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माफिया के मन में यह डर अच्छा लगा।

by अमित सिंघल
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माफिया के मन में यह डर अच्छा लगा

विश्व में घूस, कमीशन, गैरकानूनी गतिविधियों से धन अर्जित करना अभी भी आसान है। समस्या है अब उस धन को मूव करने की। अर्थात उस धन को एक स्थान से दूसरी जगह ले जाना; या फिर इस काले धन का प्रयोग करना।
कारण यह है कि विश्व में पिछले कुछ वर्षो से वित्तीय एवं टैक्स के नियमो को कठोर बनाया जा रहा है। अधिकतर वित्तीय लेन-देन अब डिजिटल, जैसे कि क्रेडिट/डेबिट कार्ड, या सेल फ़ोन ऐप, या कंप्यूटर के द्वारा होता है।
भारत में भी GST, आधार, आयकर, डिजिटल पेमेंट, डाटा माइनिंग इत्यादि के द्वारा, अचल संपत्ति की ड्रोन द्वारा मैपिंग, संपत्ति का रजिस्ट्रेशन करने वाले ओनर का आधार से लिंकेज, बैंकिंग रिफार्म, फ़ास्ट टैग, इत्यादि के द्वारा मोदी सरकार के पास वृहद पिक्चर है कि किसके पास कितनी आय एवं काला धन है और उसका प्रयोग कौन कर रहा है; कैसे किया जा रहा है।
कई बार लिख चुका हूँ कि अगर सरकार कार्यवाई नहीं कर रही है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे जानकारी नहीं है। बस, सरकार कुछ वृहद समस्याओं को सुलझाने को प्राथमिकता दे रही है। और कुछ समस्याओं – जैसे कि कोरोना, फर्जी किसान आंदोलन, रूस-यूक्रेन स्थिति – के कारण ऐसा एक्शन नहीं लेना चाहती कि कुछ समय के लिए व्यवस्था में भूचाल आ जाए।
कैश अभी भी चलता है; लेकिन अगर आपके पास वही कैश अरबो रुपये में हो, तो आप कैश का कितना भोजन खा सकते है; शराब पी सकते है; पेट्रोल खरीद सकते है?
लेकिन अब हवाई यात्रा, पंचतारा होटल में रहना-खाना, गहने, प्रॉपर्टी, कार, शेयर इत्यादि खरीदने के लिए कैश का प्रयोग नगण्य हो गया है। अगर कैश का प्रयोग कर भी ले, तब भी होटल, एयरलाइन्स, दुकानदार, ब्रोकर, एजेंसी इत्यादि के पास आपकी पूरी जानकारी रहती है जो सरकार को भी मिल जाती है।
पहले यह सब सेवाएं एवं उत्पाद कागजी कंपनियों की आंड़ में “नंबर एक” के धन से खरीद लिया जाता था। लेकिन एक तो पनामा पेपर्स, पैंडोरा पेपर्स, पैराडाइज़ पेपर्स इत्यादि की लीक से अब सीक्रेट्स सुरक्षित नहीं रहे। द्वितीय, मोदी सरकार ने लगभग चार लाख कागजी (फर्जी) कंपनियों बंद करवा दी। आठ करोड़ से अधिक फर्जी “व्यक्ति” कागज पे जीवित थे और सब्सिडी, नौकरी, वेतन, बैंक अकाउंट, ठेका इत्यादि का लाभ उठा रहे थे जिसे समाप्त कर दिया गया। नहीं तो एक कमरे से चलने वाली 200 कागजी कंपनियां राहु-प्रिया (यह एक काल्पनिक पात्र है; किसी ज़िंदा-मुर्दा व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है) के लिए जीवन की सारी विलासिता एवं प्रॉपर्टी उपलब्ध करवा दी जाती थी।
