Home विषयलेखक के विचार राजनीती में बात पक्ष और विपक्ष के वर्चस्व दबदबे की

राजनीती में बात पक्ष और विपक्ष के वर्चस्व दबदबे की

Nitin Thipathi

by Nitin Tripathi
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राजनीति में ये तो ज़रूरी होता है कि आपकी पार्टी में कितने अच्छे नेता हैं पर उससे ज़रूरी यह होता है कि दूसरी पार्टी के कितने नेता अंदर ही अंदर आपके साथ हैं. एक समय था जब UP में भाजपा न पक्ष में थी न विपक्ष में. उस समय भाजपा के प्रदेश से लेकर ज़िले तक के काफ़ी नेता अंदर ही अंदर सत्ता पक्ष का कोई नेता सेट करके रखते थे.

ठीक ही है, नेता गिरी तब करोगे जब ज़िंदा रहोगे, कुछ कमाई धमाई भी होती रहनी चाहिए. मोदी जी ने यह इक्वेज़न उल्टी कर दी और बदल दी. अब ज़िला / प्रदेश स्तर के भाजपा नेताओं का विशेष दबदबा न रहा तो विपक्ष के छोटे मोटे नेता सेट करके क्या मिलना.

हाँ विपक्ष के वो नेता जो मैटर करते हैं, उनमें जयादतर अब अंदर ही अंदर भाजपा से सेट हैं. माननीय मणिशंकर अय्यर जी का नाम सर्वोपरि है. फ़िर दिग्विजय सिंह, शशि थरूर आदि ये सब कांग्रेस के झंडे के नींचे हैं अंदर ही अंदर भाजपा से सेट. सरकार को कोई मुसीबत दिखे मनिशंकर अय्यर तुरंत या तो चाय वाला या पाकिस्तान जैसे बयान लेकर आ जाएँगे, सारा अटेन्शन बदल गया.

अधीर रंजन चौधरी जी हैं तो कांग्रेस दल के विपक्ष के नेता, लेकिन इस समय बंगाल में अपने दम पर हाथ का पंजा चुनाव निशान से कांग्रेस सभासद नहीं जीत सकती, अधीर रंजन जी की सांसदी भाजपा की ख़ैरात है. अपना आदमी है, समय समय पर भाजपा को मौक़ा दिया करता है कि कांग्रेस पर चढ़ाई की जा सके. कुछ नहीं था तो बैठे बिठाए महामहिम राष्ट्रपति जी को राष्ट्र पत्नी कह दिया. वो जैसा इंटर मीडिएट, BA MA स्टूडेंट पॉलिटिक्स के बयान होते हैं, विपक्ष के नेता सदन ऐसे बयान दे रहे हैं.
एक भाजपाई होते हुवे हम तो यही मनाते हैं ईश्वर अधीर रंजन, दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर जैसे नेता ही विपक्ष में दे.

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