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स्वाध्याय पाश्चात्य समाज के लोग

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
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मेरी शादी में मेरे माता-पिता भाई बहन इत्यादि, मेरी पत्नी के माता-पिता भाई बहन इत्यादि नहीं सम्मिलित हुए थे। हमारी शादी सुबह एक-आध घंटे में ही अग्नि-हवन के फेरे इत्यादि लेकर निपट गई थी। शादी के तुरंत बाद हम लोग अपनी-अपनी दिनचर्या में लग गए थे। कोई शोर-शराबा नहीं, कोई आतिशबाजी नहीं, कोई संगीत नहीं, उपहारों का आदान-प्रदान नहीं। हमारी शादी में मंत्रो का उच्चार भी गायत्री परिवार मिशन के हमारे एक जाट मित्र ने किया था जो उस समय जल-विद्यापीठ में हमारे छात्र होते थे (उमर में हमसे बड़े थे)। शादी में कुछ कम अधिक 100 लोगों की उपस्थिति थी, जिनमें जल-विद्यापीठ के छात्र, शिक्षक व आसपास के गांवों के किसान लोग इत्यादि थे।

शादी के लिए मैंने कुुर्ता धोती उधार लेकर पहनी थी, शादी के बाद वापस कर दी थी। मेरी पत्नी ने उधार की साड़ी पहनी थी, जो उन्होंने भी शादी के बाद वापस कर दी थी। इक्का दुक्का छोड़, हम लोगों की फोटो तक नहीं है। मंगलसूत्र के नाम पर काला धागा था। कोई आभूषण नहीं। कुल दो-तीन सौ रुपए में शादी निपट गई थी, इनमें से अधिकतर रुपए फल इत्यादि में खर्च हुए थे।

न तो शादी के पहले, न ही शादी के बाद मैंने अपनी पत्नी से कभी पूछा कि मेरे सास ससुर, साला व साली क्या करते हैं। समय के साथ धीरे-धीरे अपने आप जानकारी मिलती रही। न ही मेरी पत्नी ने कभी मुझसे मेरे माता-पिता परिवार इत्यादि के बारे में पूछा, उनको भी समय के साथ अपने-आप जानकारी मिलती रही। हम लोगों ने कभी भी यह जानने का प्रयास नहीं किया कि एक दूसरे के माता-पिता इत्यादि की क्या सामाजिक हैसियत है, क्या आर्थिक हैसियत है। हम दोनों के लिए एक दूसरे का व्यक्तित्व ही विवाह के लिए पर्याप्त था।