अतः विश्व भर में – साथ ही, भारत में भी – कुछ वर्षो से एक नया ट्रेंड चल पड़ा है। पेंटिंग, “कलात्मक” एवं पुरानी (antique) वस्तुओं को बेचना-खरीदना। आखिरकार, आप के घर में रखे एक पुराने मर्तबान का व्यापारी कुछ हज़ार रुपये दे सकता है; वहीं एक “पारखी” कुछ करोड़ देने को तैयार हो जाएगा। आप स्वयं भी “पारखी” बन सकते है और उस एंटीक पीस का करोड़ो मांग सकते है, जो आपको कोई खरीददार “स्वेच्छा” से देने को तैयार हो जाएगा।
यही स्थिति पेंटिंग की है। आपके लिए एक पेंटिंग कूड़ा हो सकती है जिसका ना सर या पैर है। कोई अन्य उसे पिकासो जैसी उत्कृष्ट कृति “कहकर” अरबो रूपए में बेच देगी।
फ्रेंच-अमेरिकन चित्रकार और मूर्तिकार, मार्सेल द्युशां (Marcel Duchamp) की सबसे प्रसिद्द कृति “फाउंटेन” है जो पुरुषो का साधारण सा पॉर्सेलेन यूरिनल या मूत्रालय है और लंदन के एक म्यूजियम – Tate Modern – में देखा जा सकता है। मजे की बात यह है कि द्युशां ने उस मूत्रालय को स्वयं नहीं बनाया था, बल्कि बाजार से खरीदकर उस पर अपने हस्ताक्षर करके उसे एक कलाकृति घोषित कर दिया। वर्ष 1999 में इस “कृति” का डुप्लीकेट एक करोड़ रुपये से अधिक में बिका था।
संयुक्त राष्ट्र (UNODC) के अनुसार, वर्ष 2010 में गैरकानूनी तरीके से “कमाए” गए लगभग 25000 करोड़ रुपये (3 बिलियन डॉलर) आर्ट के द्वारा इधर-उधर भेजे गए।
अब समाचार तो पढ़ा ही होगा कि यस बैंक वाले राणा कपूर को 2 करोड़ में पेंटिंग खरीदने के लिए विवश किया गया था। यह भी याद करिए कि उस समय के रक्षा मंत्री, “श्रीमान ईमानदार” ए के अंटोनी की पत्नी की कई पेंटिंग को एयरपोर्ट ऑथरिटी ऑफ़ इंडिया, साथ ही लीला होटल के मालिक ने खरीदी थी। इंडिया टुडे के अनुसार, श्रीमती अंटोनी ने अपनी पेंटिंग कभी भी कोई प्रदर्शनी नहीं लगाई थी। लोगो को कैसे पता चल गया कि वे पेंटिंग करती थी। पता नहीं मोदी सरकार के समय में श्रीमती अंटोनी ने कितनी पेंटिंग बेचीं है।
अगर समाचारो को सही माने, तो अब यह दुर्दशा हो गयी है कि माफिया परिवार को अमेरिका यात्रा एवं इलाज के लिए नंबर एक के दो करोड़ के भी लाले पड़ गए है। गैर-निवासी को इलाज का पूरा पैसा अमेरिका आने के पूर्व ही बैंक में जमा कराना होता है। नहीं तो कोई समस्या ही नहीं थी। अमेरिका पहुंचने के बाद “काम” हो जाता।
ऐसा नहीं है कि परिवार के पास धन की कमी है। लेकिन अधिकतर धन एवं संपत्ति कागजी कंपनियों के बंद हो जाने से फंस गया।
कारण यह है कि संपत्ति किसी रामू काका के नाम से खरीदी गयी थी; लेकिन अब रामू काका को प्रॉपर्टी बेचते समय आधार दिखाना होगा और प्रूव करना होगा कि उस संपत्ति के लिए धन कहाँ से आया। अतः संपत्ति बिक नहीं पा रही है।
लगभग उतनी ही संपत्ति विदेश में भी पड़ी हो सकती है। लेकिन उस संपत्ति को एक्सेस करना, उसे मूव करने की प्रक्रिया अब जटिल हो गयी है।
ऊपर से डर यह है कि मोदी सरकार को सब पता चल सकता है।
यह डर अच्छा है।

 

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