Home अमित सिंघल विकसित देशो में उच्च शिक्षा में एडमिशन के लिए मारा-मारी नहीं

विकसित देशो में उच्च शिक्षा में एडमिशन के लिए मारा-मारी नहीं

अमित सिंघल

by अमित सिंघल
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विकसित देशो में उच्च शिक्षा में एडमिशन के लिए मारा-मारी नहीं है। छात्र-छात्राएं प्रख्यात विश्वविद्यालयों एवं तकनीकी संस्थानों में एडमिशन चाहते है। अगर उनमे एडमिशन नहीं मिला, तो किसी अन्य संस्थान में प्रवेश मिल जाता है। बाद में वे रियलाइज़ करते है कि उन संस्थानों में भी उत्तम शिक्षा एवं कौशल मिला।
भारत के सन्दर्भ में देखे तो छात्र-छात्राओं के लिए प्रख्यात उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश जीवन-मृत्यु का प्रश्न बन जाता है। एडमिशन ना मिलने की स्थिति में प्रवेश परीक्षा के मार्क्स, साथ ही तुलना के लिए किसी आरक्षित वर्ग के प्रत्याशी को कहीं कम मिले मार्क्स को पोस्ट करने का ट्रेंड है। लेखन की शैली ऐसी कि यह ट्रेंड अभी मोदी सरकार के आने के बाद शुरू हुआ है। कदाचित पहले सभी वर्गो के कट-ऑफ़ मार्क्स एक होते थे।
निश्चित रूप से कई छात्र-छात्राएं एडमिशन से वंचित रह जाते है। लेकिन अगर आरक्षण ना होता, तो क्या सभी छात्र-छात्राओं को प्रवेश मिल जाता?
कई लाख लोग फिर भी एडमिशन नहीं पाते।
एक प्रबुद्ध सरकार क्या कर सकती है? या तो लोगो को भड़काए, एक वर्ग को दूसरे के विरूद्ध खड़ा कर दे; या फिर इस समस्या का स्थाई समाधान निकलने का प्रयास करे।
अब यह स्थाई समाधान आरक्षण का समापन नहीं हो सकता है। क्योकि यह संभव ही नहीं है।
जो लोग आरक्षण को निरस्त करवाना चाहते है, वही लोग स्वयं कृषि सुधारो के विरोध में खड़े हो जाते है, या फिर नयी पेंशन व्यवस्था को निरस्त करना चाहते है, क्योकि आप को अनुचित लाभ मिल रहा है। यह अनुचित लाभ अन्य लोगो के अधिकारों (जैसे कि निजी क्षेत्र के टैक्स से पुरानी पेंशन व्यवस्था लेना; एक तरह से अपनी पीढ़ी का बोझ अपने बच्चो पर डाल देना) का हनन करके मिलता है। तो कैसे वे लोग जिन्हे आरक्षण का लाभ मिल रहा है, अपना विशेषाधिकार त्याग देंगे?
अतः मोदी सरकार ने क्या समाधान निकाला? उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या में इतनी तीव्र गति से वृद्धि कर दो जिससे छात्र-छात्राओं की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ जाए।
संसद में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में बताया गया कि वर्ष 2013 तक केवल 6 AIIMS स्थापित किए गए थे जो कार्यरत थे। जबकि मोदी सरकार ने अभी तक 22 AIIMS की स्थापना को अनुमति दे दी है जिसमे से 6 (भोपाल, भुबनेश्वर, जोधपुर, पटना, रायपुर, एवं ऋषिकेश) आलरेडी कार्यरत हो गए है। गोरखपुर और रायबरेली स्थित एम्स में एमबीबीएस कक्षाएं एवं ओपीडी सेवाएं शुरू हो गई हैं। अर्थात, एडमिशन के लिए सभी वर्गो की सीट लगभग दोगुनी हो गयी है। बाकी के 14 AIIMS पूर्णतया बनने के बाद यह स्थिति हो सकती है कि जितने लोग डॉक्टर बनना चाहते है, उतनी ही सीट (AIIMS तथा अन्य मेडिकल कॉलेजो को मिलाकर) उपलब्ध होगी।
यही स्थिति IITs को लेकर है। वर्ष 2013 तक 16 IIT थे। मोदी सरकार ने 6 नए IIT बनवा दिया है तथा एक अन्य – धनबाद स्थित आईएसएम – को IIT में अपग्रेड कर दिया है। वर्ष 2013 तक 9 IIIT थे; बाद में 16 नए IIIT खुल गए ।
कुल मिलाकर, मोदी सरकार पूर्व 25 IIT एवं IIIT थे; मोदी सरकार के समय में ऐसे अन्य 25 संस्थान कार्यरत हो गए है। एडमिशन के लिए सीट दोगुनी कर दी।
यही स्थिति आईआईएम, विश्विद्यालयों, कॉलेजो इत्यादि की है। एक तरह से उच्च शिक्षा में एडमिशन के लिए सीट दोगुनी कर दी गयी है या मोदी सरकार के द्वितीय कार्यकाल के अंत तक दोगुनी हो जायेगी।
अगर नए उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना की यही गति रही, तो मेरा अनुमान है कि मोदी सरकार के तृतीय कार्यकाल के अंत तक एडमिशन को लेकर होने वाली मारा-मारी समाप्त हो जायेगी।
निजी क्षेत्र में अधिक उद्यम, रोजगार एवं नौकरी, साथ ही अधिक वेतन एवं सुविधाएं मिलने लगेगी।
एक तरह से आरक्षण ही निष्प्रभावी हो जाएगा।
यही दूरदर्शी नेतृत्व होता है। यही स्थाई समाधान भी होगा।

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