Home राजनीति गांधी, पटेल, नेहरू और बोस : ईर्षा और द्वेष की भारतीय त्रासदी

गांधी, पटेल, नेहरू और बोस : ईर्षा और द्वेष की भारतीय त्रासदी

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आज 23 जनवरी 2023 को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेता जी सुभाष चंद्र बोस जी के जन्मदिन की 126 वीं वर्षगांठ है और इस अवसर पर अपने एक पुराने लेख को रिपोस्ट कर रहा हूं।

आज नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का 126 वां जन्मदिन है और सारा राष्ट्र उनको याद और नमन कर रहा है। वैसे तो भारत के स्वतंत्रता संग्रम ने कई नायक दिए है लेकिन गांधी जी, वल्लभ भाई पटेल, जवाहर लाल नेहरू और नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, का नाम सबसे प्रमुख है।
ऊपर के चारो नायक एक दूसरे से अंजान, 20 वी सदी की शुरवात में, देश के अलग अलग कोने में, अपनी तरह से, अपने व्यक्तित्व का निर्माण कर रहे थे। गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका से 1915 में, भारत वापस लौटे थे, तब तक उनकी ख्याति, सभ्रांत व राजनैतिक रूप से चैतन्य भारतीय वर्ग में हो चूका था। भारत पहुंच कर वो ‘भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस’ में शामिल हो गये। जहां उनको, कांग्रेस दल के प्रमुख भारतीय नेता गोपाल कृष्ण गोखले जी, जो की एक माध्यम मार्गी थे, जो उस समय की व्यवस्था के अंदर ही काम कर के, आगे बढ़ने के समर्थक थे, ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए आगे बढ़ाया था। 1918 में चम्पारन और गुजरात के खेड़ा में किये गए जमीदारो के खिलाफ और किसानो के हक के लिए किये गए आंदोलनों की सफलता ने जहाँ गांधी जी की ख्याति पुरे देश में फैली वही उनकी भारतीय वेशभूशा, खान पान ने, उन्हें सारे भारतीयों का अपना बना लिया था। इस प्रकार गांधी जी पहले नायक थे, जिन्हे सम्पूर्ण भारत में स्वीकारता मिली थी और उसके बाद से ही वो ‘भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस’ के सर्वमान्य नेता हो गये थे।
गांधी जी के इस शिखर पर पहुँचने के दौरान ही पटेल, नेहरू और बोस का प्रदार्पण कांग्रेस में और गांधी जी के जीवन में हुआ था। यह तीनो एक दूसरे से बिलकुल जुदा थे। इन तीनो की परिवारिक पृष्टभूमि के साथ, उनके राष्ट्रिय विचारधारा से जुड़ने के क्रम भी अलग थे।
इन सबमे, सबसे बड़े 1875 में एक कृषक परिवार में जन्मे वल्लभ भाई पटेल थे। उन्होंने स्वाध्याय करके , 22 साल की उम्र में मैट्रिक पास की थी और फिर पैसे बचा कर इंगलैंड जाकर बैरिस्टरी पास की थी। भारत लौट कर, उन्होंने वकालत की जिसमे उन्हें सफलता मिली थी। शुरू में उनको राजनीती में कोई रूचि नही थी,लेकिन लोगो के आग्रह पर उन्होंने अहमदाबाद के सैनिटेशन कमिश्नर के पद के लिए चुनाव लड़ा और उसमे उन्हें उसमे जीत हासिल हुयी थी। गांधी जी के प्रति उन्हें शुरू में कोई रूचि नही थी लेकिन खेड़ा सत्याग्रह के दौरान उनको गांधी जी का सानिध्य मिला और वे उनसे काफी प्रभावित हुए। एक बार जब पटेल, गांधी जी के अनुयायी होगये तब उन्होंने पूरी तरह से अपने को गांधी जी के लिए अपने को को समर्पित कर दिया था। पटेल, एक ग्रामीण कृषक परिवार से आये थे और उन्हें गांधी जी की जो बात सबसे ज्यादा प्रभावित की थी वो थी दक्षिण अफ्रीका के लौटने के