मैं अपनी शादी के लगभग ढाई साल बाद पहली बार अपनी ससुराल गया था। कुल मिलाकर बात यह कि पहली बार ससुराल आने के पहले मुझे सिर्फ यह मालूम था कि मेरे ससुर दुनिया की नंबर यूनिवर्सिटी हार्वर्ड के पढ़े हुए हैं, गोल्ड-मेडलिस्ट रहे हैं, दुनिया में काफी नाम है, एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के मुख्य सह-संस्थापक हैं, जिसके भारत में भी कई कार्यालय हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के शताब्दी-उपलब्धि की सूची में चुने गए ख्याति प्राप्त लोगों में से आते हैं। समय के साथ इसी तरह की कुछ-कुछ जानकारियां अन्य नजदीकी ससुरालियों के बारे में हो गई थीं। लेकिन वास्तव में ये लोग कैसे हैं, इन लोगों का समाज कैसा है, इत्यादि की मुझे गहरी जानकारी नहीं थी, इसलिए मेरे मन में इन लोगों के प्रति बचपन से भरी गई धारणाएं शेष थीं।
शादी के लगभग ढाई साल बाद जब मैं पहली बार अपनी ससुराल पहुंचा तब जिस पल मैंने सासू माता के एक घर में कदम रखा, तब यह देखकर दंग रह गया कि मैं जिधर देखता हूं उधर दीवारें किताबों से भरी पड़ी हैं। लिविंग एरिया हो या कमरे हों यहां तक कि रसोई घर में भी किताबें। हजारों किताबें होंगी। सासू माता के उस समय सिडनी शहर के अच्छे माने जाने वाले कई इलाकों में कई घर होते थे। यह घर सिडनी के सबसे महंगे माने जाने वाले इलाकों में था। पहले ही दिन से बचपन से बनी हुई मेरी धारणाएं टूटना शुरू हो चुकी थीं। सासू माता हो, ससुर हों, नाना ससुर हों, चाचा ससुर हों, साले हों, सालियां हों। मतलब कोई भी रिश्तेदार हो या मेरी पत्नी के मित्र या सहपाठी हों। किसी भी शहर में हो। जहां भी मैं गया मुझे हर घर में किताबें मिलीं, पूरी की पूरी दीवारें किताबों से भरी।
ससुर साहब का घर तो ऐसा है कि यदि आपको सोफे पर भी बैठना है तो किताबों को हटाकर बैठना पड़ता है। डायनिंग टेबल को छोड़कर यदि लिविंग एरिया या किसी कमरे की मेज पर कुछ रखना है तो किताबों को हटाना पड़ता है। घर के अंदर जो हाल-वे है वह किताबों से भरा है। हर बेडरूम किताबों से भरा हुआ है। लिविंग एरिया किताबों से भरा हुआ है। अलग से एक रीडिंग रूम है जो किताबों से भरा हुआ है। कभी गिना नहीं लेकिन यदि पचास हजार से भी अधिक किताबें घर में हों तो कोई आश्चर्य नहीं। सासू माता के कई-कई सौ एकड़ के बड़े फार्महाउस हैं। इन सभी में हजारों किताबें हैं। मतलब सासू माता का जो भी घर है वह कहीं भी हो, वहां हजारों किताबें जरूर ही हैं।
लोग सोने के पहले किताबें पढ़ते हैं, सुबह उठकर किताबें पढ़ते हैं, खाली समय में किताबें पढ़ते हैं, ट्रेनों में हवाई जहाजों में किताबें पढ़ते हैं। छुट्टियों के दिनों में किताबें पढ़ते हैं। जंगल में कैंपिंग के लिए जाते हों तो भी किताबें साथ ले जाते हैं। अस्पतालों तक में आम लोगों के लिए पुस्तकालय होते हैं, जहां लोग पढ़ते हुए मिल जाते हैं। स्कूली या यूनिवर्सिटी या प्रतियोगी परीक्षाओं के छात्र नहीं, आम लोग किताबें पढ़ते मिलते हैं। पार्कों में लोग किताबें पढ़ते मिल जाते हैं।
बहुत लोग ऐसे भी मिल जाते हैं जो बहुत अधिक पढ़े लिखे हैं। ऊंची से ऊंची नौकरी कर सकते थे, करोड़ों का वेतन पा सकते थे। लेकिन उनकी प्राथमिकता ज्ञान की भूख थी। इसलिए पूरा जीवन किताब पढ़ते गुजार देते हैं, कोई घर नहीं बनाते, कोई संपत्ति नहीं बनाते हैं। रात में किसी पार्क में ही सो जाते हैं, अलग-अलग शहर घूमते हैं, जहां जगह मिल गई वहां सो जाते हैं। हमेशा कोई न कोई किताब पढ़ते रहते हैं।
आदमी की विद्वता योग्यता का मूल्यांकन आधार यह नहीं माना जाता है, कि आदमी कौन सी नौकरी करता है या कितने वेतन की नौकरी करता है या व्यापार में कितना लाभ कमाता है या कितनी संपत्ति बनाई है या सेलिब्रिटी है। आपकी समझ, आपकी दृष्टि, आपकी बुद्धिमत्ता, आपकी विशेषज्ञता, आपका अध्ययन इत्यादि आपकी विद्वता योग्यता के आधार होते हैं।
कुल मिलाकर बात यह कि जीवन में छोड़िए एक वर्ष में ही हजारों किताबें पढ़ लेना मनुष्य के लिए कोई बड़ी बात नहीं, बशर्ते मनुष्य को किताबें पढ़ने का शौक हो, किताबें पढ़ने को प्राथमिकता देता हो, भयंकर जिज्ञासु हो। हमारे समाज में बहुत लोग इतने अधिक कुंठित व विकृत सोच के होते हैं कि उनको लगता है कि जो वे नहीं करते हैं, वह दूसरे भी नहीं करते हैं। सीखने समझने की बजाय, जीवन को सहजता से सीखते हुए संवर्धित विचारशीलता के साथ जीने की बजाय, अपनी कुंठाओं व हीनता इत्यादि के इर्द-गिर्द तर्कों का जाल बुनते रहते हैं, और इसी तीन-तिकड़म को जीवन की उपलब्धि मानते रहते हैं।

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