Home लेखक और लेखदेवेन्द्र सिकरवार लिखितभाषण बनाम प्रोम्पटर और बकैती बनाम पॉलिसी

लिखितभाषण बनाम प्रोम्पटर और बकैती बनाम पॉलिसी

देवेन्द्र सिकरवार

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भारतीय परंपरा में दो बातें बहुत महत्व की हैं
प्रथम, ब्रह्म के अतिरिक्त कोई पूर्ण नहीं।
द्वितीय,शब्द ब्रह्म का नाद है।
लेकिन भारत में वामपंथी, लिबरल्स और कांग्रेसी ये तीन ऐसी प्रजाति रहीं हैं जिनपर कोई नियम लागू नहीं होता, उपरोक्त दो नियम भी नहीं।
उन्हें लगता है उनका लिखा शब्द ही अंतिम सत्य है क्योंकि वे ही ब्रह्म हैं।
हकीकत ये है कि अन्य करोड़ों बकैतबाजों से भी सस्ते स्तर के ट्रोल हैं जिनका सामान्य ज्ञान का स्तर शून्य से भी नीचे ऋणात्मक है।
गांधी से लेकर मनमोहनसिंह तक लिखित भाषणों को पढ़ने की परंपरा के वाहक हैं। दयनीयता तो यह है कि मनमोहन के हिंदी भाषण ‘अरबी-उर्दू’ लिपि में लिखे जाते थे क्योंकि जनाब को देवनागरी लिपि पढ़नी भी नहीं आती थी।
इटालियन औरत और राहुल गांधी अभी तक रोमन लिपि में लिखे भाषण पढ़ते हैं और अभी भी अटकते हैं।
मायावती प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी केवल लिखित स्क्रिप्ट पढ़ती आई हैं और फिर भी अटकती रही हैं।
तो अगर तकनीक के प्रेमी मोदी लिखित भाषण के नवीनतम तकनीकी रूप ‘टेलीप्रोम्पटर’ का प्रयोग करते हैं तो गलत क्या है?
प्रधानमंत्री अगर टेलीप्रॉम्प्टर के खराब हो जाने पर भाषण को सहसा रोक देते हैं तो गलत क्या हुआ इसमें?
वे नरेन्द्र दामोदरदास मोदी हैं राहुल गांधी नहीं कि कुछ भी बोल दें।
वे प्रधानमंत्री हैं, उनके शब्द पॉलिसी बन जाते हैं अतः चुप हो जाना ही उचित है।
उन्होंने चुप रहना बेहतर समझा बजाय पिछत्तीस जैसी नई संख्या के आविष्कार के।
राहुल पाड़ा ट्विटर पर डकारता है,”मोदी टेलीप्रॉम्प्टर के बिना एक शब्द नहीं बोल सकते।”
बिल्कुल ठीक कहा।
वे तेरी तरह आँय बांय शाय बकने की जगह मौन हो जाना पसंद करते हैं।
उचित भी यही है क्योंकि शब्द ब्रह्म का नाद है और उसका उचित प्रयोग होना चाहिए।
लेकिन राहुल और उसके चमचों के लिए
‘शब्द राहुल का सांड है चाहे जिसपर चढ़ा दो।’

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