बाद, गांधी जी का सभी पाश्चात्य वस्तुओ का त्याग करना और भारतीय ग्रामीण परिवेश और पहनावे में, आश्रम बना कर रहना था। यहां इस बात का जरूर ध्यान रखिये कि पटेल जिस समय गांधी जी की सानिघ्य में आये थे, तब वो स्वयं 40 वर्ष के ऊपर के हो चुके थे। वे अपने जीवन के संस्कारो के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध होते हुए गांधी जी को अग्रज का सम्मान देते थे। वे उनके आदेशो के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। वैसे तो वे खुद बड़े अड़ियल और निष्ठुर माने जाते थे लेकिन गांधी जी को अग्रज मान कर, अनुज की भूमिका उन्होंने खुद स्वीकार की थी, इसलिए गांधी जी के आदेशो को अंतिम मानना, उन्होंने अपना कर्तव्य मान लिया था। भारतीय जीवन के दर्शन के इसी अग्रज और अनुज संस्कृति ने, बाद में, भारत के भाग्य में बड़ी अटखेलियाँ खेली है।
जवाहर लाल नेहरू, पटेल से 14 वर्ष छोटे थे, उनका जन्म पंडित मोतीलाल नेहरू जो एक अमीर बैरिस्टर थे, उनके यहां 1889 को हुआ था। नेहरु का लालन पालन रईसी में हुआ था और शुरू की पढाई भी, घर पर प्राइवेट ट्यूटरो द्वारा हुयी थी। बाद में इंगलैंड जा कर उन्होंने बैरिस्टरी पास की और लौट कर वकालत भी की लेकिन उसमे वो असफल रहे थे जिससे उनका मन वकालत से उचाट हो गया था। नेहरू ने अपने इंगलैंड प्रवास के दौरान,बर्नार्ड शॉ, एच.जी वेल्स, जे .एम. कीन्स, बेरट्रांड रस्सेल, लोवेस डिकिंसन और मेरेडिथ टौन्सेन्ड की किताबे पढ़ी थी, जिसका असर उनकी राजनैतिक और आर्थिक सोच पर पड़ा था। नेहरू ने 1912 में पटना के कांग्रेसी अधिवेशन में भाग लिया था जहाँ से वह दुखी लौटे कर आये थे। उन्होंने लौटने के बाद , कांग्रेस के अधिवेशन को “Very much an English-knowing upper class affair.” कहा था। नेहरू उस समय कांग्रेस में प्रस्थापित गोपाल कृष्ण गोखले जी के मध्यमार्गी विचारो से असहमत थे।
1915 में गोखले जी की मृत्यु के बाद ऐनी बेसेंट, जो सोशलिस्ट विचार धारा की एक ब्रिटिशर थी और लोकमान्य तिलक ने “National Movement for Home Rule ” का अवाहन किया, लेकिन मध्यमार्गी समर्थको ने उसे नकार दिया था। उसके बाद से नेहरू, उस ब्रिटिश महिला ऐनी बेसेंट से प्रभावित होते चले गए। विदेशी महिलाओ का जो प्रभाव नेहरू के बाद के जीवन में पड़ा है उसके पीछे यह एक बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण था। 1920 में “असहयोग आंदोलन” में भाग लेने के बाद नेहरू कि पहचान राष्ट्रिय पटल पर बन गयी थी। जब 1922 में, चौरी चौरा काण्ड के बाद गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया था, तब मोती लाला नेहरू और चितरंजन दास ने इसका विरोध करते हुए स्वराज पार्टी की स्थापना कर डाली थी। लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने पिता का साथ न देकर गांधी जी का साथ दिया और यही से गांधी जी का, जवाहर लाल नेहरू के प्रति विशेष अनुराग की शुरवात हुयी थी। कालांतर में उनके बीच इस विशेष सम्बन्ध ने, भारत के भविष्य पर अमिट छाप छोड़ी है। नेहरू, गांधी जी के अनुयायी होकर पश्चिमी कपडों और प्रसादनो का त्याग तो कर दिया था लेकिन वैचारिक रूप से, जहाँ गांधी जी, नीचे के स्तर के भारत को अंदर समाहित कर के, भारत को जगाना चाहते थे, वहीँ नेहरू, समाजवाद में, भारत का उत्तर ढूंढ रहे थे।
