये लोग परिवार छीनना चाह रहे हैं।
कोई भी फिल्म, कोई भी सीरीज उठाइए, कितनी ही गंभीर कहानी चल रही है, अचानक से उसमें होमो, लेस्बियन, ड्रग्स, मां-बाप को गरियाते बच्चे, विवाहेतर संबंध इस तरह से दिखाए जा रहे हैं, जैसे ये बिल्कुल न्यू नॉर्मल है। एक सीरीज तो ऐसी देखी कि दिमाग घूम गया। इसको समझिएगा जरा। ए का पति बी है। बी को सी से प्यार है, सी लेकिन ए के साथ सो रहा है, वहीं ए का डी से प्रेम है। डी कभी कभार बी के साथ सो लेता है, लेकिन प्रेम उसका सी के साथ है। अब इस हौचपौच में तीन-चार बच्चे भी हैं। कौन किसके हैं, बूझते रहिए।
ऑर्गैज्म की ये बहस भी उतनी ही बेमानी है, जितना नारीवादियों का ब्रा जलाना या पश्चिम के कूड़े को सजाकर बेहयाई से घूमना-देखो, मैं कितनी छुंदर लग लही हूं।
अव्वल तो ये आंकड़े किसने जुटाए, मुझे नहीं पता। कुछ 200-300 महिलाओं के आधार पर पूरे भारत को नाप दिया गया। दूजे, अगर शादी में ऑर्गैज्म नहीं मिलता तो….
1. डॉक्टर ने नहीं कहा कि शादी करो भाय।
2. डॉक्टर ने ये भी नहीं कहा कि शादी में रहते हुए इधर-उधर मुंह मारो और उसको जस्टिफाई करो।
3. डॉक्टर ने यह तो कतई नहीं कहा कि स्त्री का विवाहेतर संबंध डेमोक्रेटिक होगा और पुरुष का बदचलनी।
(ये तीनों बातें पुरुष-स्त्री पर बराबर लागू होती हैं। कैसे भी उलट-पुलट कर लिख या सोच सकते हैं)
इस विषय पर और नहीं लिख रहा, क्योंकि बहुत कुछ उड़ेला जा चुका है और मेरी नानी एक कहावत कहती थी- ‘बउआ गुह मं ढेला मारबहौ, त छिंट्‌टा ककरा पर पड़तै…’ यानी विष्ठा में अगर पत्थर फेंकोगे, तो छींटे किस पर पड़ेंगे?
नारीवादियों के छद्म पर आज से कई साल पहले एक आलेख लिखा था। तब इन फर्जी आत्माओं ने माहवारी, गुदा और न जाने कौन सा विमर्श शुरू किया था।

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