सुभाष चन्द्र बोस इन तीनो में सबसे छोटे थे। वे पटेल से 22 वर्ष और नेहरू से 8 वर्ष छोटे थे। उनका जन्म 1897 में हुआ था। आज या पहले भी, जब भारत के लोग इन तीनो का नाम साथ लेते है तो तीनो ही समकालीन लगते है लेकिन इन तीनो में बड़े और छोटे में 22 साल का अंतर था। आज यहाँ 2016 से देखने से हमे यह अंतर ज्यादा महत्व का नही लगता है लेकिन 19 वी शताब्दी के अंत में, पलटते हुए भारत में, इन तीनो के उम्र का अंतर बड़ा महत्वपूर्ण है।
सुभाष चन्द्र बोस जन्म एक वकील परिवार में हुआ था और वे मेघावी थे। 16 साल की उम्र में मैट्रिक न केवल पास किया था बल्कि द्वितीय स्थान भी प्राप्त किया था। उसके बाद उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया जहाँ उनका पहली बार राष्ट्रवादी चरित्र सामने आया, जब उन्होंने प्रोफेसर ओटन द्वारा भारत और भारतीयता की निंदा करने पर, उनसे मार पीट कर ली थी। इसके फलस्वरूप कॉलेज से उन्हें निष्काषित कर दिया गया था। यहाँ यह महत्वपूर्ण है की इन तीनो में राष्ट्रवादी भावना सबसे कम उम्र में, सुभाष चन्द्र बोस के अंदर आई थी और उन्होंने अपने तरीके से उसका इजहार भी किया था। सुभाष चन्द्र बोस सेना में जाना चाहते थे और उन्होंने इसकी परीक्षा भी दी थी लेकिन आँखें खराब होने के कारण उन्हें सेना के लिये अयोग्य घोषित कर दिया गया था। किन्तु मन सेना में ही जाने को कह रहा था, इसलिए खाली समय का उपयोग करने के लिये उन्होंने टेरीटोरियल आर्मी की परीक्षा दी और फोर्ट विलियम सेनालय में रँगरूट के रूप में चयन हुआ था। सुभाष चन्द्र बोस के चरित्र का यह बहुत महत्वपूर्ण पक्ष है, जो इन तमाम सवालो का जवाब देता है की सुभाष चन्द्र बोस ने कैसे भारत की आज़ादी के लिए सैन्य शक्ति के इस्तमाल को आधार बनाया और बाद में ‘हिन्द सेना’ का गठन किया था।
स्वामी विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द घोष के आदर्शों का सुभाष चन्द्र बोस के जीवन और आचरण का बड़ा प्रभाव था जिससे उनके पिता चिंतित थे। वो चाहते थे की सुभाष चन्द्र बोस आईसीएस बने। इससे घर में हो रहे असंतोष को देख कर उन्होंने अपने पिता से आईसीएस बनने का वादा कर लिया और तैयारी के लिए वो इंग्लैंड चले गए। वहां आईसीएस में न केवल चुने गए बल्कि उन्होंने चौथी पोजीशन भी प्राप्त की थी। उनका चुनाव तो हो गया था लेकिन इंग्लैंड की नौकरी करना उन्हें मानसिक कष्ट दे रहा था. इसलिए उन्होंने 1921 में ही आईसीएस से इस्तीफा दे दिया और वहां से अपने बड़े भाई को पत्र लिखा,
‘भइया! हम लोग, जो एक ओर स्वामी विवेकानन्द और दूसरी ओर अरविन्द घोष के प्रभाव-छत्र में बड़े हुए हैं; भाग्य या दुर्भाग्य से हम ऐसी मानसिकता बना चुके हैं कि विपरीत ध्रुवों जैसे दृष्टिकोणों से लदा कोई भी समझौता हमें स्वीकार नहीं है। मुझे खेद है की मेरे और सिर्फ मेरे कारण, पूरे भरे पूरे समंजित परिवार में, मतभेद पैदा हो चुके हैं। लेकिन मै मजबूर हूँ। बचपन से ही कुछ ऐसे आदर्श मेरे दिलो-दिमाग पर हावी हो चुके हैं की जो परिवार के किसी दूसरे व्यक्ति को मंजूर नहीं हैं।’
और वो इंग्लॅण्ड से भारत वापस लौट आये।
इंग्लैंड से वापसी पर, रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर वे सर्वप्रथम मुम्बई गये और महात्मा गांधी से मिले। वहाँ 20 जुलाई 1921 को गांधी और सुभाष के बीच पहली मुलाकात हुई थी। गाँधी जी ने उन्हें देशबंधु चित्तरंजन दास के साथ बंगाल में काम करने की सलाह दी और वो लौट के उनके साथ काम करने लगे। जब देशबंधु चित्तरंजन दास, कोलकाता के महापौर बन गये तब उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस को महापालिका का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी बना दिया। बोस ने अपने कार्यकाल में कोलकाता महापालिका का पूरा ढाँचा और काम करने का तरीका ही बदल डाला था। कोलकाता में सभी रास्तों के अंग्रेज़ी नाम बदलकर उन्हें भारतीय नाम दे दिये थे और स्वतन्त्रता संग्राम में प्राण न्यौछावर करने वालों के परिवारजनों को उन्होंने, महापालिका में नौकरी दी थी।
इन सब बातो से यह तो अंदाजा लग जाता है की सुभाष चन्द्र बोस इन तीनो गांधी ,पटेल और नेहरू से विलक्षण थे। यही विलक्षणता ने ही आगे के समय में, इन तीनो को, सुभाष चन्द्र बोस के सामने असहज बना दिया था।
इसी दौरान बोस, नेहरू के करीब आये और उनको बड़ा भाई मान कर दोनों ने साथ साथ काम किया। 1928 में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में, कोलकाता में हुआ था तब इस अधिवेशन में, सुभाष चन्द्र बोस ने अपने साथियों के साथ खाकी गणवेश धारण करके गांधी जी को सैन्य तरीके से सलामी दी थी। सुभाष चन्द्र बोस के इस शानदार सैन्य वर्दी का आभास देने वाली सलामी और उनके साथियों के सैन्य अनुशासन से गाँधी जी विचलित होगये थे। गांधी जी एक अमनपसंद और अहिंसावादी थे वो कही न कही इस वातावरण से डर गए और असहज हो गए थे।
यहाँ यह बात महत्वपूर्ण है कि गांधी जी ने जिस काल में पटेल ऐसे आज्ञाकारी साथी को साथ में लिया, नेहरू ऐसे बड़े घर के, पश्चिमी दृष्टि से सहज, आज़ादी के लिए कर्मठ को लिया वही उसी काल में, सुभाष चन्द्र बोस ऐसे व्यक्ति ने भी उनके समकक्ष अपनी जगह बनाली थी, जो राष्ट्रवादिता को लेकर निष्ठुर थे। वो एक तरफ स्वामी विवेकानन्द और अरविन्द घोष से बेहद प्रभावित थे और दूसरी और यह उनको विश्वास हो गया था की शताब्दियों से गुलाम रहे भारत को अनुशासन की बहुत जरुरत है।
गांधी जी अपने जीवनकाल में पहली बार जिस व्यक्ति के व्यक्तित्व से असहज हुए थे, वो थे उनसे 28 वर्ष छोटे सुभाष चन्द्र बोस। सुभाष चन्द्र बोस में वो सब था, जिस के लिए गांधी जी को खुद अपनी अंतरात्मा से ही, इतने वर्ष संघर्ष करना पड़ा था। सुभाष चन्द्र बोस जहां स्वामी विवेकानन्द और अरविन्द घोष की आध्यात्मिक शक्ति से सराबोर थे वहीँ वह इन सबसे मेघावी थे। वे सबसे शांत मन के थे वा कम उम्र में सब पाकर, खुद ही ठुकरा कर, आक्रामक राष्ट्रीयता की अलख जलांने वाले थे।
सुभाष चन्द्र बोस1920 के दशक में गांधी, पटेल और नेहरू के साथ होते हुए भी, उन तीनो से अलग थे। उनका यही विशाल वयक्तित्व आगे लोगो की ईर्ष्या और द्वेष का कारण बना था। इसी कारण गांधी, पटेल और नेहरू ने, भविष्य में उन्हें कांग्रेस और फिर भारतीय राजनीती से अलग थलक करने का प्रयास किया था।
आज लोग नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को नमन अवश्य कर रहे है लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि सभी राष्ट्रवादी उनके आचार और आचरण को अपने में आत्मसत करे वही गाँधी पटेल और नेहरू बनने से बचते हुए, भारत को नवगुलामी से स्वतंत्र कराने का संकल्प करे।

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